Sunday, June 17, 2012

क़ौमी शायर चकबस्त

क़ौमी शायर चकबस्त
--- डॉ शुभ्रा शर्मा
भारत के इतिहास में १८५७ का साल ख़ास अहमियत रखता है. कवि के शब्दों में कहें तो - "गुमी हुई आज़ादी की क़ीमत हमने पहचानी थी" और तभी आज़ादी के लिए जद्दो-जहद शुरू की थी. हम इसे 'आज़ादी की पहली लड़ाई' के नाम से जानते हैं, हालाँकि बहुत दिनों तक अँगरेज़ हुक्मरान इसे 'सिपाही विद्रोह' कहते रहे. उर्दू शायरों में दो ही इस घटना के चश्मदीद गवाह थे, एक - बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र और दूसरे - मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब. ज़फ़र तो अपना हाल ख़ुद बयान कर गये हैं - कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए, दो ग़ज़ ज़मीन भी न मिली कूए यार में. अंग्रेजों ने उन्हें सिपाही विद्रोह का नायक मानते हुए देश-निकाला दे दिया और उन्हें ख़ाके-वतन भी नसीब न हुई. रह गये ग़ालिब, सो अंग्रेजों से वज़ीफ़ा पाने को दर-बदर ठोकरें खाते रहे. ज़ौक़, मोमिन और अमीर मीनाई ये दिन देखने को ज़िन्दा नहीं थे.
निज़ाम बदला, हिंदुस्तान की तक़दीर बदली, फिर भला शायरी इससे अछूती कैसे रह जाती? लिहाज़ा, ग़ज़ल के इन उस्ताद शायरों के बाद जो शायर आये, उन्होंने ख़ुमो-साग़र और गुलो-बुलबुल के बजाय क़ौमो-वतन के तराने सुनाये. इस दौर में सबसे पहले याद आते हैं - मौलवी मोहम्मद हुसैन आज़ाद (१८२९-१९१०) और मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली (१८४०-१९१६).
- बैठे बेफिक्र क्या हो हम-वतनो! उट्ठो अहले-वतन के दोस्त बनो.
इन्हीं दोनों ने पहली बार यह अहसास दिलाया कि शायरी में माशूक़ की ज़ुल्फ़ों का ही नहीं, देश की दुर्दशा का भी ज़िक्र किया जा सकता है. निगाहों के तीर से घायल होने वालों की ही नहीं, भूख से बिलबिलाते इंसानों की मजबूरी भी बयान की जा सकती है.
- ऐसे ही नंगे हुब्बे-वतन बदनसीब हैं, घर में मुसाफिरों से जो बदतर ग़रीब हैं.
अकबर इलाहाबादी (१८४६-१९२१) इन्हीं बातों को तंज़-ओ-मिज़ाह का जामा पहनाकर पेश करते हैं.
- नेशनल वक़अत के गुम होने का है अकबर को ग़म, ऑफिशल इज्ज़त का उसको कुछ मज़ा मिलता नहीं.
माहौल तैयार हो चुका था, अब इंतज़ार था ऐसी आवाज़ों का जो लोगों में नयी जान फूँक सकें, कौम को नये तेवर से आगे बढ़ने का मन्त्र दे सकें. यह काम किया - डॉ मोहम्मद इक़बाल (१८७५- १९३७) और पंडित बृजनारायण चकबस्त (१८८२-1926) ने.
जहाँ एक तरफ इक़बाल ने हमें अपने ऊपर, अपने इतिहास और भूगोल पर, अपनी गंगा-जमनी तहज़ीब पर नाज़ करना सिखाया-
- सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा.
वहीँ चकबस्त ने हमें वतन से प्यार करना सिखाया. अपनी नज़्म "ख़ाके-हिंद" में वे कहते हैं-
अगली सी ताज़गी है फूलों में और फलों में, करते हैं रक्स अब तक ताऊस जंगलों में
अब तक वही कड़क है बिजली की बादलों में, पस्ती सी आ गयी है पर दिल के हौसलों में
गुल शम-ए-अंजुमन है गो अंजुमन वही है, हुब्बे-वतन नहीं है ख़ाके-वतन वही है.
बरसों से हो रहा है बरहम समां हमारा, दुनिया से मिट रहा है नामो-निशाँ हमारा
कुछ कम नहीं अजल से ख्वाबे-गराँ हमारा, इक लाशे-बेकफ़न है हिन्दोस्ताँ हमारा
इल्मो-कमालो-ईमां बर्बाद हो रहे हैं, ऐशो-तरब के बन्दे ग़फ़लत में सो रहे हैं.
ऐ सूरे हुब्बे-क़ौमी! इस ख़्वाब से जगा दे, भूला हुआ फ़साना कानों को फिर सुना दे
मुर्दा तबीयतों की अफ़सुर्दगी मिटा दे, उठते हुए शरारे इस राख से दिखा दे
हुब्बे-वतन समाये आँखों में नूर होकर, सर में ख़ुमार होकर, दिल में सुरूर होकर.
जब वतन की बात चलती है तो वे हालात की सच्ची तस्वीर पेश करने से ज़रा नहीं हिचकते. इसकी मिसाल है उनकी नज़्म - "फ़रियादे कौम".
