Thursday, March 31, 2016

kahin door jab din dhal jaye

उदास सी साँझ घिर आई थी। दूर क्षितिज पर डूबते सूरज के ललछौंहे निशान धुँधले पड़ते जा रहे थे। बरामदे में खड़ा आनंद गा रहा था --
कहीं दूर जब दिन ढल जाये 
साँझ की दुल्हन बदन चुराये, चुपके से आये 
मेरे ख़यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाये। 
तभी बाबू मोशाय भास्कर बैनर्जी चुपके से आकर उसके पीछे खड़े हो जाते हैं।  
आनंद पूछता है - ऐ बाबू मोशाय! चोरी-चोरी मेरा गाना सुन रहे थे? कैसा लगा?
भास्कर जवाब देते हैं - अच्छा था।  लेकिन कुछ उदास लगा। 
आनंद कहता है - उदासी क्या सुन्दर नहीं होती !
हृषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार की कल्पनाशीलता और क्राफ्ट की बदौलत यह हिंदी फिल्मों के इतिहास में उदास संध्या का ऐसा बेजोड़ चित्र है, जिससे बेहतर न अब तक हुआ, न हो सकता है। "न भूतो न भविष्यति।" 

कुछ और भी चित्र उभरते हैं।  जैसे वहीदा रहमान वाली फागुन फिल्म का -
संध्या जो आये मन उड़ जाये 
जाने रे कहाँ, करूँ  क्या उपाय ?
विरहिणी नायिका का निपट एकाकीपन, उसके घर और जीवन का सूनापन जिस तरह उभर कर आता है और देखने वाले को व्यथित कर देता है, उसका श्रेय न तो गीत-संगीत को दिया जा सकता है और न  निर्देशन को। वह पूरी तरह वहीदा जी के अभिनय का कमाल है। 

शाम का एक दृश्य और याद आता है जब आह फिल्म में नरगिस जी अपने बड़े से महलनुमा कमरे में घूम-घूम कर नायक को याद कर रही हैं -
ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा ग़म 
पत्ते कहीं खड़के, हवा आई तो चौंके हम। 
नरगिस जी बेहतरीन अदाकारा थीं, इसमें कहीं कोई दो राय नहीं हो सकती।  लेकिन इस फिल्म के इस दृश्य में वे राज साहब के विरह के बजाय, पेट की तकलीफ से पीड़ित लगती हैं। 

गुलज़ार साहब का एक और गीत है, जो अकसर उदास शामों में होठों पर आ जाता है - 
जब भी ये दिल उदास होता है 
जाने कौन आस-पास होता है। 
लेकिन अगर आपको यह गीत ज़रा भी पसंद हो तो मेहरबानी करके इसे सिर्फ रेडियो पर सुनियेगा, भूलकर भी वीडियो पर मत देखियेगा।  हमसे यही ग़लती हो गयी थी।  रेडियो पर सुनकर गीत इतना अच्छा लगा कि फिल्म देखने चले गये। बालों में पीले गुलाबों की पूरी क्यारी सजाये सिम्मी को और बिना मूँछ-दाढ़ी वाले कबीर बेदी को आज तक माफ़ नहीं कर पाये हैं। वरना दो बदन की डॉक्टर सिम्मी और दिल्ली दूरदर्शन के एंकर कबीर के अच्छे खासे पंखे हुआ करते थे हम।  

देव साहब का पंखा कोई हो या न हो, यानी उन्हें पसंद करे या न करे, उनकी फ़िल्में देखे बिना नहीं रह सकता था। नौ दो ग्यारह से लेकर गाइड, ज्वेल थीफ, हरे राम हरे कृष्ण, जॉनी मेरा नाम, कौन सी ऐसी फिल्म है, जो आपने अब तक नहीं देखी। हमने भी देखी हैं। गाइड में उनकी शिकायत ख़ासी असरदार साबित हुई थी।  मैंने कई लोगों को पहले पेग के बाद वो शिकायत दोहराते सुना है -
दिन ढल जाये, हाय रात न जाये  
तू तो न आये तेरी याद सताये।  

