Saturday, May 28, 2016

जय जगदीश हरे

कल एक मित्र ने फेस बुक पर आनंद मठ का वह बड़ा ही सुमधुर गीत - जय जगदीश हरे - पोस्ट किया। एक अन्य मित्र ने सवाल उठा दिया कि गीता दत्त और हेमंत कुमार का गाया यह गीत आखिर कह क्या रहा है। सच ही तो है जिसने कवि जयदेव की कोमल कान्त पदावली नहीं पढ़ी है, वो तो बेचारे सिर्फ़ "जय जगदीश हरे" की टेक ही पकड़ पाते हैं।

ये सवाल एक समय मेरे मन में भी उठा था। उन दिनों बनारस में मेरी नानी की भजन मंडली हर शनिवार को जमा होती थी और भजन-कीर्तन से मन बहलाती थी। मैं बराबर नए गीतों की खोज में रहती थी। उन दिनों रफ़ी साहब का गाया - पाँव पडूँ तोरे श्याम ब्रज में लौट चलो, सुलक्षणा पंडित का गाया - कैसे कान्हा का राधा भरोसा करे और शारदा सिन्हा का गाया - जगदम्बा घर में दियरा बार अइनी हो सीखा और भजन मंडली में गाया। लेकिन परिचित धुनों वाले गीत ज़्यादा जमते थे । सोचा जय जगदीश हरे गाकर देखूँ। लेकिन शब्द पकड़ायी में नहीं आ रहे थे। कहीं से सुन लिया कि यह जयदेव के गीत गोविन्द में मिलेगा। बस, मिल गया कोड़ा! अब क्या चाहिए था? जीन, लगाम और घोड़ा।

गीत गोविन्द की तलाश शुरू हो गयी। पहले तो अपने घर की पुस्तकों में ही ढूँढा। नहीं मिली तो एक दिन चौखम्बा जाकर खरीद लायी। कोई प्रमाणिक संस्करण तो नहीं मिला लेकिन अपना काम चल गया क्योंकि जय जगदीश हरे के शब्द मिल गये। हिंदी अनुवाद पढ़कर अर्थ समझ ही लिया था कि यह दशावतार स्तोत्र है, जिसमें विष्णु के मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध और कल्कि अवतारों का वर्णन है। चूँकि जयदेव जगन्नाथ स्वामी के भक्त थे इसलिए वे इन्हें विष्णु के नहीं बल्कि अपने आराध्य श्रीकृष्ण के अवतार मानते हैं। और इसीलिए दस अवतारों में राम के बाद कृष्ण का नहीं बल्कि बलराम का नाम गिनाते हैं।

जय जगदीश हरे को मैंने तभी भजन-मंडली वाली डायरी में उतार लिया था, जो आज काम आया। तो लीजिये जयदेव कृत दशावतार का परायण कीजिये, जो मेरी डायरी से उठकर मेरे ब्लॉग तक आ रहा है।







प्रलय पयोधि जले धृतवानसि वेदम् 
विहित वहित्र चरित्रमखेदम् 
केशव धृत मीन शरीर। जय जगदीश हरे।



क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे 
धरणि-धरण-किण चक्र गरिष्ठे 
केशव धृत कच्छप रूप। जय जगदीश हरे। 




वसतिदशनशिखरे धरणी तव लग्ना 
शशिनिकलंक कलेव निमग्ना 
केशव धृत शूकर रूप। जय जगदीश हरे। 





तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गं 
दलित हिरण्यकशिपु तनु भृङ्गं
केशव धृत नरहरि रूप। जय जगदीश हरे। 



छलयसि विक्रमेण बलिमद्भुत वामन 
पदनखनीरजनित जन पावन 
केशव धृत वामन रूप। जय जगदीश हरे। 




क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् 
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् 
केशव धृत भृगुपति रूप। जय जगदीश हरे। 



वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति कमनीयम् 
दशमुख मौलि बलिं रमणीयम् 
केशव धृत रघुपति रूप। जय जगदीश हरे। 




वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् 
हलहति भीति मिलित यमुनाभम् 
केशव धृत हलधर रूप। जय जगदीश हरे। 



निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् 
सदय हृदय दर्शित पशुघातम् 
केशव धृत बुद्ध शरीर। जय जगदीश हरे। 



म्लेच्छनिवहनिधने धरयसि करवालम् 
धूमकेतुमिव किमपि करालम् 
केशव धृत कल्कि शरीर। जय जगदीश हरे। 



श्रीजयदेव कवेरिदमुदितमुदारम् 
श्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम् 
केशव धृत दशविध रूप। जय जगदीश हरे। 

