Wednesday, April 27, 2016

पचास साल बाद - २


पचास साल पहले मिरामार बीच पर खोये जूते को अंतिम विदा देकर मैं लुइस की टैक्सी में बैठ जाती हूँ। मन में अब भी पापा की सीख गूँज रही है, हालाँकि आज उनकी बात पर विश्वास करना कठिन है कि मेरा जूता किसी ज़रूरतमंद लड़की को ही मिला होगा। 

लुइस को समझाती हूँ कि मिरामार से पणजी की तरफ जाती सड़क पर कहीं वह होटल था, जो पचास साल पहले, गर्मी की छुट्टी भर हमारा घर था। उसके बगल से एक सड़क सब्ज़ी मंडी जाती थी और उसके आगे मिलिट्री हॉस्पिटल था।

लुइस कहता है - ओह! कम्पाल एरिया !

इस नाम से मेरी यादों में कोई घंटी नहीं बजती। लेकिन मैं उस होटल को ढूँढ निकालने के लिये बहुत उत्सुक हूँ। वहाँ मेरे अम्मा-पापा हैं, अलसेशियन गोआ है, क्लेमेंटीन आंटी है। हमारे कमरे की वो बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ हैं, जिनकी विंडो सिल पर बैठकर अगुआद का क़िला और मांडोवी में आती-जाती नावें देखी जा सकती हैं। सर्विस लेन के आगे वो पेड़ है, जिसकी टहनियाँ कुछ इस तरह निकली हैं कि उनके संधिस्थल पर बड़े आराम से टेक लगाकर बैठा जा सकता है। जहाँ बैठकर मैं कालिदास ग्रंथावली पढ़ती हूँ और गोआ पेड़ के नीचे बैठा निगरानी करता है।

मैं लुइस से बराबर धीरे चलने को कह रही हूँ पर वो न जाने किन गलियों में गाड़ी दौड़ाये जा रहा है - कभी दांये तो कभी बांये। हम एक पुराने मगर रंग-रोग़न से दुरुस्त घर के सामने से गुज़रते हैं, जिस पर पिंटो या ऐसा ही कोई नाम लिखा है। सड़क के सामानांतर बने इस घर के बाहरी बरामदे में तीन लोग बैठे हैं। मैं लुइस से गाड़ी पीछे लेने को कहती हूँ। उतरकर उन लोगों के पास जाती हूँ और उन्हें बताती हूँ कि पचास साल पहले मैं यहाँ रही थी। होटल का नाम ठीक से याद नहीं लेकिन मालिकों में से पॉल, लुइस और क्लेमेंटीन के नाम याद हैं। उनका सरनेम शायद मस्किता था। मिस्टर पिंटो अपना सीधा हाथ उठा देते हैं - वह रहा, अगली गली में।


मुझमें अब टैक्सी में बैठने तक का धैर्य नहीं है। पिंटो को धन्यवाद देकर दौड़ पड़ती हूँ अगली गली की ओर।

सामने की दीवार देखते ही थम जाती हूँ। दरवाज़े के दोनों तरफ़ ऊपर से नीचे जाते अक्षरों में लिखा है -- सेंट्रल लॉज। मुझे याद आता है - हाँ, यही तो नाम था - काज़ा सेंट्रल।

यह होटल का मुख्य प्रवेश द्वार था। उसके बगल में लाउंज और फिर डाइनिंग रूम। उस बालकनी के पीछे स्टेशन डायरेक्टर मेजर अमीन का कमरा था। उनकी बालकनी के नीचे एक कभी न चलने वाली कार खड़ी रहती थी, जिसके चारों टायर हवा के बिना ज़मीन से सट चुके थे। मैं गोआ को उस पर चढ़ने-उतरने का आदेश देते नहीं थकती थी और न वो कूदते हुए थकता था।

लेकिन हमारा कमरा इस तरफ नहीं था। उसकी खिड़कियाँ तो मेन रोड की तरफ खुलती थीं। और मैं लपकती हुई उस तरफ चल देती हूँ। हाथ में थमे फ़ोन से उस दीवार की कई फ़ोटो खींच डालती हूँ। बैग में धरे डिजिटल कैमरा की याद ही नहीं आती। आती भी कैसे? मन तो 1964 की यादों में गुम है। सही दिशा में घूमकर अपना पेड़ पहचानने की कोशिश करती हूँ लेकिन इनमें से किसी में दस साल की लड़की के बैठने की जगह नज़र नहीं आती।