अपने धरम पा जी को नाचने-गाने का शऊर थोड़ा कम ही है। सो उनके हिस्से अच्छे गाने भी कम ही आते हैं। लेकिन शाम के जाम के साथ वे भी गाने को निभा ले जाते हैं।  रफ़ी साहब ने इसे गाया भी बड़ी तबीयत से है-
हमें तो यही था ग़ुरूर, ग़मे यार है हमसे दूर 
वही ग़म जिसे हमने किस-किस जतन से निकाला था इस दिल से दूर 
वो चलकर क़यामत की चाल आ गया। 
हुई शाम उनका ख़याल आ गया। 
   
लेकिन अगर शाम के खाँटी देसी, गँवई चित्र की बात करें तो बिमल राय की फ़िल्म परख का गीत याद आता है -
मेरे मन के दिये, मेरे मन के दिये 
यूँ ही घुट घुट के जल तू मेरे लाडले, ओ मेरे लाडले। 
गाँव के पोस्ट मास्टर की पत्नी बहुत बीमार हैं लिहाज़ा गृहस्थी का सारा बोझ उनकी बेटी साधना के कन्धों पर आ पड़ा है। यह वही लड़की है, जो अब तक गाँव में - 'मिला है किसी का झुमका' और 'ओ सजना, बरखा बहार आई' जैसे गीत गाती फिरती थी। लेकिन अब अपने तमाम सपनों को भुलाकर तुलसीचौरे पर संझा-बाती में लगी हुई है और अपने मन को घर-आँगन में घुट-घुट कर जीने की हिम्मत दे रही है। 

शाम के इन गीतों के बारे में जो मेरी राय थी मैंने बता दी, आप सहमत हैं या नहीं इस पर चर्चा करके देख लेते हैं।बोलिये, आपकी क्या राय है?

Wednesday, March 30, 2016

लट उलझी सुलझा जा रे मोहन

आज फेसबुक पर एक मित्र ने अपनी बगिया में खिले मोगरे का चित्र पोस्ट किया था।  उनकी श्रीमती जी उसी मोगरा के फूलों का खूब सघन सा गजरा भी बालों में बाँधे हुए थीं।  देखते ही मुझे एक बड़ा पुराना गीत याद आ गया। मैंने उसी गीत की पहली पंक्ति दोस्त की दीवार पर चिपका दी।

लट उलझी सुलझा जा रे मोहन, कर मोरे मेंहदी लगी।
माथे की बिंदिया अबरू पे आ गयी
अपने हाथ लगा जा रे मोहन, कर मोरे मेंहदी लगी।

गीत उन्हें पसंद आया। पूछने लगे - किसका गीत है, किसने गाया है?
मैंने कहा - भाई, मेरी नानी यह गीत गाती थीं।  मूल गीत तो मैंने कभी सुना ही नहीं।
कहने लगे - मैंने तो सोचा था कि आपके पास से कोई बहुत पुराना, अनसुना गीत सुनने को मिलेगा।

मैंने चैलेंज स्वीकार किया और इंटरनेट पर रिसर्च में पिल पड़ी। दो गीत दिखाई दिये। एक में कोई महात्मा जी मोहन की भक्ति में तल्लीन थे और दूसरे में मलका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ मोहन से नहीं, अपने बालम से कह रही थीं उलझी लट सुलझाने को। दोनों गीतों की धुन वह नहीं थी जो मेरे कानों में गूँज रही थी।

लिहाज़ा मैंने रिसर्च को थोड़ा और विस्तार दिया।  इस बार कुछ अधिक गुरु-गम्भीर चेहरे सामने आये। एक थे उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब और दूसरे पंडित जसराज।  मुझे लगा मेरी नानी भला इन दिग्गजों की, इनकी बंदिशों की नक़ल कैसे कर सकती थीं।  हाँ, कानन देवी और सहगल साहब के गाने अक्सर गाया करती थीं। मुझे सुलाने के लिए जो लोरी गाती थीं, वह थी सहगल साहब की - सोजा राजकुमारी सो जा।

मुझे लगा, हो न हो, उलझी लट सुलझाने का अनुरोध भी या तो सहगल साहब से किया जा रहा होगा या फिर वही नायिका की ओर से गाकर यह अनुरोध कर रहे होंगे। लेकिन ऐसा कोई गीत सहगल साहब के गीतों में प्राप्त नहीं हुआ।