लुटे हैं यूँ कि किसी की गिरह में दाम नहीं, नसीब रात को पड़ रहने का मुक़ाम नहीं
यतीम बच्चों के खाने का इंतज़ाम नहीं, जो सुबह ख़ैर से गुज़री उम्मीदे-शाम नहीं
अगर जिये भी तो कपड़ा नहीं बदन के लिए, मरे तो लाश पड़ी रह गयी कफ़न के लिए.
नसीब चैन नहीं भूख प्यास के मारे, हैं किस अज़ाब में हिंदोस्तान के प्यारे.
तुम्हें तो ऐश के सामान जमा हैं सारे, यहाँ बदन से रवां हैं लहू के फव्वारे
जो चुप रहें तो हवा कौम की बिगडती है, जो सर उठायें तो कोड़ों की मार पड़ती है.
अगर दिलों में नहीं अब भी जोश ग़ैरत का, तो पढ़ दो फ़ातहा क़ौमी वक़ारो-इज्ज़त का
वफ़ा को फूँक दो मातम करो मुहब्बत का, जनाज़ा लेके चलो क़ौमी दीनो-मिल्लत का.
निशाँ मिटा दो उमंगों का और इरादों का, लहू में ग़र्क़ सफीना करो मुरादों का.
भंवर में कौम का बेड़ा है हिन्दियो! हुशियार, अँधेरी रात है काली घटा है और मझधार
अगर पड़े रहे ग़फ़लत की नींद में सरशार, तो ज़ेरे-मौजे-फ़ना होगा आबरू का मज़ार
मिटेगी कौम ये बेड़ा तमाम डूबेगा, जहाँ में भीष्मो-अर्जुन का नाम डूबेगा.
चकबस्त शायद उर्दू के ऐसे इकलौते शायर हैं, जिन्होंने अपना कोई तख़ल्लुस या उपनाम नहीं रखा था. चकबस्त उनका पारिवारिक नाम था और उन्हें इसी नाम से जाना जाता है.पेशे से वकील थे और जैसा कि अयोध्या प्रसाद गोयलीय ने अपनी किताब शेर-ओ-शायरी में लिखा है -" वे वास्तव में देश के वकील थे". उन्होंने मनुष्यता को अपनी जाति और देश-सेवा को अपना धर्म बनाया और ताउम्र इसी जाति-धर्म का पालन करते रहे.
अगर दर्दे-मुहब्बत से न इन्सां आशना होता, न मरने का सितम होता न जीने का मज़ा होता.
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर, अगर इनमें से कोई बावफ़ा होता तो क्या होता ?
हविस जीने की है यूँ उम्र के बेकार कटने पर, जो हमसे ज़िन्दगी का हक़ अदा होता तो क्या होता?
ये मरना बेहिजाबाना निगाहें क़हर करती हैं, मगर हुस्ने-हया-परवर का आलम दूसरा होता.
ज़बाँ के ज़ोर पर हंगामा-आराई से क्या हासिल, वतन में एक दिल होता मगर दर्द-आशना होता.
आगरा से 'शायर' रिसाला निकालने वाले प्रोफ़ेसर एजाज़ सिद्दीक़ी लिखते हैं - "चकबस्त की नज़्मों में ख़ाली जोश और नुमाइश ही नहीं, बल्कि इन्क़लाब की दिलचस्प अहमियत और हिम्मत-अफ़ज़ाई भी मौजूद है. वे अपने वतन की तारीफ़ भी करते हैं और फिर ग़ैरत दिलाने के लिए अपनी बेकसी और वतन की बर्बादी का भी ज़िक्र करते हैं. .....उन्होंने न सिर्फ उस तहरीक से दिलचस्पी ली, बल्कि उस तहरीक से दिलचस्पी लेने वालों से भी एक ख़ास क़िस्म की अक़ीदत का इज़हार वक़्तन- फ़वक़्तन ख़ुलूस और जोश के साथ करते रहे. उनके कहे हुए मर्सिये इस अम्र की शहादत के लिए काफी हैं. जब कभी किसी ख़ास रहनुमा का इंतक़ाल होता था तो उसका मातम निहायत जोश के साथ अपनी शायरी में करते थे. इस सिलसिले में चकबस्त आप अपनी ही मिसाल हैं"
बाग़बाँ ने ये अनोखा सितम ईजाद किया, आशियां फूँक के पानी को बहुत याद किया.
दरे-ज़िन्दां पे लिखा है किसी दीवाने ने, वही आज़ाद है जिसने इसे आबाद किया.
जिस पर एहबाब बहुत रोये फ़क़त इतना था, घर को वीरान किया, क़ब्र को आबाद किया.
इसको नाक़द्रिये आलम का सिला कहते हैं, मर चुके हम तो ज़माने ने बहुत याद किया.
चकबस्त भले ही इसे "नाक़द्रिये आलम का सिला" कहते हों लेकिन १२ जनवरी १९२६ को, महज़ ४४ साल की उम्र में जब उनका इंतक़ाल हुआ, तब लखनऊ की अदालतें बंद कर दी गयीं, शोक-सभाएं हुईं, जाने-माने शायरों ने नौहे पढ़े, तारीख़ें कहीं. ज़माना आज तक उन्हें याद करता है, और उन्हीं का यह शेर पढ़कर याद करता है
- चिराग़ कौम का रौशन है अर्श पर दिल के, इसे हवा के फ़रिश्ते बुझा नहीं सकते.

