Wednesday, April 27, 2016

पचास साल बाद - २


पचास साल पहले मिरामार बीच पर खोये जूते को अंतिम विदा देकर मैं लुइस की टैक्सी में बैठ जाती हूँ। मन में अब भी पापा की सीख गूँज रही है, हालाँकि आज उनकी बात पर विश्वास करना कठिन है कि मेरा जूता किसी ज़रूरतमंद लड़की को ही मिला होगा। 

लुइस को समझाती हूँ कि मिरामार से पणजी की तरफ जाती सड़क पर कहीं वह होटल था, जो पचास साल पहले, गर्मी की छुट्टी भर हमारा घर था। उसके बगल से एक सड़क सब्ज़ी मंडी जाती थी और उसके आगे मिलिट्री हॉस्पिटल था।

लुइस कहता है - ओह! कम्पाल एरिया !

इस नाम से मेरी यादों में कोई घंटी नहीं बजती। लेकिन मैं उस होटल को ढूँढ निकालने के लिये बहुत उत्सुक हूँ। वहाँ मेरे अम्मा-पापा हैं, अलसेशियन गोआ है, क्लेमेंटीन आंटी है। हमारे कमरे की वो बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ हैं, जिनकी विंडो सिल पर बैठकर अगुआद का क़िला और मांडोवी में आती-जाती नावें देखी जा सकती हैं। सर्विस लेन के आगे वो पेड़ है, जिसकी टहनियाँ कुछ इस तरह निकली हैं कि उनके संधिस्थल पर बड़े आराम से टेक लगाकर बैठा जा सकता है। जहाँ बैठकर मैं कालिदास ग्रंथावली पढ़ती हूँ और गोआ पेड़ के नीचे बैठा निगरानी करता है।

मैं लुइस से बराबर धीरे चलने को कह रही हूँ पर वो न जाने किन गलियों में गाड़ी दौड़ाये जा रहा है - कभी दांये तो कभी बांये। हम एक पुराने मगर रंग-रोग़न से दुरुस्त घर के सामने से गुज़रते हैं, जिस पर पिंटो या ऐसा ही कोई नाम लिखा है। सड़क के सामानांतर बने इस घर के बाहरी बरामदे में तीन लोग बैठे हैं। मैं लुइस से गाड़ी पीछे लेने को कहती हूँ। उतरकर उन लोगों के पास जाती हूँ और उन्हें बताती हूँ कि पचास साल पहले मैं यहाँ रही थी। होटल का नाम ठीक से याद नहीं लेकिन मालिकों में से पॉल, लुइस और क्लेमेंटीन के नाम याद हैं। उनका सरनेम शायद मस्किता था। मिस्टर पिंटो अपना सीधा हाथ उठा देते हैं - वह रहा, अगली गली में।


मुझमें अब टैक्सी में बैठने तक का धैर्य नहीं है। पिंटो को धन्यवाद देकर दौड़ पड़ती हूँ अगली गली की ओर।

सामने की दीवार देखते ही थम जाती हूँ। दरवाज़े के दोनों तरफ़ ऊपर से नीचे जाते अक्षरों में लिखा है -- सेंट्रल लॉज। मुझे याद आता है - हाँ, यही तो नाम था - काज़ा सेंट्रल।

यह होटल का मुख्य प्रवेश द्वार था। उसके बगल में लाउंज और फिर डाइनिंग रूम। उस बालकनी के पीछे स्टेशन डायरेक्टर मेजर अमीन का कमरा था। उनकी बालकनी के नीचे एक कभी न चलने वाली कार खड़ी रहती थी, जिसके चारों टायर हवा के बिना ज़मीन से सट चुके थे। मैं गोआ को उस पर चढ़ने-उतरने का आदेश देते नहीं थकती थी और न वो कूदते हुए थकता था।

लेकिन हमारा कमरा इस तरफ नहीं था। उसकी खिड़कियाँ तो मेन रोड की तरफ खुलती थीं। और मैं लपकती हुई उस तरफ चल देती हूँ। हाथ में थमे फ़ोन से उस दीवार की कई फ़ोटो खींच डालती हूँ। बैग में धरे डिजिटल कैमरा की याद ही नहीं आती। आती भी कैसे? मन तो 1964 की यादों में गुम है। सही दिशा में घूमकर अपना पेड़ पहचानने की कोशिश करती हूँ लेकिन इनमें से किसी में दस साल की लड़की के बैठने की जगह नज़र नहीं आती।