Friday, May 27, 2016

नेहरू जी नहीं रहे


बात उन दिनों की है जब गोवा पुर्तगाली शासन से नया-नया मुक्त हुआ था, हालाँकि हवा तब भी साढ़े चार सौ वर्षों की दासता से भारी महसूस होती थी। लोग तब भी देश के अन्य हिस्सों को इंडिया कहते थे, बाज़ारों में विदेशीसामान भरा पड़ा था और समुद्र तट पर १२-१४ वर्ष के बच्चे भी बियर या वाइन का लुत्फ़ लेते देखे जा सकते थे। आकाशवाणी पर भी एमिसोरा डि गोवा का असर बाक़ी था। दोपहर में लंच के बाद लगभग दो घंटे सिएस्टा केलिए नियत थे। केंद्र निदेशक का कमरा बहुत बड़ा और सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ था। कमरे की एक पूरी दीवार शीशे की थी, जहाँ से बगीचे का कोना नज़र आता था। कमरे में एक तरफ आरामदेह सोफा- कम- बेड था, जहाँपुर्तगाली केंद्र निदेशक सिएस्टा का आनंद लेते थे। नए केंद्र निदेशक मेजर अमीन फौजी व्यक्ति थे, जिन्हें आराम के नाम से चिढ़ थी। वैसे भी वह नेहरूजी के 'आराम हराम है' के नारे वाला दौर था। मेरे पिताजी, कृष्ण चन्द्र शर्मा'भिक्खु' सहायक केंद्र निदेशक थे।दोनों अधिकारियों की पूरी कोशिश रहती कि कम से कम आकाशवाणी से सिएस्टा का चलन ख़त्म हो जाये। लेकिन पुरानी आदत जाते-जाते ही जाती है।

गोवा में तब आकाशवाणी के कर्मचारियों को सरकारी आवास उपलब्ध नहीं थे।दोनों बड़े अधिकारी होटल में कमरा किराये पर लेकर रहते थे। साल में एक बार, गर्मी की छुट्टियों में माँ, डॉ० शकुन्तला शर्मा मुझे लेकर गोवाजाती थीं। उसी एक कमरे में हम दोनों भी समा जाते थे। कमरे में समुद्र की ओर खुलने वाली बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ थीं। उन्हीं में से एक के आगे माँ अपना चूल्हा-चौका जमा लेती थीं। घनघोर मांसाहारी प्रदेश में शाकाहारियों केलिए न तो कोई होटल था. न पंजाबी ढाबा या मारवाड़ी बासा। इसलिए माँ सोचती थीं - डेढ़-दो महीने के लिए ही सही, कम से कम पिताजी को घर का खाना खिला दें। पिताजी दोपहर में खाना खाने आ जाते थे। उन्हें ऑफ़िस से होटल लेकर आने वाला ड्राइवर सिल्वेस्ता मेरा अच्छा दोस्त बन गया था। छुट्टी के बाद कभी-कभी मुझे और मेरे दोस्तों को अपनी मर्सिडीज़ में घुमाने ले जाता था और आइसक्रीम भी खिलाता था।


एक दिन पिताजी खाना खाने बैठे ही थे कि फ़ोन की घंटी बजी। मैंने दौड़कर फ़ोन उठाया।

उधर से आवाज़ आई - "मिस्टर शर्मा से बात कराइये, हम दिल्ली से बोल रहे हैं।"
मैंने कह दिया कि वे खाना खा रहे हैं, लेकिन उधर से आदेश हुआ -" कोई बात नहीं, उन्हें फ़ोन दीजिये।"

मैं ज़रा लाडली बेटी थी, सो अड़ गयी कि थोड़ी देर बाद कर लीजियेगा। लेकिन तब तक दिल्ली का नाम सुनकर पिताजी उठ कर आ गए। दस साल की उम्र के गुस्से से बिफरी मैं माँ से शिकायत करने पहुँची, तभी पिताजी कोकहते सुना - "हाय, ये क्या हो गया।"

फ़ोन रखकर पिताजी वहीँ दीवार से लिपटकर बुरी तरह रोने लगे। मैंने इससे पहले कभी उन्हें रोते नहीं देखा था। मैं बहुत डर गयी और माँ के पास सिमट गयी।

माँ ने पूछा - "क्या हुआ?"

पिताजी ने उसी तरह बिलखते हुए कहा - "नेहरुजी नहीं रहे।"
इस पर माँ भी रोने लगीं।

मैं बारी-बारी से दोनों को देखती अवाक् खड़ी रही। समझ में नहीं आ रहा था क्या कहूँ, क्या करूँ? जब कुछ नहीं समझ में आया तो उनसे लिपट कर खुद भी रोने लगी।

नेहरु जी के निधन के बाद सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा कर दी गयी।आकाशवाणी के सभी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम बंद, गीत-संगीत का प्रसारण बंद, केवल भक्ति-संगीत और वह भी बिना वाद्य-यंत्रों के। किसी औरकेंद्र पर शायद इतनी कठिनाई नहीं हुई होगी। लेकिन यहाँ तो स्थिति ही अलग थी। एमिसोरा डि गोवा के आर्काइव्स में भला ऐसा भक्ति संगीत कहाँ से मिलता? मगर प्रसारण तो होना ही था और ठीक समय पर होना था। आजकी तरह किसी और स्टेशन को पैच करने की सुविधा मौजूद नहीं थी। अब क्या हो? चारों तरफ गाड़ियाँ दौड़ायी गयीं। जहाँ कहीं भी कोई हिंदी- संस्कृत के विद्वान् थे, सादर आमंत्रित किये गए। गायकों- संगीतकारों को स्टूडियो मेंबुलाकर रेकॉर्डिंग शुरू की गयी।मैंने वह दृश्य अपनी आँखों से देखा है कि प्रोड्यूसर से लेकर केंद्र निदेशक तक सभी स्पूल-टेप लेकर इधर-उधर दौड़े चले जा रहे हैं। धीरे-धीरे एमिसोरा पर आकाशवाणी का रंग छाने लगा। लेकिन अभी तो सात दिनों तक प्रसारण जारी रखना था।