लुइस टैक्सी लेकर आ गया है और लॉज के किसी कारिंदे से बात कर रहा है। मैं उसके पास पहुँचते ही शुरू हो जाती हूँ। भूल जाती हूँ कि मुझे आवाज़ को संतुलित और भाव-रहित रखने की ट्रेनिंग दी गयी है और लगभग तीस वर्षों से मैं उसी तरह बोलती आई हूँ। मेरी आवाज़ में दस साल वाली शुभ्रा का उत्साह और जल्दबाज़ी समा जाती है। मैं उससे अंकल पॉल और क्लेमेंटीन आंटी की खैरियत पूछती हूँ और उन्हें देने के लिए पर्स में अपना कार्ड ढूँढ़ने लगती हूँ। लेकिन दस साल वाली शुभ्रा को भला आकाशवाणी के लोगो वाला डॉ शुभ्रा शर्मा का कार्ड कैसे मिलता? और अगर मिल भी जाता तो वे लोग पहचानते कैसे? आख़िरकार किसी बिल पर पापा का नाम लिखकर अंदर भेजती हूँ।


लम्बे हैंडसम पॉल झुक गए हैं, छड़ी लेकर चलते हैं। उन्हें पापा बहुत अच्छी तरह याद हैं लेकिन गर्मी की छुट्टी में यहाँ रही पापा की बेटी याद नहीं है। उनकी बहन, क्लेमेंटीन आंटी अब वास्को में रहती हैं। घुटनों में दर्द की वजह से ज़्यादा चल फिर नहीं पाती। पॉल की तीनों बेटियाँ विदेश में रहती हैं। इकलौता बेटा आर्टिस्ट है। कभी-कभी आता है। वे अकेले ही रहते हैं। वे मेरे लिए कुछ खाने-पीने की व्यवस्था करने को कहते हैं लेकिन मैं उनसे अपना पुराना कमरा देखने का अनुरोध करती हूँ। वे कहीं ना न कर दें, इस डर से मैं कुर्सी से उठकर अंदर चल देती हूँ। साथ-साथ रनिंग कमेंट्री भी जारी रखती हूँ - किचन इस तरफ था न, पॉल अंकल? यहाँ आँगन में कुँआ था जहाँ मोट्या मेंढक पकड़ता था। और इस कोने में बाथरूम था। फिर वो गैलरी थी जिसमें क्लेमेंटीन आंटी का और हमारा कमरा था।


लेकिन यह क्या? तेज़ी से चलती मेरी ज़ुबान को जैसे काठ मार जाता है। सेंट्रल लॉज की बाहरी टीम-टाम के पीछे एक बियाबान खंडहर है। गैलरी और कमरे ढह चुके हैं। किचन में बल्लियाँ और ईंटें भरी हैं। बस एक बाथरूम है, जो अब भी खड़ा है - लंगड़ाते अंकल पॉल की तरह - किसी तरह अपने दिन काट रहा है।

Friday, April 22, 2016

पचास साल बाद

कम लोगों के जीवन में ऐसे अवसर आते होंगे कि वे पचास साल पहले की भूली-बिसरी यादों पर जमी धूल झाड़कर चमकीले रंगों वाली तस्वीर को फिर से देख सकें। ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे ऐसा मौक़ा मिला कि साठ साला आँखों से दस साल वाली शुभ्रा की जानी-पहचानी जगहों को देख सकी, उसकी बेफ़िक्री और मस्ती को महसूस कर सकी।



इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं- बेटा श्रेयस, बहू अपर्णा और बेटी-सी श्रेया।

एक ने ज़िद करके टिकट बुक करा दिये। दूसरी ने समझाया - कभी तो अपने बारे में भी कुछ सोच लो, कर लो। और तीसरी ने मुँह लटका लिया - आप नहीं जाओगी तो मुझे बहोत-बहोत दुख होगा।