Tuesday, May 29, 2012

Salil Chowdhury- एक विलक्षण प्रतिभा

सलिल चौधरी, एक नाम, एक व्यक्तित्व, एक अदभुत संगीतकार, एक विलक्षण प्रतिभा।  हिन्दी फ़िल्म संगीत के स्वर्णिम दौर के सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में से एक - सलिल चौधरी।

शांत चेहरे और बैचेन नज़रों के पीछे रचनात्मकता का गहरा समुद्र छुपाये, सलिल दा ने न जाने कितनी कालजयी रचनाओं को जन्म दिया।  उन्होंने लगभग ७५ हिन्दी फिल्मों और २६ मलयालम फिल्मों के अलावा बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड, गुजराती, मराठी, असमिया और ओडिया फिल्मों में भी संगीत दिया और क्या खूब दिया !

सलिल चौधरी का जन्म १९ नवम्बर १९२२ को बंगाल के दक्षिण चौबीस परगना जिले के एक गाँव में हुआ था। पिता ज्ञानेन्द्र चौधरी आसाम के चाय बागान  में डॉक्टर थे और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के शौक़ीन।  बचपन से सलिल घर के भीतर उनके रिकॉर्ड और बाहर गूँज रहे बागान मज़दूरों के गीत सुन सुनकर बड़े हुए।  कहते हैं कि आठ साल की उम्र में ही वे उम्दा बाँसुरी बजाने और गाने लगे थे। बड़े भाई के ऑर्केस्ट्रा की बदौलत कई और वाद्य बजाना सीख गए, जिनमें इसराज, वॉयलिन और पियानो प्रमुख थे।  उनके पिता चाय बागानों में काम करने वाले गरीब मजदूरों-कुलियों को साथ लेकर नाटकों का मंचन किया करते थे, जिनमें ब्रिटिश शासकों के अन्याय और शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी जाती थी। सलिल दा ने पिता से संगीत प्रेम के साथ समाजवादी विचारधारा भी विरासत में पायी। 

बीज पड़ चुका था, उसे खाद पानी दिया कोलकाता के माहौल ने, जहाँ वे उच्च शिक्षा के लिए गये। बंग्बाशी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे कम्युनिस्ट पार्टी और ’इप्टा’ के सदस्य बने। इस दौर में उन्होंने कई गीत लिखे जो युवाओं के बीच बेहद प्रचलित हुए। बाद में उन्होंने कवि सुकांत भट्टाचार्य की ऐसी ही एक रचना को संगीतबद्ध किया और हेमंत कुमार से गवाया। 

माहौल कुछ ऐसा था कि सलिल दा की रचनात्मकता ऊंची उड़ानें भर रही थी और वे लेख, कविता, कहानी, निबंध, बहुत कुछ लिखते जा रहे थे।  इसी बीच, कोलकाता के एक ग़रीब रिक्शावाले पर आधारित उनकी कहानी पर इसी नाम से बांग्ला फिल्म बनी। बिमल रॉय ने उसे “दो बीघा जमीन” नाम से हिन्दी में बनाया।  १९५३ में हिंदी फिल्मों से नाता क्या जुड़ा कि वे विधिवत संगीतकार बन गये और आने वाले कई दशकों तक सुरों की अनवरत वर्षा करते रहे।
-- धरती कहे पुकार के (दो बीघा ज़मीन)

राज कपूर की फ़िल्मों का संगीत हमेशा शंकर- जयकिशन की जोड़ी ही दिया करती थी लेकिन जब उन्होंने लीक से हटकर जागते रहो बनायी तो उसके संगीत निर्देशन का ज़िम्मा सलिल दा को सौंपा. इस फिल्म के क्लाईमैक्स का  गीत न सिर्फ आर के बैनर से नर्गिस की विदाई का गीत है बल्कि ख़ुद एक अहम् किरदार का दर्जा रखता है. कहते हैं, राज कपूर ने इस गीत की रिकार्डिंग के दौरान शंकर जयकिशन को विशेष रूप से आमंत्रित किया था ताकि वे सलिल दा की रचना प्रक्रिया को देख सकें.
--- जागो मोहन प्यारे (जागते रहो)

सलिल दा की आसान सी दिखने वाली रचनाओं में भी कुछ ऐसे गूढ़ प्रयोग होते थे जो महान गायकों को भी उलझन में डाल देते थे. माया फिल्म के एक गीत के लिए रफ़ी साहब जैसे मंझे हुए कलाकार को १२ - १३ रीटेक देने पड़े थे तब कहीं जाकर सलिल दा संतुष्ट हुए थे. लता जी को यह मुश्किल पेश नहीं आई क्योंकि वे दो वर्ष पूर्व इसी रचना को बांग्ला में गा चुकीं थीं.
-- ओगो आर किछु तो नाय
-- तस्वीर तेरी दिल में (माया)

सलिल दा के गीतों में साजों का प्रयोग लाजवाब होता था. लता जी कहती हैं कि सलिल दा की बंदिशों में संगीत के इतने छोटे-छोटे टुकड़े और औचक ट्रांजीशन होते थे कि उन्हें बेहद सजग होकर गाना पड़ता था. उनके कम्प्यूटरी दिमाग में एक साथ न जाने कितने साज बजते रहते थे और सबके सब सिंफनी में. सुनने वाले वाद्यों के संयोजन से उनकी कृतियों को पहचान सकते हैं. जैसे फ़िल्म छाया का यह गीत
--- दिल से दिल की डोर बाँधे (छाया)

इसी फिल्म के एक गीत को लेकर सलिल दा पर आरोप लगा कि उन्होने मोत्ज़ार्ट की सिम्फनी  की  नक़ल की है. लेकिन हकीकत ये है कि उन्होंने इस सिम्फनी के केवल पहले पाँच “बार” ही लिए हैं और बाकी पूरा गीत खुद गढ़ा था. इस बारे में सलिल दा कहते थे कि मैं इन महान संगीतकारों की रचनाओं से प्रेरणा लेता हूं, उनकी बनाई धुनों को “रॉ मैटिरियल” की तरह उपयोग में लाता हूं और उन्हें भारतीय परिवेश में ढाल कर धुन गढ़ता हूं. फ़िल्म छाया का टाइटल म्युजिक भी सलिल दा ने बीथोवन की सिम्फनी से प्रेरित हो के बनाया था.
--- इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा  (छाया)

मधुमती के संगीत को सलिल दा की संगीत यात्रा का चरम उत्कर्ष कहा जा सकता है.  इस फ़िल्म के लिये उन्हें सर्वष्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरुस्कार दिया गया. " आजा रे परदेसी " 'वर्ष का सबसे प्रसिद्ध गीत रहा. इस गीत के लिये बेसिक मेलोडी में सेवेन्थ कॉर्ड का प्रयोग किया  गया है जो अपने आप में एक अधूरापन लिये है और नायिका के अधूरेपन और अधूरी चाह से मेल खाता है।
-- आजा रे मैं तो कबसे खड़ी इस पार  (मधुमती)

मुकेश सलिल दा के पसंदीदा गायक थे. रेंज की  कमी के आरोपों के बावजूद सलिल दा ने मुकेश जी से कुछ बेहद खूबसूरत गीत गवाए हैं. जैसे “कैसे मनाऊं पियवा”, “ये दिन क्या आये”, “कई बार यूं भी देखा है”, “नैन हमारे सांझ सकारे”, “कहीं दूर जब दिन ढल जाये ” या फिर मधुमती का यह बेहद लोकप्रिय गीत.
--  सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं (मधुमती)