एक दिन केंद्र निदेशक मेजर अमीन अचानक हमारे कमरे में आ गए। पिताजी तब तक ऑफ़िस से नहीं लौटे थे। उन्होंने कहा - आप गीता पाठ कर सकती हैं?दरअसल माँ ने उन्हें किसी प्रसंग में बताया था कि उन्होंने किसी के निधन पर पूरी रात बैठकर गीता पाठ किया था। उन्होंने माँ से कहा - मुझे आपसे गीता की रेकॉर्डिंग करानी है। आप तैयार रहिएगा, मैं गाड़ी भेज दूंगा। शर्मा जी से कुछ कहने की ज़रुरत नहीं है। यह हमारा सीक्रेट रहेगा।

माँ उनके लिए जलपान की व्यवस्था करने लगीं तब तक वे मुझसे बात करने लगे।

उन्होंने मुझसे पूछा - आप जानती हैं क्या हुआ है?

मैंने सुना-सुनाया वाक्य दोहरा दिया - नेहरू चाचा नहीं रहे।

उन्होंने कहा - आप उनसे मिली थीं?

यह मेरे छोटे से जीवन का हाई पॉइंट था। मैं कोई पाँच साल की थी, तब नेहरूजी मेरे स्कूल में आये थे। मैंने जिद करके अपने लिए सैनिकों जैसी वर्दी सिलवाई थी और वही पहनकर स्कूल गयी थी। नेहरुजी आये तो बहुत सारीयूनीफॉर्म-धारी बच्चियों के बीच मैं अकेली सैनिक लिबास में थी। सच पूछिए तो नेहरु चाचा के आगे खुद को किसी ब्रिगेडियर से कम नहीं समझ रही थी। वे जब पास आये तो मैंने जमकर सेल्यूट ठोंका। उन्होंने सैल्यूट का जवाब सैल्यूट से दिया और फिर हँसकर मुझे गोद में उठा लिया।

जिन नेहरू चाचा को रोज़ अख़बारों और डाक्यूमेंट्री फिल्मों में देखा करती थी उनकी गोद में चढ़ने के बाद मेरा क्या हुआ, इसका मुझे कोई होश नहीं है।लेकिन बाद में लोगों ने बताया कि उन्होंने कहा था - "हमें इस जैसी बहादुर बच्चियों की ज़रूरत है।"

मुझसे यह किस्सा सुनकर मेजर अमीन समझ गए कि रविवार की बाल सभा का भी इंतज़ाम हो गया। कोई भी कुशल एंकर मेरे साथ बातचीत कर इस घटना को एक घंटे तक खींच सकता था और नेहरु चाचा के प्रति बच्चों केप्यार को भी रेखांकित कर सकता था।

अगले दिन मुस्कुराता हुआ सिल्वेस्ता हमें लेने आया। हम केंद्र निदेशक के कमरे में बिठाये गए। मेजर अमीन ने पिताजी को फ़ोन मिलकर कहा - "शर्माजी मेरे आर्टिस्ट आ गए हैं। आप ज़रा इनकी रेकॉर्डिंग की व्यवस्था देखलीजिये।"

कुछ ही देर में पिताजी - "मे आई कम इन सर" कहते हुए कमरे में दाखिल हुए और उनके आर्टिस्ट्स को देखकर दंग रह गए।

इसके बाद उन्होंने अम्मा के गीता-पाठ की और मेरी बाल-सभा की रिकॉर्डिंग करवाई। आकाशवाणी परिवार के सदस्य होने के नाते हमें उस दिन मात्र एक-एक रुपये की टोकन फीस मिली लेकिन हम उस दिन से बाक़ायदा आकाशवाणी के कलाकार बन गए।

Thursday, May 26, 2016

हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुश्बू


आकाशवाणी की नौकरी से फुर्सत पाकर मेरे दो पसंदीदा काम हैं - संगीत सुनना और बाग़बानी करना। जब बगीचे में मेरे लगाये किसी पौधे में नयी कोंपल फूटती है या फिर कोई भूला-बिसरा गीत सुनने को मिल जाता है तो बड़े शुद्ध निर्मल आनन्द की अनुभूति होती है। पूरा दिन भर ख़ुशी-ख़ुशी बीतता है।

पिछले अक्टूबर में मैंने एक नारंगी का पौधा खरीदा था। बड़ा सा खूबसूरत गमला और उसमें ढेरों हरी पत्तियों के बीच से झाँकती छोटी-छोटी नारंगियाँ इतनी प्यारी लग रही थीं कि क्या बताऊँ ! जेब तो ख़ाली कर गया लेकिन मन को ख़ुशी से भर गया।

सर्दी का मौसम आया तो पत्तियाँ पीली पड़ने लगीं।
कुछ ही दिनों में सारी पत्तियाँ गिर गयीं और टहनियों पर गाँठ सी नारंगियाँ भर रह गयीं।
दो महीने के खाद-पानी के बावजूद जब पौधे पर एक भी पत्ती के दर्शन नहीं हुए तो आख़िरकार दुखी मन से मैंने नारंगियाँ तोड़कर मीठी चटनी बना डाली।
 कुछ दिन और बीते। दूसरे-तीसरे दिन पानी दे देती पर निराश मन से सोचने लगी थी कि अब इस गमले में क्या लगाऊँगी।
एक दिन अचानक सूनी टहनी पर नयी पत्ती की झलक देखी तो आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन अब यकीन हो चला है कि मेरे सब्र का खट्टा ही सही, फल ज़रूर मिलेगा।



पेड़-पौधों पर मौसम का असर तो जग-ज़ाहिर है।
पर क्या वे लोगों को भी पहचानते हैं ?
हो सकता है कि ये मेरा वहम हो.
मगर जब कभी मैं लगातार तीन-चार दिन
अपने पेड़-पौधों से नहीं मिल पाती तो
सब के सब मुँह लटकाये, शिकायत करते से
लगते हैं। और ज़रा दुलार से पानी दे दूँ,
पीली पत्तियाँ तोड़ दूँ,
आपस में उलझ रही पत्तियों को सुलझा दूँ ,
तो जैसे सबके चेहरे खिल उठते हैं ।
कुछ तो बात है !