तब मैंने बड़े डरते-डरते बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के दरवाज़े पर दस्तक दी। राग बिहाग के हलके से आलाप के बाद ठुमरी शुरू हुई तो मेरा दिल बल्लियों उछल पड़ा।  यही सुर तो न जाने कबसे मेरी स्मृति में दर्ज थे।

तबसे जब न तो आज की तरह सूखी मेंहदी के पैकेट मिलते थे, न गीली मेंहदी के कोन।  हाथों में मेंहदी रचाने का शौक़ हो तो किसी पड़ोसी से अनुमति लेकर, उनके बँगले की बाड़ से मेंहदी की पत्तियाँ तोड़ कर लायी जाती थीं, घर के सिल- बट्टे पर पीसी जाती थीं और नाखूनों के इर्द-गिर्द बस यूँ ही लपेट दी जाती थी। ज़्यादा शोर मचाते तो बीच हथेली पर चवन्नी बराबर एक गोली और रख दी जाती थी कि लो इस पर मुट्ठी कस लो।  और हम उस चवन्नी भर मेंहदी को हाथों में कसकर जितने खुश होते, उतनी ख़ुशी अब ढाई सौ रुपये में एक हाथ पर फूल-बूटे कढ़वा कर हासिल नहीं होती क्योंकि इस मेंहदी में न तो पत्तियां तोड़कर लाने वाले की विजयी मुस्कान है, न पीसने वाली के पसीने की ख़ुशबू और न ही मचिया पर बैठकर गाती हुई नानी का स्वर --

लट उलझी सुलझा जा रे मोहन   ......

नानी तो अब हैं नहीं वरना उनसे पूछती कि उन्होंने "बालम" को "मोहन" में क्यों बदल डाला था। वैसे मैं जानती हूँ कि उनका जवाब क्या होता।  हँसकर कहतीं कि सास-ससुर के सामने आलम-बालम थोड़े ही गा सकते थे इसलिए भगवान का नाम लेकर गाते थे।  वो भी ख़ुश और हम भी ख़ुश।

तो लीजिये मेरी नानी का वही प्रिय गीत उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ की आवाज़ में सुनिये और हो जाइये ख़ुश।



और अब सुनिये वही बंदिश थोड़े से फेर-बदल के साथ पंडित जसराज जी से -

Tuesday, March 29, 2016

Ham donon

आज कल  देश में जिस तरह की बहस छिड़ी हुई है, उसे देख-सुनकर मुझे नज़ीर मामू बहुत याद आते हैं। नज़ीर मामू यानी हरदिलअज़ीज़ शायर नज़ीर बनारसी।  मैंने पहली बार उन्हें बनारस कैंट रेलवे स्टेशन पर देखा था। मेरी अम्मा डॉ शकुन्तला शर्मा अपर इंडिया एक्सप्रेस से दिल्ली जा रही थीं और हम सब उन्हें छोड़ने स्टेशन गए थे।  छोटे से क़द के नज़ीर साहब लकदक सफ़ेद कुर्ते पायजामे में अच्छे तो लग रहे थे लेकिन मैं और मेरे ममेरे-फुफेरे भाई उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ हमें हर बात पर बेवजह, बेतहाशा हँसी आती थी।  सो नज़ीर साहब पर भी हँसना शुरू हो गये।  लेकिन अम्मा पहले उनसे मिल चुकी थीं। उनके अदबो-इल्म से वाक़िफ़ थीं।  उन्होंने हमारी ही-ही ठी-ठी पर आँखें तरेरीं और मुझे पास बुलाकर परिचय कराया।  मैंने बमुश्किल हँसी पर क़ाबू पाते हुए सलाम किया। उन्होंने जिस तरह सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, मुझे बहुत अच्छा लगा। दिल्ली तक की उस यात्रा में उन्होंने अम्मा को बहन मान लिया और तभी से वे हमारे मामू हो गए। कई साल हम उनसे ईदी वसूलते रहे।
बाद में वे मेरे नानाजी के अच्छे दोस्त बन गये थे। जब कभी कुछ नया लिखते आकर सुनाते। हम भी फरमाइशें कर-कर के उनकी नज़्में सुनते।  गंगा, शंकर, और भी बहुत कुछ। मुझे लगता है शेरो-शायरी का जो शौक़ नानाजी की वजह से पैदा हुआ था, उसे परवान चढ़ाने में नज़ीर मामू का बहुत बड़ा हाथ रहा।