तलत महमूद के साथ सलिल दा ने गिने चुने गीत किये, मगर फ़िल्म “एक गाँव की कहानी” में गाये उनके गीतों का शुमार उनके श्रेष्ठ गीतों मे होता है. तलत साहब की मखमली आवाज़ और सलिल दा का वाद्य संयोजन मिलकर तन्हाई और उदासी का ऐसा आलम गढ़ते हैं कि सुनने वालों पर जादुई असर होता है.
-- रात ने क्या क्या ख्वाब दिखाये (एक गाँव की कहानी)

१९६१ में आयी फ़िल्म माया भी संगीत के इस सफ़र का महत्वपूर्ण पड़ाव है. लता जी की आवाज़ में यह दर्द भरा गीत भी इतना मधुर बन पड़ा है, कि दर्द के बजाय आनन्द की अनूभुति कराता है.
--- जा रे जा रे उड़ जा रे पाखी (बांगला)
“जा रे जा रे उड़ जा रे पंछी” ( माया )

पूनम की रात फिल्म में सलिल दा को एक बार फिर रहस्य की चादर ओढ़े माधुर्य रचने का मौक़ा मिला और इस बार भी उन्होने सुनने वालों को निराश नहीं किया. एक और मधुर हॉन्टिंग मैलोडी उभरी.
--- साथी रे तुझ बिन जिया उदास रे (पूनम की रात)

सलिल दा के संगीत में लोक गीतों का बहुत प्रभाव दिखाई देता है.एक बार काठमांडू यात्रा के दौरान सलिल दा ने रात में होटल के चौकीदार को एक नेपाली लोक गीत गाते सुना और जन्म हुआ फ़िल्म नौकरी के इस खूबसूरत गीत का.
-- छोटा सा घर होगा (नौकरी)

एक और पहाड़ी लोकगीत मिलता है मधुमती में
--- दैया रे दैया रे चढ़ गयो पापी बिछुआ ( मधुमती )

१९६५ में बनी मलयालम फ़िल्म "चेमीन" साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तकशी शिवशंकर पिल्लै के उपन्यास पर आधारित थी. समुद्र किनारे बसने वाले मछवारों के प्रेम त्रिकोण पर आधारित इस उपन्यास का कई  भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, रुसी, जर्मन, इटालियन और फ्रेंच भाषा में भी अनुवाद हुआ.   निर्देशक रामू करिआत ने संगीत का जिम्मा सौंपा हमारे सलिल दा को. सलिल दा जानते थे कि उन पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और वे इसमें कोई कोर कसर नही छोड़ना चाहते थे. सो वे अचानक  मुंबई से ग़ायब हो गए और वह भी दो-एक दिन के लिए नहीं, बल्कि चार पाँच महीनों के लिए. किसी को पता नहीं था कि वे केरल में मछवारों की बस्ती में उनके साथ रह रहे थे ताकि उनके जीवन को नज़दीक से देख सकें और उनके संगीत को आत्मसात कर सकें. तभी तो बन सके फिल्म "चेमीन" के यादगार गीत.

इस फ़िल्म के संगीत ने मलयालम संगीत का पैटर्न ही बदल डाला. यहीं सलिल दा को मिला एक बेहद प्रतिभाशाली गायक -येसुदास. सलिल दा ने “छोटी सी बात” में येसुदास और आशा जी की आवाज़ में एक गीत बनाया, जिसे पर्दे पर अतिथि कलाकार धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी ने अदा किया.
-- जानेमन जानेमन (छोटी सी बात)

 स्वामी विवेकानंद" के जीवन पर आधारित फ़िल्म में सलिल दा ने ८ गीत स्वरबद्ध किए. कुछ ख़ुद विवेकानंद जी के लिखे गीत हैं  तो कुछ कबीर, जयदेव और सूरदास के. दो गीत गुलज़ार साहब ने लिखे हैं, जिसमें येसुदास का गाया बेहद खूबसूरत "चलो मन" भी शामिल है. एक और गीत "जाना है जाना है..." को उनकी बेटी अंतरा चौधरी ने आवाज़ दी है.

अंतरा जब काफी छोटी थीं तभी उन्होंने मीनू फिल्म में प्रमुख भूमिका निभाने वाली बाल कलाकार के लिए पार्श्व गायन किया था. बताया जाता है कि इस फिल्म के एक गीत की रेकॉर्डिंग सात रीटेक के बाद जाकर पूरी हुई. वजह थे मन्ना डे, जो गाते गाते बीच में रुक जाते थे. उनकी यह परेशानी देखकर सलिल दा ने पूछा, दादा कोई दिक्कत है गाने में ? तो बोले नहीं, ये लड़की इतना बढ़िया गा रही है कि मेरा ध्यान इसको सुनने में चला जाता है।
--- तेरी गलियों में हम आये ( मीनू )

सलिल दा ने कई नाटकों और बैले के लिए भी संगीत दिया. सचिन शंकर बेले यूनिट द्वारा १९७१ में रचित  "बोटमेन ऑफ़ ईस्ट बंगाल" में उनका एक गीत बहुत ही सुन्दर बना, दयानी करिबो अल्लाह रे" जिसे पंकज मित्रा ने अपनी महकती आवाज़ से सजाया. सलिल दा के गहरे दोस्त, लोक गायक निर्मलेंदु चौधरी ने इसी धुन पर हिन्दी फ़िल्म लालबत्ती (१९५७) के लिए "क्या से क्या हो गए अल्लाह रे' गाया था.