मैं जब दिल्ली से ग्रेटर नोएडा आयी तो अपने सारे पेड़-पौधे भी लेकर आयी थी। आने-जाने और फिर नयी जगह घर-गृहस्थी जमाने के चक्कर में कई दिनों तक बेचारे बालकनी में अनाथ से खड़े रहे। समय मिलते ही मैंने उन पर ध्यान दिया। लेकिन मूवर्स एंड पैकर्स की कृपा से कुछ टहनियाँ टूट गयी थीं, कुछ गमले फूट गये थे और रेलिंग पर चढ़ी लताओं को तो कंधे से काट दिया गया था।
मुझे लगा शायद इस समय कोई माली इनकी देखभाल मुझसे ज़्यादा अच्छी तरह कर सकेगा। मैंने अपनी हाउसिंग सोसाइटी के माली को बुलाकर उसे यह ज़िम्मा सौंपा। उसने कुछ पौधों का प्राथमिक उपचार करके छोड़ दिया और कुछ को 'दवा और दुआ से परे' बताकर उखाड़ फेंका। उनके ख़ाली गमलों को भरने के लिए मैंने उससे कुछ मौसमी पौधे मँगवाये और उसी से लगवाये। जब तक मेरी दिनचर्या सामान्य हुई उसके लगाये पौधे मर चुके थे और उसके सहेजे पौधों पर सफ़ेद लिजलिजे कीड़े लग चुके थे। उसके बाद भी मैंने उस माली से कुछ लौकी-कद्दू के बीज लगवाये लेकिन हर बार उसके हाथ से लगाये पौधे मर गये। 

     मेरे घर में खाना बनाने वाली पुष्पा ने मुझे एक पका करेला लाकर       दिया। बोली - लो दीदी, इसे बो दो फिर आराम से करेले खाना। मैंने       करेले के वो लाल-लाल बीज एक ख़ाली गमले में लगा दिये। कुछ         दिन बाद नाज़ुक टहनियाँ और पत्तियाँ निकल आयीं। फिर उन           टहनियों में से बाल जैसी पतली-पतली टेंड्रिल्स निकलकर आस-         पास की हर चीज़ को थामने की कोशिश करने लगीं। उनकी सहारे       की ललक देखकर मुझे लगा कुछ तो इंतज़ाम करना पड़ेगा।

 घर ठीक करने वाले मज़दूर छत पर बाँस-बल्लियों की कुछ अनगढ़ चीज़ें छोड़ गए थे, एक सीढ़ी थी और एक स्टैंडनुमा चीज़ जिसे वो "घोड़ी" कहते थे। मैंने घोड़ी को छत के एक कोने में जमाया और उस पर सीढ़ी का छप्पर तान दिया। करेले के गमले को उसके पास रखा और सुतली का एक जाल सा बाँध दिया। रास्ता दिखाने भर की देर थी। करेले की बेल सुतली को उँगलियों में थामे झट घोड़ी के ऊपर चढ़ बैठी। करेले तो दो ही बार खाये पर महीनों उसकी पतली उँगलियों की मज़बूत पकड़ देखी और दोस्तों को दिखायी।

 दिन-ब-दिन मेरा विश्वास पक्का होता जा रहा है कि लोगों की तरह पेड़-पौधे भी अपनों को, उनके हाथ को, उनकी ख़ुशबू को पहचानते हैं। हम जब उदास होते हैं तो वो भी उदास हो जाते हैं और हम खुश हों तो वो भी पत्तियाँ हिला-हिला कर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर देते हैं। और मुझे ... अपने लगाये किसी पौधे में पहली बार कोंपल फूटने पर, पत्तियाँ आने पर, फूल खिलने पर जो बेतहाशा ख़ुशी होती है, कैसे बताऊँ?





कालिदास का श्लोक याद आता है। महर्षि कण्व शकुन्तला को विदा करते हुए आश्रम के पेड़-पौधों से कहते हैं -
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्
आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्याः भवत्युत्सवम्
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहम् सर्वैरनुज्ञायताम्।।

यह शकुन्तला, जो तुम्हें पानी दिये बिना कभी पानी नहीं पीती थी, जिसे गहने प्रिय थे पर तुम्हारे स्नेह के कारण पत्ते नहीं तोड़ती थी, तुम्हारे पहली बार फूलने पर जो आश्रम में उत्सव मनाती थी, वही शकुन्तला आज पति के घर जा रही है, तुम सब अपनी लाड़ली बेटी को जाने की आज्ञा दो।