नज़ीर मामू मुशायरों में अपना परिचय इस तरह देते थे -

मैं बनारस का निवासी, काशी नगरी का फ़क़ीर
हिन्द का शायर हूँ, शिव की राजधानी का सफ़ीर 
लेके अपनी गोद में गंगा ने पाला है मुझे
नाम है मेरा नज़ीर औ मेरी नगरी बेनज़ीर। 

उनकी एक ग़ज़ल का मतला देखिये। कहते हैं -

ख़म-ए-मेहराब-ए-हरम भी ख़म-ए-अबरू तो नहीं?
कहीं काबे में भी काशी के सनम तू तो नहीं?

ऐसा कुफ़्र बोलने वाले पर ईमान वालों को भला नाराज़गी कैसे न होती? चुनांचे मक्ते का शेर हुआ  -

हिन्दुओं को तो यक़ीं है कि मुसलमाँ है नज़ीर
कुछ मुसलमाँ हैं,जिन्हें शक़ है कि हिन्दू तो नहीं? 


चीन के हमले के बाद जब सारा देश सकते में था, नज़ीर साहब ने एक लम्बी नज़्म लिखी थी -

मैं हूँ शंकर पयाम देता हूँ तुमको आज अपनी राजधानी से। 
कभी कश्मीर का दिया एक अंग , कभी तिब्बत गँवा के बैठ गये 
कभी नेफा पे दे दिया क़ब्ज़ा , तो कभी कच्छ लुटाके बैठ गये 
जिनको आता है जान देना वो, अपनी धरती नहीं दिया करते 
धरती माता है और माता का बेटे सौदा नहीं किया करते।  
है जहाँ आज दुश्मनों की फ़ौज कल वहां दुश्मनों की राख रहे 
जियो दुनिया में आबरू के साथ जान जाये तो जाये ,साख रहे। 

मुशायरे में जाते तो लोग इसे सुने बिना पीछा नहीं छोड़ते थे। जैसे ही वे कहते - मैं हूँ शंकर ! तो बस तालियों का सैलाब उमड़ पड़ता जैसे रुकने को तैयार ही न हो।


नज़ीर साहब को अपने हिंदुस्तान पर, अपने बनारस पर और अपनी बनारसियत पर गर्व था और ता-उम्र रहा --

मेरे बाद ऐ बुताने -शहर-ए -काशी , मुझ ऐसा अहले -ईमां कौन होगा 
करे है ऐन बुतख़ाने  में सजदा नज़ीर ऐसा मुसलमाँ  कौन होगा ?

आज वो हमारे बीच नहीं हैं वरना बिला वजह झगड़ते लोगों को एक बार फिर समझाते -

दिलों की बाहमी तल्ख़ी मिटा सकते हैं हम दोनों 
हिजाबे-दरमियाँ अब भी उठा सकते हैं हम दोनों। 
न पड़ने दें अगर गर्द-ए-कदूरत शीशा-ए-दिल पर 
मोहब्बत को भी आईना दिखा सकते हैं हम दोनों। 
फ़क़त बारे-मोहब्बत ही एक ऐसा बार है जिससे 
हर एक उठता हुआ फ़ितना दबा सकते हैं हम दोनों। 


Monday, March 28, 2016

मन्वन्तर क्यों ?