लुइस टैक्सी लेकर आ गया है और लॉज के किसी कारिंदे से बात कर रहा है। मैं उसके पास पहुँचते ही शुरू हो जाती हूँ। भूल जाती हूँ कि मुझे आवाज़ को संतुलित और भाव-रहित रखने की ट्रेनिंग दी गयी है और लगभग तीस वर्षों से मैं उसी तरह बोलती आई हूँ। मेरी आवाज़ में दस साल वाली शुभ्रा का उत्साह और जल्दबाज़ी समा जाती है। मैं उससे अंकल पॉल और क्लेमेंटीन आंटी की खैरियत पूछती हूँ और उन्हें देने के लिए पर्स में अपना कार्ड ढूँढ़ने लगती हूँ। लेकिन दस साल वाली शुभ्रा को भला आकाशवाणी के लोगो वाला डॉ शुभ्रा शर्मा का कार्ड कैसे मिलता? और अगर मिल भी जाता तो वे लोग पहचानते कैसे? आख़िरकार किसी बिल पर पापा का नाम लिखकर अंदर भेजती हूँ।


लम्बे हैंडसम पॉल झुक गए हैं, छड़ी लेकर चलते हैं। उन्हें पापा बहुत अच्छी तरह याद हैं लेकिन गर्मी की छुट्टी में यहाँ रही पापा की बेटी याद नहीं है। उनकी बहन, क्लेमेंटीन आंटी अब वास्को में रहती हैं। घुटनों में दर्द की वजह से ज़्यादा चल फिर नहीं पाती। पॉल की तीनों बेटियाँ विदेश में रहती हैं। इकलौता बेटा आर्टिस्ट है। कभी-कभी आता है। वे अकेले ही रहते हैं। वे मेरे लिए कुछ खाने-पीने की व्यवस्था करने को कहते हैं लेकिन मैं उनसे अपना पुराना कमरा देखने का अनुरोध करती हूँ। वे कहीं ना न कर दें, इस डर से मैं कुर्सी से उठकर अंदर चल देती हूँ। साथ-साथ रनिंग कमेंट्री भी जारी रखती हूँ - किचन इस तरफ था न, पॉल अंकल? यहाँ आँगन में कुँआ था जहाँ मोट्या मेंढक पकड़ता था। और इस कोने में बाथरूम था। फिर वो गैलरी थी जिसमें क्लेमेंटीन आंटी का और हमारा कमरा था।


लेकिन यह क्या? तेज़ी से चलती मेरी ज़ुबान को जैसे काठ मार जाता है। सेंट्रल लॉज की बाहरी टीम-टाम के पीछे एक बियाबान खंडहर है। गैलरी और कमरे ढह चुके हैं। किचन में बल्लियाँ और ईंटें भरी हैं। बस एक बाथरूम है, जो अब भी खड़ा है - लंगड़ाते अंकल पॉल की तरह - किसी तरह अपने दिन काट रहा है।

6 comments:

  1. Such a beautifully poignant last line

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  2. aankhen bhari aati hain.....kya jadoo hai shabdon me, bhavon me, padhte-padhte jaise apna man bhi 50 saal pahle hi daud padaa.

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  3. Archna Pant says : ओह ! ...
    काश कि स्मृतियों में ही रह जाता वो सब .... तो शायद हमेशा उतना ही सुन्दर ... उतना ही अद्भुत रहता !

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  4. शुभा जी, आप का संस्मरण पढ कर ऐसा लगा कि यह खत्म क्यों हुआ। और यह भी कि ऐसे क्यों खत्म हुआ। पूरा दृष्टांत आंखों के सामने खिंच गया। आप लिखती जरूर रहिये। हम पढ़ने वाले इंतजार करेंगे।

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  5. शुभा जी, आप का संस्मरण पढ कर ऐसा लगा कि यह खत्म क्यों हुआ। और यह भी कि ऐसे क्यों खत्म हुआ। पूरा दृष्टांत आंखों के सामने खिंच गया। आप लिखती जरूर रहिये। हम पढ़ने वाले इंतजार करेंगे।

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