७० के दशक के प्रारंभ में हिन्दी सिनेमा और संगीत ने बहुत बड़े बदलाव की लहर देखी. पुराने दौर के नायकों की जगह ली रोमांटिक राजेश खन्ना और एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन ने. एक नये किस्म के सिनेमा का जन्म हुआ  जिसे “मिडल ऑफ़ द रोड” सिनेमा का नाम दिया गया. ह्रषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी, गुलज़ार जहाँ इसके पुरोधा बने वहीँ संगीतकार के तौर पर सलिल दा इसके “फ़्लैग बीअरर” बने. इस दौर की एक सफल फिल्म थी आनन्द, जिसे आज तक राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के अभिनय, हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन, गुलज़ार के संवादों और सलिल चौधरी के गीतों के लिए याद किया जाता है। इस फ़िल्म में मुकेश का गाया यह गीत उनके सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है।

--- मैंने तेरे लिए ही सात रंग के (आनंद)

आनंद में महिला किरदारों के गीत की गुन्जाइश नहीं थी, लेकिन सलिल दा का संगीत हो और लता जी एक भी गीत न गायें? यह कैसे मुमकिन था? लिहाज़ा ह्रषि दा ने गीत की सिचुएशन निकाली और सलिल दा ने धुन  बनाई। निर्देशक और संगीतकार के बीच गलतफहमी की वजह से एक ही धुन पर दो अलग अलग गीतकारों गुलज़ार और योगेश ने अलग अलग गीत लिख लिए. ह्रषि दा को यह पता नहीं था. उन्होने गुलज़ार का गीत फ़ाइनल कर दिया| बाद में उन्होंने योगेश से एक और गीत - कहीं दूर जब दिन ढल जाए - लिखवाया। फ़िलहाल सुनिए लता जी का यह गीत|
---ना जिया लागे ना (आनंद)

उन्हीं दिनों आयी फ़िल्म अन्नदाता में जया भादुड़ी के सहज अभिनय के साथ-साथ “रातों के साये घने”, “नैन हमारे साँझ सकारे ” और “गुजर जाए दिन” जैसे गीत भुलाये नहीं भूलते हैं. कहा जाता है कि गुज़र जाये दिन गाने में किशोर कुमार को बहुत कठिनाई हुई थी और १७ रीटेक के बाद रेकॉर्डिंग पूरी हो सकी थी. किशोर कुमार इसे अपने गाए सबसे बेहतरीन और कठिन गीतों में से एक मानते थे.
--- गुज़र जाये दिन (अन्नदाता)

इसी दौर की एक और फिल्म थी रजनीगंधा जो अपने मधुर संगीत के लिये आज भी जानी जाती है। गायक मुकेश को इस फ़िल्म के गीत “कई बार यूं ही देखा है” के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया । फ़िल्म के शीर्षक गीत को लता जी ने अपने स्वर माधुर्य से गरिमा प्रदान की और उस दौर के सर्वश्रेष्ठ गीतों में जगह दिलाई.
--- रजनीगंधा फूल तुम्हारे (रजनीगंधा )
जागते रहो में एक दार्शनिक गीत था “ज़िंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या” जो महान कलाकार मोतीलाल जी पर फ़िल्माया गया था। सलिल दा की संगीत रचना और मुकेश के स्वर ने नशे में दार्शनिक बातें करने वाले इस चरित्र को जीवंत बना दिया।
--- ज़िंदगी ख्वाब है (जागते रहो)

१९५४ में आयी फ़िल्म परिवार में सलिल दा ने राग हंसध्वनी में  जो गीत रचा, वह आज भी लोगों को झूमने पर मजबूर कर देता है.
-- जा तोसे नहीं बोलूं कन्हैया (परिवार )

इसी तरह फ़िल्म परख में लता जी के गाये इस गीत की बानगी देखिये
--- ठन्डे ठन्डे हरे हरे नीम तले (परख )

और यही धुन बांग्ला शब्दों के साथ, सलिल दा की पत्नी सबिता चौधरी के स्वर में
--- एने दे एने दे 

बांग्ला संगीत की बात चली है तो यह भी बताते चलें कि सलिल चौधरी और हेमन्त कुमार की संगीतकार-गायक की जोड़ी ने बहुत से यादगार गीत दिये हैं. एक समय था जब यह जोड़ी बांग्ला संगीत में शीर्ष स्थान रखती थी.

सलिल दा ने कोरस का बेहतरीन उपयोग किया है. कई बार वे स्थायी और अंतरे के बीच वाद्यों की जगह कोरस का इस्तेमाल करते थे. जैसे -
-- ज़िन्दगी कैसी है पहेली (आनंद )
-- न जाने क्यूं (छोटी सी बात)

बहुत मीठे और रोमानी गीत रचे सलिल दा ने. जैसे फ़िल्म “उसने कहा था” का यह गीत, जिसमें रात और बारिश के वातावरण को वाद्य संयोजन से सजीव बनाया गया है. हेमंत कुमार और लता का गाया यह गीत इतना प्यारा है, इसकी धुन इतनी मीठी है, इसकी लय इतनी दिलकश है कि लगता है बस सुनते ही रहें....
--- आहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे (उसने कहा था) 

वैसे भी सलिल दा जैसे वर्षा के गीत और कहाँ हैं? सच कहिये जब आकाश में बदल घिर रहे हों, तब सबसे पहले आपको कौन सा गीत याद आता है? यही न?
--- ओ सजना बरखा बाहर आई (परख )

एच. एम. वी ने अपनी स्वर्ण जयंती पर शास्त्रीय और फ़िल्म संगीत के महान कलाकारों से अपने पसंदीदा गीत चुनने को कहा था. और शायद आप को आश्चर्य हो कि यह गीत उन सभी की सूची में शामिल था. लता जी भी इसे  अपने सर्वश्रेष्ठ गीतों में स्थान देती हैं। और उससे भी ज़्यादा मज़े की बात ये कि सलिल दा की कार के वाईपर्स की धुन और लय से इसका जन्म हुआ था। ऐसे थे हमारे सलिल दा ...जिनके लिए कण कण में संगीत रचा बसा था.  यह उनकी विलक्षण प्रतिभा और सृजनशीलता का कमाल था कि जहाँ एक ओर उन्होंने चम्पावती जैसे मस्ती में झूमते गीत रचे वहीँ गाँव-घर के आँगन में मधुर दीपक की लौ सरीखा यह गीत भी दिया.
--- मेरे मन के दिए (परख ) ( अंत तक अंडर प्ले )

नियोन रौशनी की चकाचौंध के बीच माटी के इस दिए का मोल कभी कम नहीं होगा..... हो ही नहीं सकता.