आप सोच रहे होंगे कि शुभ्रा शर्मा के ब्लॉग का नाम "मन्वन्तर" क्यों है। क़ायदे से तो शुभ्रायण  या शुभ्रा कहिन टाइप कोई नाम होना चाहिए था।  तो दोस्तो! सच्चाई यही है कि 'शुभ्रा' यह नाम मुझे स्कूल जाने की उम्र में मिला। सन् बयालीस के दिनों में लाठी-गोली खाने वाले माँ-बाप ने राष्ट्र भक्ति की झोंक में बंकिम बाबू के वंदे मातरं से शब्द उधार लेकर मुझे शुभ्रा बना दिया।  हो सकता है इसके पीछे कुछ हाथ मेरे गोरे रंग का भी रहा हो। वरना शुभ्रा के बजाय सुजला या सुफला भी तो कही जा सकती थी। जो भी हो स्कूल में मेरा नाम शुभ्रा ही लिखाया गया। और आज तक, जब भी कोई मेरे नाम को लिखने या बोलने में अटकता है तो मैं उसे वंदे मातरं का हवाला देती हूँ।
सबसे रोचक घटना हुई १९८८ के आस-पास।  उन दिनों मैं दिल्ली दूरदर्शन के लिए अनुबंध पर काम करती थी। दूरदर्शन की उस समय की लोकप्रिय अनाउंसर ज्योत्स्ना को कोई उद्घोषणा रिकॉर्ड करानी थी।  उन्हें किसी शब्द को लेकर दुविधा थी, जिसे दूर कराने वे पत्रिका कार्यक्रम की प्रोड्यूसर दुर्गावती जी के कमरे में आईं। दुर्गा दीदी ने हस्बेमामूल उन्हें मेरे पास भेज दिया। हम बात कर ही रहे थे तभी शरद दत्त जी अंदर आये।  उन्होंने हमें देखा और बोले -- वंदे मातरं। सब लोग चौंक गए। लेकिन मैं समझ गयी।  मैंने कहा - देख लीजिये।  शुभ्रा -ज्योत्स्ना दोनों सामने खड़ी हैं। 
लेकिन यह तो हुआ मेरे स्कूल वाले नाम का क़िस्सा। अपनी बंगाली बहू के शब्दों में कहूँ तो मेरे इस `भालो नाम' से पहले मेरा एक `डाक नाम' यानी पुकारने का नाम भी था। वह नाम मेरे माता-पिता ने नहीं नानी ने रखा था।  मेरे जन्म से पहले उन्होंने सोहराब मोदी की फिल्म झाँसी की रानी देखी थी और तभी तय कर लिया था कि अपनी नातिन का नाम मनु रखेंगी और उसे साहसी और निडर बनायेंगी।  
साहस और निडरता के बारे में आप सब अंदाज़ लगाते रहें। इस ब्लॉग पर मैंने मनु के अन्तर-मन की बातें सामने लाने का बीड़ा उठाया है इसीलिए नाम दिया है - मन्वन्तर।  

Sunday, March 27, 2016

गगन से गीत फूल झरते

गगन से गीत फूल झरते।
देह नदी श्वासों की नैया तिरता स्वर का कुँवर कन्हैया
साधों की ब्रजबाला चल दी शंकित पग धरती।
मुस्कानों के यमुना तट पर विश्वासों के वंशी वट तर
इच्छाओं के गोवर्धन को आश्वासित करते।
मन सागर में हो उद्वेलन शेषशायी जीवन अनुचिंतन
फैले जब जब गरल धरा पर अमृत कण ढरते।

- Shakuntala Sharma

Naresh Mehta

ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत नरेश मेहता के नाम से मैं बचपन से ही परिचित थी। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पढ़ाई के दौरान वे मेरे माता-पिता के सहपाठी थे। कुलपति थे डॉ राधाकृष्णन और हिंदी विभाग आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य केशव प्रसाद मिश्र, आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी जैसे उद्भट विद्वानों से सुसज्जित था। हजारी प्रसाद द्विवेदी तभी शांति निकेतन से काशी आये थे। एम ए फाइनल के छात्रों के विदाई समारोह में नरेश जी ने मौलिक कवितायें लिखी थीं। मेरी माँ, शकुंतला शर्मा के लिए उन्होंने बिहारी का दोहा एक सुन्दर से कार्ड पर लिखकर दिया था- अमिय हलाहल मद भरे स्वेत स्याम रतनार। जियत मरत झुकि-झुकि परत जेहि चितवत एक बार।




पिताजी, सुप्रसिद्ध साहित्यकार कृष्ण चन्द्र शर्मा 'भिक्खु' की ओर से लिखी कविता माँ को संबोधित थी -

उस आम्र वृक्ष की छाया में हम प्रिये मिले थे प्रथम बार।
हम दो तीर्थों के दो प्रतीक तुम काशी की, मैं हरिद्वार।|

Friday, March 04, 2016

"आंगना में कुइयां राजा डूबके मरूंगी"