Monday, May 23, 2016

लो डाल डाल फूले पलाश





-- शुभ्रा शर्मा

सौभाग्य था मेरा कि बचपन में जिस स्कूल में पढ़ी, वहाँ बड़ा "शांति निकेतनी" वातावरण था। चार-चार कक्षाओं के बीच खुला आँगन और उनमें तरह तरह के पेड़-पौधे। इस तरह हमारा बचपन प्रकृति के साथ बीता। आम, इमली, जामुन, अमरुद, और नीम ही नहीं हम टेसू, कदम्ब, मौलसिरी और अशोक के भी फूलने-फलने का समय जानते थे।


कुंद की झाड़ी 


म्यूज़िक क्लास के सामने कुंद की ऊँँची झाड़ियाँ थीं। सुबह जल्दी पहुँचकर गिरे हुए फूल बीनने की होड़ रहती हमारे बीच। उन फूलों से हम बिना सुई-डोरे के मालायें गूँथते और अपनी चोटियाँ सजाते थे। जिस लड़की के बालों में सबसे घना गजरा नज़र आता, उससे सब पूछतीं - क्या आठ बजे ही स्कूल आ गयी थी? इसी तरह अलग-अलग मौसम में माधवी, मालती और मौलसिरी के फूल हमारे श्रृंगार बनते।

करौंदा 
जुलाई में स्कूल खुलता तब पूरी दीवार के साथ लगी करौंदे की झाड़ियाँ फल-फूल रही होतीं। लाल-लाल करौंदे देख मुँह में पानी आये बिना नहीं रहता। माली और दाइयों की आँख बचाकर करौंदों से जेब भरकर लाने वाली लड़की हीरोइन बन जाती। तब तक कदम्ब फूलने लगते। न जाने क्यों मुझे बचपन से कदम्ब के फूल बड़े प्यारे लगते हैं। शायद इसलिये भी कि घर में नानी राधा-कृष्ण की पूजा करती थीं और सुमधुर कंठ से जो गीत गाती रहती थीं उनमे अकसर कदम्ब का ज़िक्र होता था।

मार्च में एक तरफ पढ़ाई का ज़ोर होता तो दूसरी तरफ़ टेसू और सेमल के पेड़ फूलों से लद जाते। सेमल के डोडे चटक कर फूटते तब उनमें से रेशम जैसी रुई निकल कर इधर-उधर उड़ती। तब कुछ दिन उस उड़ती रुई को मुट्ठी में पकड़ने का खेल चलता। आम में बौर लग जाते। उन पर कभी तितलियाँ और भौंरें मँडराते तो कभी नन्हीं-नन्हीं चिड़ियाँ एक डाली से दूसरी डाली पर फुदकते हुए शोर मचाती रहतीं।

नौवीं या दसवीं कक्षा में थी जब हिंदी की पाठ्य पुस्तक में सेनापति का यह कविता पढ़ी थी।
सेनापति माधव महीना में पलास तरु
देखि-देखि भाव कविता के मन आये हैं।
आधे अनसुलगि सुलगि रहे आधे मानो
बिरही दहन काम कोयला परचाये हैं।
हमने जिस तरह टेसू के फूलों को हाथ में लेकर इस कविता का मर्म समझा था, वह शायद ही आज किसी बच्चे को नसीब हो। टेसू के इन फूलों को देखिये -



थोड़े लाल और थोड़े काले - लगता है न जैसे आधा सुलगा और आधा बिना सुलगा कोयला हो? आज के बच्चे ने तो अंगीठी में जलते कोयले भी शायद ही देखे हों। पर हमने अपने घर में रोज़ देखे थे, इसीलिए सेनापति की यह उपमा दिमाग़ में ऐसी बैठी कि आज तक याद है।




लगभग उसी उम्र में एक बार होली पर दिल्ली से जयपुर जाना हुआ। तब तक कोटपूतली और बहरोड़ वाली सड़क नहीं बनी थी। अलवर होकर जाते थे। सुबह बहुत जल्दी दिल्ली से निकल गये थे। पापा गाड़ी चला रहे थे और मैंने उनींदी होने की वजह से उनके पास आगे बैठने की ज़िद नहीं की थी। शायद सचमुच सो भी गयी थी। अचानक अम्मा की आवाज़ से नींद खुली। हम अलवर से पहले कहीं अरावली की पहाड़ियों के बीच थे। चारों ओर की पहाड़ियों पर केवल टेसू के पेड़ थे। बल्कि उन्हें पेड़ कहना भी उचित न होगा। पेड़ों के नन्हें बच्चों जैसे थे, मुश्किल से तीन-चार फुट ऊँचे। लेकिन हर पौधा लाल-नारंगी फूलों से ढँका हुआ था। अपूर्व दृश्य था।

बहुत बाद में नरेंद्र शर्मा जी की कविता पढ़ी तो वह दृश्य फिर एक बार आँखों में कौंध गया --

पतझर की सूखी शाख़ों में लग गयी आग, शोले दहके
चिनगी-सी कलियाँ खिलीं और हर फुनगी लाल फूल लहके।
लो, डाल डाल से उठी लपट, लो डाल डाल फूले पलाश
यह है वसंत की आग, लगा दे आग जिसे छू ले पलाश।
लग गयी आग; वन में पलाश, नभ में पलाश, भू पर पलाश
लो, चली फाग; हो गयी हवा भी रंगभरी छूकर पलाश।
पलाश का पेड़

टेसू और पलाश के अलावा इसके दो और नाम मिलते हैं। आम बोलचाल में ढाक और साहित्य में किंशुक। किंशुक नाम इसलिए पड़ा कि इसका फूल आगे से तोते की चोंच की तरह मुड़ा हुआ होता है। उसे देखकर संदेह होता है कि कहीं यह तोता तो नहीं। किं शुक ?