क्या है ग़ज़ल?

उर्दू शायरी की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा है ग़ज़ल. यह बात दीगर है कि हिंदी पट्टी वाले उसे मूंगफली और तिल - गुड़ की गजक की तरह "गजल" बोल डालते हैं, लेकिन इससे ग़ज़ल के प्रति उनका लगाव तो कम नहीं हो जाता. जब तक ग़ज़लें बेगम अख्तर या फ़रीदा ख़ानम की आवाज़ में सुनने को मिलती थीं, कोई- कोई बिरले ही उसके मुरीद होते थे. लेकिन भला हो जगजीत और चित्रा सिंह का जिन्होंने ग़ज़ल को चुनिन्दा कद्रदानों की महफ़िल से निकाला और गली -मोहल्ले की खुली हवा में गुँजा दिया. फिर तो अकेले जगजीत ही क्यों, मनहर और पंकज उधास, चन्दन दास, तलत अज़ीज़, पीनाज़ मसानी और अहमद और मोहम्मद हुसैन के स्वर भी अक्सर सुनाई देने लगे. सरहद पार से मेहदी हसन और ग़ुलाम अली साहबान भी अक्सर इधर तशरीफ़ लाने और हमें अपनी ग़ज़लों से लुभाने लगे.
ग़ज़ल से हमारा परिचय तो खूब बढ़ा लेकिन सच पूछिए तो हम अब तक उसके सही स्वरूप से परिचित नहीं हैं. क्या है ग़ज़ल?
शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो ग़ज़ल हसीनों से या उनके बारे में बातचीत करने का तरीक़ा है. यह शब्द अरबी के गज़ाला और अंग्रेज़ी के gazelle से उर्दू में आया है. इसका अर्थ है खूबसूरत आँखों वाली हिरनी. ज़ाहिर है शेरो-शायरी की यह विधा ज़्यादातर हुस्न-ओ-इश्क़ की दास्ताँ बयान करने के काम में आती है. ग़ालिब भी जिन मीर साहब का लोहा मानते थे - ( रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब, कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था ),

वही मीर फरमाते हैं -
हस्ती अपनी हुबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है.
मीर उन नीमबाज़ आँखों की
सारी मस्ती शराब की सी है.

ग़ज़ल के कलेवर में शायर को अपनी बात कहने की छूट रहती है. एक ही ग़ज़ल में वह हालात का भी ज़िक्र कर सकता है, महबूब की शोखी और अपनी लाचारी भी बयान कर सकता है.

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी.
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी.
उनकी आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी मायल कभी ऐसी तो न थी.

ग़ज़ल के हर शेर में दो मिसरे यानी पंक्तियां होती हैं. पहले मिसरे को मिसरा-ए- ऊला और दूसरे को मिसरा-ए-सानी कहते हैं. जैसे बहादुर शाह ज़फ़र की इस ग़ज़ल में मिसरा-ए-ऊला है - बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी,  और मिसरा-ए-सानी है - जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी.
ग़ज़ल के पहले शेर को मतला कहते हैं. इस शेर के दोनों मिसरों के अंतिम कुछ शब्द एक जैसे होने चाहिए, जैसे यहाँ - "कभी ऐसी तो न थी" ये शब्द हैं.

अंतिम शेर को मक़ता कहा जाता है. अमूमन इसमें शायर का नाम या तख़ल्लुस भी होता है, जैसे इस ग़ज़ल में मक़ता है - क्या सबब तू जो बिगड़ता है "ज़फ़र" से हर बार, के तेरी हूर शुमायल कभी ऐसी तो न थी.
ग़ज़ल के मीटर को "बहर" कहते हैं. एक ग़ज़ल में कितने ही शेर हो सकते है मगर सब एक ही बहर में होने चाहिए. हिंदी या संस्कृत की तरह इसमें ह्रस्व- दीर्घ के अलग-अलग संयोजन वाले निश्चित छंद नहीं हैं. शायर अपनी बात कहने के लिए कोई भी बहर चुन सकते हैं. उर्दू अदब में वैसे तो १९ बहर बतायी गयी हैं लेकिन आम तौर पर ३ बहर पायी जाती हैं. छोटी, मंझोली और बड़ी.
छोटी बहर -  कोई उम्मीद बर नहीं आती,
                  कोई सूरत नज़र नहीं आती.

 मंझोली बहर -   बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं,
                      तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं.

 बड़ी बहर -     आशियाँ जल गया गुलसिताँ लुट गया अब क़फ़स से निकल कर किधर जायेंगे,
                      ऐसे मानूस सैयाद से हो गए अब रिहाई मिलेगी तो मर जायेंगे.

 ग़ज़ल में दूसरी पाबन्दी होती है - रदीफ़ और काफ़िया.
पहले शेर के दोनों मिसरे और बाक़ी शेरों के दूसरे मिसरे के अंतिम शब्द एक जैसे होने चाहिए. जैसे छोटी बहर के उदाहरण में ग़ालिब की जो ग़ज़ल दी है, उस पूरी ग़ज़ल का हर शेर "नहीं आती" से ख़त्म होता है. यह रदीफ़ है.
 रदीफ़ से पहले के शब्दों में भी एकरूपता रखी जाती है,  जैसे - बर नहीं आती, नज़र नहीं आती, बात पर नहीं आती, रात भर नहीं आती. इसे काफ़िया कहते हैं. कच्चे शायर रदीफ़ का तो ध्यान रख लेते हैं पर कभी-कभी काफ़िया मिलाने में चूक जाते हैं. 