-  शुभ्रा शर्मा
चौराहा पर एक लेख पढ़ा 'अंगना में कुइयां' तो बचपन में सुना एक लोकगीत याद आ गया - "आंगना में कुइयां राजा डूबके मरूंगी"| लेख में पुराने लुप्त होते जलस्रोतों के पुनरुद्धार की बात की गयी है. मैं सोचने लगी कि कोई उन तमाम लोकगीतों के उद्धार की बात क्यों नहीं करता, जो उन जलस्रोतों के साथ ही लुप्त होते जा रहे हैं| उदाहरण के तौर पर पंजाब में गाया जाने वाला वह गीत जिसमे कुँए पर पानी भरने जा रही नायिका को रोककर सिपाही पूछता है - "ये जो तेरे पैर में कांटा चुभ गया है, इसे कौन निकालेगा, कौन इसकी पीर सहेगा?"

सड़के सड़के जानिये मुटियारे नी कंडा चुबा तेरे पैर बांकिये नारे नी, ओये नी अडिये
कौन कढे तेरा कांडडा मुटियारे नी कौन सहे तेरी पीड बांकिये नारे नी, ओये नी अडिये

सिपाही उससे पानी पिलाने को कहता है तो वह तमक कर जवाब देती है - मैं तुम्हारी बांदी नहीं हूँ|

घड़ा पजे कुमियारा दा सिपैया वे लज्ज पई टोटे चार कि मैं तेरी मैरम ना.

देर से घर पहुँचनेपर सास नाराज़ होती है, बरसों पहले परदेस गया उसका बेटा जो लौट आया है| मिलने पर पता लगता है कि कुँए पर उसे छेड़ने वाला कोई और नहीं उसका पति ही था|

ठीक यही गीत बोली और भावों के थोड़े से अंतर के साथ राजस्थान में भी सुना-

किन्ने खुदाया कुआँ बावड़ी रे पनिहारी जी आलो, हो मृगानैनी जी आलो

यही दोनों राज्य भारतीय सेना को सबसे अधिक संख्या में जवान उपलब्ध कराते हैं इसलिए उनके लोकगीतों में सिपाही की पत्नी की पीड़ा झलकना स्वाभाविक है| लेकिन एक और राजस्थानी लोकगीत में छैल भंवर जी की प्रिया का नखरा भी देखने को मिला -

ऊंची तो पाळ तलाब री जी म्हारा चढ़ता गोड़ा दूखे सा ओ बालमा
म्हासूं चढ़यु न उतरियु जाये सा ओ बालमा

उधर, उत्तर प्रदेश में जब नवविवाहिता को सास पानी भरने भेजती है, तो घर के सारे पुरुष सदस्य उसकी मदद के लिए तत्पर हो जाते हैं -
रेशम गुही मोरी बैयाँ सास मोरी पानी को पठ्वे.
अपने ससुर की बहुत पियारी
नियरे कुइयां खोदावें बहू मोरी पानी को जैहें.
अपने जेठ की बहुत दुलारी
द्वारे तम्बुआ तनावें लहुरी मोरी पानी को जैहें.
अपने देवर की बहुत पियारी
गलियां कचरा बटोरें भौजी मोरी पानी को जैहें.
अपने सैयां की बहुत दुलारी
रहि रहि अंसुवा ढरावें धनो मोरी पानी को जैहें.

एक और लाडली दुल्हन को जब पानी लेने जाने को कहा जाता है तो उसकी फरमाइशों का पिटारा ही खुल जाता है -
जल भरी हिलोरें ले रसरिया रेशम की.
रेशम की रसरी तब नीकी लागे
चाँदी की गगरिया होय.
चाँदी की गगरी तब नीकी लागे
सोने की तगरिया होय.
सोने की तगड़ी तब नीकी लागे
गोदी में ललनवा होय.

लीजिये, अब सासू जी को पानी भरवाना हो तो थोड़ी जेब ढीली करें. बहूरानी ने तो अल्टीमेटम दे दिया है कि पानी भरने तभी जाएँगी जब रेशम की रस्सी, चाँदी की गगरी और सोने के कमरबंद का इंतजाम कर दिया जाये और हाँ, तब तक इंतजार भी करना पड़ेगा जब तक वे पुत्र रत्न को जन्म न दे दें| और अगर कहीं कोई कोर कसर रह गयी तो फिर धमकाने के लिए आँगन में कुँवा तो है ही -

आंगना में कुइयां राजा डूबके मरूंगी .........
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