तो आप इसे पलाश कहिये या किंशुक, संस्कृत कवियों ने इसे वसंत के आगमन का प्रतीक माना है।

कुमारसम्भवम् में जब शिव की समाधि भंग करने के लिये देवराज इंद्र कामदेव को भेजते हैं और वह अपने परम मित्र वसंत को साथ लेकर हिमालय पहुँचता है, तब उनके आते ही पूरा वन प्रदेश नयी-नयी कोंपलों और फूलों से गमक उठता है। कालिदास ने यहाँ जिन पेड़ों के फूलने का ख़ास तौर पर उल्लेख किया है, वे हैं - अशोक. आम, कर्णिकार और पलाश। पलाश के बारे में कहते हैं -

बालेन्दु वक्त्राण्यविकासभावाद्बभुः पलाशान्यतिलोहितानि।
सद्यो वसन्तेन समागतानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम्।।
बाल चन्द्रमा के से आकार वाले पलाश के अत्यन्त लाल-लाल फूल चारों ओर ऐसे फैले हुए थे मानो वसंत ने आते ही वनस्थली के साथ विहार किया हो।



कवि कुल गुरु कालिदास ही नहीं, विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी जब वसंत के आगमन की बात करते हैं तो पलाश को ज़रूर याद करते हैं। कैसे राशि-राशि अशोक और पलाश के पेड़ रंगों में विहँस रहे हैं -
रांगा हांशी राशि-राशि अशोके पलाशे
रांगा नेशा मेघे मेशा प्रभात आकाशे
नबीन पाताय लागे रांगा हिल्लोल द्वार खोल द्वार।
ओ रे गृह बाशी
हमारे इस विशाल देश में तेज़ी से उगते जा रहे कंक्रीट के जंगलों के बीच कुछ तो कोने ऐसे होंगे जहाँ अशोक और पलाश अब भी फूलते होंगे। टिड्डे और मधुमक्खियाँ अब भी फूलों पर मंडराती होंगी। माधवी लता से बहकर आती हवा उसकी भीनी खुशबू से अब भी सराबोर रहती होगी। लेकिन हमारे पास अब वो आँखें कहाँ कि हम उन्हें देख सकें? वह हृदय कहाँ कि उन्हें सराह सकें? और उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह कि इतना समय कहाँ कि उस बारे में सोच सकें? शिवमंगल सिंह सुमन जी ने लिखा है 
अब चाहूँ भी तो क्या रुककर रस में भिन सकता हूँ?
चलती गाड़ी से बिखरे- अंगारे गिन सकता हूँ?
अब तो काफी हाउस में रस की वर्षा होती है
प्यालों के प्रतिबिंबों में पुलक अमर्षा होती है।
टेबल-टेबल पर टेसू के दल पर दल खिलते हैं
दिन भर के खोये क्षण, क्षण भर डालों पर मिलते हैं।
पत्ते अब भी झरते पर कलियाँ धुआँ हो गई हैं
अंगारों की ग्रंथियाँ हवा में हवा हो गई हैं। 

Friday, May 20, 2016

दस बेटे बनाम एक पेड़


-- शुभ्रा शर्मा

आजकल पेड़-पौधों का प्रेम मेरे सर पर चढ़ कर बोल रहा है। जो कुछ पढ़ती हूँ, फोकस पेड़-पौधों पर ही रहता है। प्राचीन अभिलेखों के बारे में पढ़ रही थी, तभी यह श्लोक नज़र आया -

दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः।
दशह्रदसमो पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः।।
 
दस कुँए के बराबर होती है एक बावड़ी, दस बावड़ी के बराबर एक सरोवर, दस सरोवर के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्त्व होता है।

Koop
आज के समय में पानी का महत्त्व जगजाहिर है। भविष्य के बारे में सोचने वाले बहुत दिनों से आगाह कर रहे हैं कि पानी सँभाल कर खर्च करें। पृथ्वी पर खारे पानी के सागर-महासागर भरे हुए हैं, मगर प्राणियों को ज़िंदा रहने के लिये जो पानी दरकार है उसकी मात्रा तेज़ी से घटती जा रही है। पानी की कमी दुनिया का नक़्शा किस हद तक बदल सकती है, इसका कुछ आभास होता है 1995 में बनी फिल्म WATERWORLD से। इस फिल्म में दिखाया गया था कि ग्लोबल वॉर्मिंग के परिणामस्वरूप ध्रुवीय क्षेत्रों की बर्फ़ पिघल गयी है और पूरा संसार जलमग्न हो गया है। लोग समुद्र में जाल सा बाँध कर उस पर किसी तरह जी रहे हैं। मिटटी-पानी के दर्शन दुर्लभ हैं। अगर कहीं सूखी ज़मीन बच गयी है, तो उस तक पहुँचना हर इंसान का सपना है।
Agrasen ki Baoli, Delhi





फिल्म देखते समय मेरे अंदर ज़बरदस्त अपराध बोध जागा था। अगर कभी ऐसी स्थिति आती है तो क्या उसके लिये मैं भी ज़िम्मेदार हूँ? मैंने भी तो अनगिनत बार ग़ैर-ज़रूरी कपड़े धोये हैं, टपकते नल को ठीक करवाने का काम कल पर टाला है और गिलास का बचा पानी बिना सोचे-समझे फेंक दिया है। तो समुद्र में एक बूँद के बराबर ही सही, मगर दोषी तो मैं भी हूँ।