हिंदी और संस्कृत साहित्य में जिस तरह "समस्यापूर्ति" की परंपरा थी, उसी तरह उर्दू शायरी में भी "तरही मुशायरे" होते थे. शायरों के आगे एक मिसरा रख दिया जाता था, जिस पर वे पूरी ग़ज़ल कहते थे.
कैफ़ी आज़मी साहब कुल जमा ११ साल के थे, जब अपने बड़े भाई के साथ एक मुशायरे में गए. वहां उन्होंने अपनी लिखी ग़ज़ल पढ़ी लेकिन लोगों ने यही समझा कि बड़े भाई ने अपनी लिखी कोई ग़ज़ल पकड़ा दी है. बाद में इनका इम्तिहान लेने के लिए एक और मिसरा दिया गया - "इतना हँसो कि आँख से आँसू निकल पड़ें". उन्होंने वहीँ बैठे-बैठे ३-४ शेर कहे. बाद में वही ग़ज़ल न जाने कैसे बेगम अख्तर के हाथ लग गयी. उन्होंने उसे गाया और ग़ज़ल  सारे ज़माने में मशहूर हो गयी.
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े.

शेरो-शायरी की बात चले और बैत बाज़ी का ज़िक्र न हो तो कुछ अधूरा -सा लगता है. शेर का एक दूसरा नाम बैत भी है. इसीलिए ग़ज़ल का जो शेर सबसे ख़ास समझा जाता है, उसे हासिल-ए-ग़ज़ल या बैतुल-ग़ज़ल कहा जाता है. जब तक हमारे बच्चों को फ़िल्मी गानों की अन्ताक्षरी का रोग नहीं लगा था तब तक हम सब दोहों-चौपाइयों से अन्ताक्षरी या शेरों से बैत बाज़ी में समय बिताते थे. तब हमने जो कवितायेँ या शेर याद किये थे, वे आज तक हमारी स्मृतियों में वैसे ही सजीव हैं और अनायास हमें जीवन की कठिनाइयों से जूझने का साहस और धैर्य दे जाते हैं.

Monday, April 09, 2012

On Veena's 60th birthday

पचास साल पहले मेरे नानाजी रिटायर होकर बनारस आये थे. शहर हमारे लिए नया नहीं था लेकिन मोहल्ला नया था. मैं और मेरा भाई घर के लॉन में खेल रहे थे. तभी मेन गेट के पास से मेरी एक हम-उम्र लड़की ने हेलो कहा. मैं उसे नहीं पहचान सकी क्योंकि मेरे लिए सभी चेहरे बिलकुल नये थे लेकिन उसने मुझे पहचान लिया ..... मैं उसी के स्कूल में और उसी की क्लास में थी. छठीं कक्षा से बी ए तक हम साथ पढ़े, साथ खेले. जन्म-दिन की पार्टी हो या शादी... हमें एक साथ ही बुलाया जाता था. हमारा अन्योन्याश्रित  सम्बन्ध जो था.
बी ए की पढ़ाई के बीच ही वीणा की शादी तय हो गयी. शादी में हमारी बहुत सारी सहेलियां आयी थीं. हमने खूब गाने गाये, मस्ती की, जीजाजी के साथ चुहलबाजी की.... फेरे का समय देर रात का था. एक-एक करके सारी सहेलियां चली गयीं. मेरे घर से भी बुलावा आ गया था. वीणा को मंडप तक पहुँचाने के बाद मैं भी वहाँ से खिसकने की सोच रही थी. तभी वीणा ने अपने बेहद ठन्डे हाथ से मेरा हाथ पकड़कर कहा- तुम तो रुकोगी न?
मैं रुक गयी. मुझे रुकना ही पड़ा.
मैं पढ़ाई में लगी रही. बीच-बीच में जब कभी वीणा बनारस आती... हम मिलते. ये जो Aviance की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट हैं.... विनीता जी...ये घर वालों को बताये बिना, चुपके से सड़क पारकर अक्सर मेरे पास आ जाती थीं. न जाने हमारी क्या बातें होतीं...
मेरी शादी के समय तक सारी सहेलियां बिखर चुकी थीं. न जाने कौन कहाँ थी. मेरे पास सिर्फ वीणा का पता था... मैंने इसे क्या लिखा था यह तो याद नहीं है लेकिन मेरे उस पत्र ने शायद वीणा के ठन्डे हाथ जैसा काम किया .... वीणा नन्हे विक्की को छोड़कर आयी और बराबर मेरे आसपास बनी रही. 
उसके बाद से न जाने कितना समय गुज़र चुका है....सुख-दुःख का पहिया न जाने कितनी बार ऊपर-नीचे हो चुका है....लेकिन हमारी दोस्ती की धुरी मज़बूती से जमी हुई है...
हमने शायद कभी ये बात एक-दूसरे से कही नहीं है....... लेकिन हम दोनों जानते हैं कि हम एक-दूसरे के साथ खड़े हैं ..... सुख में भी और दुःख में भी.
पचास साल पहले मुझे हेलो कहकर दोस्त बनाने के लिए धन्यवाद, वीणा,

Wednesday, April 04, 2012

फ्रॉम मी टु यू ---- सत्या सरन

समीक्षा : डॉ शुभ्रा शर्मा

समाचार क्षणिक होते हैं. एक दिन की खबर चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो, अगले दिन बासी हो जाती है. आज का समाचार-पत्र कल की रद्दी बन जाता है. लेकिन उसी समाचार-पत्र में कुछ सामग्री ऐसी भी होती है, जो शाश्वत होती है और सदा प्रासंगिक रहती है क्योंकि उसमें जीवन के अनुभवों का निचोड़ होता है. इसीलिए पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों की दैनिक, साप्ताहिक अथवा पाक्षिक टिप्पणियां कभी बासी नहीं होतीं. उदाहरण के लिए जनसत्ता में बरसों-बरस छपने वाला प्रभाष जोशी का कॉलम 'कागद कोरे' अगर शाश्वत न होता तो क्या पाँच-पाँच जिल्दों में प्रकाशित होता? या फिर अंग्रेजी पत्रिका फेमिना में छपने वाला सत्या सरन का कॉलम 'मी टु यू' अगर आज भी प्रासंगिक न होता तो पुस्तक के रूप में कैसे प्रकाशित होता?