हमारे पूर्वज पानी के महत्त्व से परिचित थे इसलिए किसी भी शुभ अवसर पर कुँए खुदवाने को सबसे बड़ा पुण्य कार्य समझते थे। कुँआ न सिर्फ़ एक परिवार की प्यास बुझाता था बल्कि भूमि के नीचे के पानी के स्तर की सूचना भी देता रहता था।

Hauz Shamsi












अधिक साधन-संपन्न लोग बावड़ी का निर्माण करवाते थे। बावड़ी इस तरह बनायी जाती थी कि सूरज की किरणें सीधे पानी तक नहीं पहुँचती थीं और उसके भाप बनकर उड़ने की आशंका कम रहती थी। पानी की कमी वाले इलाक़ों में गहरी बावड़ियों के साथ गलियारे और छोटी-छोटी कोठरियाँ होती थीं, जहाँ बैठकर थके-हारे पथिक दोपहर बिताते थे। सेनापति का कवित्त याद आता है --


Hauz Khas
बृष को तरनि तेज सहसौ किरन करि
ज्वालन के जाल बिकराल बरसतु है।
मेरे जान पवनौ पकरि सीरी छाँह कौनो

घरी एक बैठि कहूँ घामै बितिवतु है।

वृष राशि का सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणों से जैसे ज्वालाओं का जाल बरसा रहा है। ऐसे में हवा भी थम गयी है। ऐसा लगता है जैसे गर्मी से त्रस्त होकर वह भी कोई ठंडी छाँह देख, कहीं घड़ी भर रुक गयी है और सोच रही है ज़रा धूप कम हो जाये तब चलूँ। मुझे न जाने क्यों हमेशा ऐसा लगता है कि "पौन" ने जो "सीरी छाँह" पकड़ी है, वो ज़रूर किसी बावड़ी की कोठरी में है।
Baoli

बावड़ी से बड़े तालाब या ह्रद खुदवाना बड़े राजा-महाराजा और सुल्तानों के बस की बात होती थी। दिल्ली के उदाहरण से समझिये। यहाँ राजा अग्रसेन की बावड़ी है, जबकि अल्तमश का हौज़-ए-शम्सी और अलाउद्दीन खिल्जी का हौज़ ख़ास है। मतलब यह कि ह्रद या हौज़ बनवाने में ज़्यादा लोगों की मेहनत और ज़्यादा रुपयों की ज़रूरत पड़ती थी। 

ऐसे दस सरोवर बनवाने का पुण्य और एक पुत्र का पुण्य बराबर माना गया है। भारतीय जन-मानस में पुत्र का होना कितना आवश्यक है और पुत्री का होना कितना निरर्थक, ये कहानियाँ हम पहले तो गाहे-बगाहे सुनते थे, लेकिन अब सूचना-क्रांति के इस दौर में दिन में बीसियों बार सुन लेते हैं। पुत्र वह जो माता-पिता को वैतरणी पार कराता है, घोर नरक की यातना से बचाता है। ज़ाहिर है, उसका महत्त्व कुँए, बावड़ी और सरोवर से अधिक तो होना ही था।

Neem Tree
ऐसे में अगर कोई देव-भाषा संस्कृत में यह कह रहा है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के बराबर होता है, तो हम उसकी बात पर ध्यान क्यों नहीं देते? पुत्र की आकांक्षा में देश की जनसंख्या बढ़ाने की जगह, अपने घर-आँगन में नीम, आम, अमरुद, कटहल के फलदायक पेड़ क्यों नहीं लगाते? क्यों नहीं उन्हें सींचकर बड़ा करते, जो बुढ़ापे में हमें छोड़कर कहीं नहीं जाते, जो हम पर कोई एहसान नहीं जताते और जिनकी 'सीरी छाँह' में बैठकर हम चैन से 'घाम' बिता सकते हैं?

Monday, May 02, 2016

कवि - समय

भाई इन कवि लोगों का कोई जवाब नहीं!

कहाँ-कहाँ पहुँच जाते हैं ! क्या-क्या देख लेते हैं ! और काफ़ी कुछ तो ऐसा देख लेते हैं जो किसी और ने सपने में देखा-सुना या सोचा भी न हो। अजन्मे बच्चों से बात कर लेते हैं। पर्वत, जंगल, नदी, फूल, भँवरे से मिताई कर लेते हैं। और तो और, आसमान के किसी कोने से बादल ज़रा सा झाँका नहीं कि उसे झट कामों की पूरी फ़ेहरिस्त थमा देते हैं - "सुन भाई, ज़रा लपक कर नत्थू की दूकान से मिठाई ले आ। और रास्ते में धोबी के यहाँ से ज़रा प्रेस के कपड़े भी उठा लेना। और सुन अम्मा कल से नीम्बू लाने को कह रही हैं। मैं तो जा नहीं पाया। ज़रा पूछ ले यार, अगर ज़रुरत हो तो उनसे पैसे लेकर उन्हें चार नीम्बू भी ला देना।"

सुना है ऐसे ही कामों की फ़ेहरिस्त गिनाते-गिनाते कालिदास का खण्डकाव्य तैयार हो गया और वे मेघदूत की रचना कर अमर हो गये। पर उसके बाद बादल भी सयाने हो गये। उन्होंने दूसरों की बला अपने सर लादने से साफ़ इंकार कर दिया - "ये क्या बात हुई - बेगार में खटें हम और मलाई खाये काम बताने वाला। ऐसी कम तैसी इन नालायकों की ! हम क्या इनके बाप के नौकर लगे हैं ? ये ससुर हमसे काम करायेंगे और ख़ुद वाहवाही लूटेंगे। हमारा काम है बारिश करना - वो कर देंगे। बस। और किसी काम की आस न रखना हमसे।"

तब तक कवियों की नज़र बादलों की तरफ से मुड़कर पेड़ों की तरफ आ गयी। उन्हें लगा पेड़ों में बादलों जैसा एका नहीं होगा। इनमें कोई छोटा है तो कोई बड़ा, कोई दुबला है तो कोई मोटा। किसी ने कई-कई गज ज़मीन घेर रखी है तो किसी के पास खड़े होने भर को ज़मीन नहीं है। कोई करीने से क्यारी में खड़ा है तो कोई बेतरतीब जड़ें फैलाये चला जा रहा है। किसी को खपच्ची की टेक मिली हुई है तो कोई छप्पर पर फैला हुआ है। इन्हें बरगला कर अपना उल्लू सीधा करना आसान रहेगा।

बस जी, फिर कवियों ने पेड़ों के कान में मन्त्र फूँकना शुरू कर दिया। एक से कहा - तुम वसंत के दूत हो, तुम्हारे फूलने से दुनिया को वसंत के आने का पता चलता है। दूसरे से कहा - तुम ही तो हो जिसके फूलने से धरती दुल्हन सी सज उठती है। एक अन्य को समझाया - तुम कामदेव के तरकश में रखे सबसे नुकीले तीर हो। तुम नर-नारी में प्रेम की उत्कंठा जगाते हो। तुम न हो तो सृष्टि ही ठप्प हो जाये।

हर पेड़-पौधा अपने आप को सर्वज्ञ और सर्व-शक्तिमान समझने लगा और दूसरे के रूप-रस-गंध से जलने-कुढ़ने लगा। कुछ ने तो नाराज़ होकर फूलने से इंकार कर दिया।

अब जब पेड़-पौधे नहीं फूले तो वसंत नहीं आया। वसंत नहीं आया तो कामदेव भी नहीं आये। कामदेव नहीं आये तो प्रेम का व्यापार नहीं चला और जब प्रेम का व्यापार नहीं चला तो कवियों का धंधा भी मंदा पड़ गया। तब

कवियों को लगा - "यार,ये तो गड़बड़ हो गयी। ये फूले-फलेंगे नहीं तो हम क्या दिन-रात पतझड़ का वर्णन करेंगे? और ऐसा नीरस वर्णन पढ़ेगा कौन?"

बस उन्होंने आपस में सर जोड़कर मंत्रणा की और एक नया कौतुक रच डाला।

पहले श्लोक पढ़ लीजिये फिर समझाती हूँ कवियों की चतुराई।


स्त्रीणां स्पर्शात् प्रियंगुर्विकसति बकुलः सीधुगण्डूषसेकाद्

पादाघातादशोकस्तिलककुरबकौ वीक्षणालिंगनाभ्याम्।

मन्दारो नर्मवाक्यात्पटुमृदुहसनाच्चम्पको वक्त्रवातात्

चूतो गीतान्नमेरुर्विकसति च पुरो नर्तनात्कर्णिकारः।।


कवि कहते हैं कि स्त्रियों के स्पर्श से प्रियंगु फूल उठता है, और जब वे गन्ने के रस से बनी शराब अपने मुँह में भरकर कुल्ला करती हैं तब बकुल यानी मौलसिरी में फूल लगते हैं। इसी तरह अशोक का पेड़ चरण-प्रहार से, तिलक देखने से और कुरबक आलिंगन करने से पुष्पित होता है। मंदार का वृक्ष मीठी-मीठी बातों से और चम्पक मृदु मुस्कान से फूल उठता है। आम के पेड़ में अगर बौर न आ रहे हों तो उसका भी उपाय है। सुन्दर स्त्री के मुँह की हवा लगने से वह बौरा उठता है। नमेरु और कर्णिकार के वृक्ष ज़रा ज़्यादा शौक़ीन होते हैं - उनके आगे गीत-संगीत की महफ़िल सजानी पड़ती है - नमेरु गाना सुनकर और कर्णिकार नाच देखकर फूलता है।

चूँकि यह सारा मामला कवि - कल्पित था, इसका कोई ऐतिहासिक या पौराणिक आधार नहीं था इसलिये इसे कवि - समय कहा गया। यानी कवियों का ऐसा कहना है....... ऐसा मानना है.......


कवि मानें सो सब मानें। ख़ास तौर पर राजाजी तो मानें ही मानें। उन्हें अंतःपुर की सुंदरियों के इन तरह-तरह के कौतुकों से भला क्या आपत्ति होती ? उधर सुंदरियों को भी पेड़ों का आलिंगन करने, बतियाने-मुस्कुराने, नाचने-गाने और उन्हें लात मारने का मौक़ा मिल रहा था। वे भला क्यों आपत्ति करतीं? और कवि लोग? उनकी तो पाँचों उँगलियाँ घी में थीं। राजा से भी पुरस्कार पाते रहे और अंतःपुरिकाओं से भी। तभी तो कहती हूँ - इन कवि लोगों का कोई जवाब नहीं!





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