हाल में प्रकाशित यह पुस्तक आकार में छोटी है, मात्र 212 पृष्ठ हैं, इसलिए लेटे, बैठे या यात्रा करते हुए आराम से पढ़ी जा सकती है. हर लेख स्वतन्त्र है और लगभग दो से ढाई पृष्ठ का है. कुछ शब्द चित्र हैं, कुछ अमिट छाप छोड़ने वाली घटनाएं हैं और कुछ सोचने के लिए मजबूर करने वाली टिप्पणियां हैं. कई जगह ऐसा लगता है कि उस दिन, कुछ ऐसी ही परिस्थिति में आपने भी ठीक ऐसा ही सोचा था. बस, आप भूल गए मगर सत्या जी ने उसे कलमबद्ध कर दिया.

जैसे चौराहे पर भीख मांगती वह कम उम्र की लड़की जिसे देखकर आपने सोचा था कि अगर वह साफ-सुथरी होती, अपनी हम-उम्र लड़कियों जैसे कपडे पहने होती तो कितनी सुन्दर दिखती ......
या जैसे बाथरूम में तौलिये पर चढ़ती मकड़ी को आपने सिर्फ पानी फेंककर हटाना चाहा था, लेकिन वह नाली में बह गयी थी और तब क्षण भर के लिए आपको इस अकारण हत्या पर पछतावा हुआ था .....
या जैसे उस दिन आपने चलती ट्रेन से एक बड़ा शांत, सुरम्य गाँव देखकर सोचा था....काश आप अपनी उम्र का संध्याकाल यहाँ बिता पाते....

पुस्तक के लेखों को पाँच शीर्षकों के अंतर्गत रखा गया है. मुलाकातें, विचार, शहरी जीवन, दृष्टिकोण और प्रकृति. मुलाकातों में से सबसे दिलचस्प है सौन्दर्य प्रतियोगिता में भाग लेने वाली लड़कियों की मदर टेरेसा से भेंट, जिसमें वे अनायास विनम्रता और करुणा का पाठ सीखती हैं. गुजरात के किसी अनाम ठिकाने की भूतपूर्व महारानी, जब फैशन शूट के लिए गए सामान्य जन को चाय पर बुलाती हैं और उन्हें अपने जीवन के अनुभव सुनाती हैं तो कहीं अधिक गरिमामयी और भव्य लगने लगती हैं. वह टैक्सी ड्राईवर भी, जिसके साथ सफ़र करना सत्या जी को ऐसा लगता है जैसे नाना-दादा से लिफ्ट ली हो.

सत्या जी की पर्यावरण विषयक चिंता बार-बार सामने आती है. कभी वे सड़क निर्माण के लिए काटे जाने वाले पेड़ों के लिए दुखी होती हैं तो कभी पोलीथिन- प्लास्टिक के गैर-ज़रूरी इस्तेमाल से परेशान होती हैं. इस सन्दर्भ में एक लेख खास तौर पर उल्लेखनीय है, जिसमें एक पढ़े-लिखे सभ्य-सुसंस्कृत परिवार की रेल-यात्रा का वर्णन है. महिला सफाई का बहुत ध्यान रखती हैं, बार-बार अपने बच्चे के हाथ-मुंह टिशु पेपर से पोंछती हैं, खाना-पीना ढंककर रखती हैं, इस्तेमालशुदा कप-प्लेट-चम्मच पोलीथिन बैग में जमा करती जाती हैं और जब गाड़ी एक सुरम्य जंगल के बेहद खूबसूरत झरने के पास से गुज़रती है तब उस बैग को झरने में उछाल देती हैं. कहानी ख़त्म. कोई टिप्पणी नहीं. शायद सत्या जी चाहती हैं कि आप उस महिला के अपराध की गंभीरता को स्वयं समझें.

पुस्तक में सत्या सरन का प्रकृति से लगाव जगह जगह बिखरा पड़ा है. चाहे बचपन की स्मृतियों से उभरा ब्रह्मपुत्र का किनारा हो या कार पार्क में मंडराता भौंरा, इवनिंग वॉक के दौरान पीले फूलों से ढँका कोना हो या मॉनसून की पहली बारिश का ड्रामाई अंदाज़, या फिर आधी रात को सूनी सड़क पर साथ-साथ चलता चाँद - महानगर की तमाम व्यस्तताओं के बीच वे यह सब देख लेती हैं, यह भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है.

पुस्तक की भूमिका में गुलज़ार साहब ने लिखा है कि उन्हें कवि होना चाहिए था ..... कि फ्रॉम मी टु यू के लेख वास्तव में कविता ही हैं. लेकिन मेरा मानना है कि अच्छा हुआ सत्या सरन ने ये सारी बातें कविता के रूप में न कहकर अपने कॉलम में कहीं, क्योंकि आज की वास्तविकता यह है कि लेख या सम्पादकीय तो हम चलते-फिरते पढ़ भी लेटे हैं, मगर कविता पढने के लिए मानस बनाना पड़ता है. मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानती हूँ जो कविता देखते ही पन्ना पलट देते हैं. कहते हैं - भई, ये कविता-शविता हमारे बस कि बात नहीं है.

सत्या सरन ने 1993 से 2004 तक फेमिना का संपादन किया और इस दौरान निरंतर ये कॉलम लिखा. इसे वे पत्रिका के अंतिम पृष्ठ पर छापती थीं क्योंकि उनका मानना है कि चाय का पूरा कप ख़त्म कर चुकने के बाद जब अंतिम घूँट के साथ जमी हुई चीनी मिलती है तो बड़ा सुखद आश्चर्य होता है और वह मिठास देर तक आपके साथ बनी रहती है. इस पुस्तक की भी यही कैफियत है.
                                                                  
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