सिर्फ अपने मन की बात होती तो शायद मार भी लेती लेकिन इन तीन तिलंगों का मन कैसे मारती ? आख़िरकार जाना ही पड़ा।

ये बड़ा सुखद संयोग है कि मेरी दोनों गोआ यात्राओं में आकाशवाणी का भरपूर योगदान रहा। पहली बार जब पापा का तबादला हुआ और दूसरी बार जब निपट अकेली महिला के होटल में ठहरने के संकोच से मैंने आकाशवाणी के अतिथि-गृह में रहने का फैसला किया।



1964 में मेरे पापा ( श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा 'भिक्खु' ) की पोस्टिंग लखनऊ से पणजी हुई। अम्मा (डॉ शकुन्तला शर्मा) दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में प्रवक्ता थीं और मैं नाना-नानी के पास बनारस में रहती थी। गर्मी की छुट्टियों में अम्मा मुझे लेकर पापा के पास जाती थीं। इस तरह मेरी छुट्टियाँ कभी लखनऊ, कभी पटना, कभी पणजी तो कभी कोहिमा में बीतती थीं। उस वर्ष भी गर्मी के लगभग दो महीने हमने पापा के साथ गोआ में बिताये।

इतना तो याद है कि पानी के जहाज़ का सफ़र मेरे और पापा के लिये बहुत कठिन रहा। हम सारे रास्ते निढाल पड़े रहे। पणजी पहुँचने के बाद दो दिन तक मुझे ऐसा लगता रहा जैसे पैरों के नीचे की ज़मीन कभी एक तरफ़ तो कभी दूसरी तरफ़ झुकी जा रही है।

पहले-पहल हम जिस होटल में ठहरे थे वहाँ शाकाहारी खाने की कोई व्यवस्था नहीं थी लिहाज़ा हम वहाँ से दूसरे होटल में आ गये। इस होटल का कमरा खूब बड़ा और हवादार था। समुद्र की तरफ़ खुलने वाली दो बड़ी खिड़कियाँ थीं। कमरे से अगुआद का क़िला दिखाई देता था। होटल के बगल से होकर एक सड़क सब्ज़ी मंडी की तरफ जाती थी। अम्मा ने जब उस कमरे के एक कोने में अपना चूल्हा-चौका जमा लिया, तब उनके लिए सब्ज़ी लाने की ड्यूटी मुझे दी गयी। हर शाम वे मुझे वहीँ से खरीदी बरसाती पहनाकर, लिटल रेड राइडिंग हुड की तरह तैयार कर देतीं। मैं एक मुन्ने से बटुए में पैसे सँभालकर जाती और आलू, टमाटर, भिंडी के साथ उनके बालों के लिये एक वेणी भी ख़रीद लाती थी। इस सड़क के दूसरी ओर मिलिट्री हॉस्पिटल था। होटल के सामने से गुजरने वाली बड़ी सड़क मिरामार बीच की तरफ जाती थी। बस, 1964 की इन मुट्ठी भर यादों को साथ लिये मैं 2014 में गोवा पहुँच गयी।




हवाई अड्डे पर तो लगा जैसे पचास वर्ष में कई युग बदल गए हों। मेरे सहयात्री तेज़ी से उतरती सीढ़ियों से फटाफट नीचे उतर गये। मुझे ज़रा एस्केलेटर से डर लगता है, इसलिये निहायत दिलचस्पी से पोस्टर और बोर्ड पढ़ने के बहाने मैं असली सीढ़ियाँ ढूँढती रही। जब मिल गयीं तब ख़रामा-ख़रामा नीचे उतरी। आकाशवाणी के गेस्ट-हाउस का अता-पता समझा और प्री-पेड टैक्सी करके पहुँच गयी।

गेस्ट हाउस पणजी में नहीं, बम्बोलिम में है - ट्रांसमीटर के नज़दीक। कुछ परिवार वहां रहते हैं लेकिन कई फ्लैट खाली पड़े हैं। सामने ज़ुआरी नदी का चौड़ा पाट और एक तरफ़ किसी पांच सितारा होटल के सीढ़ीनुमा कमरे।




लेकिन गोआ का ये हिस्सा मेरी यादों से बहुत अलग था। पणजी से दूर, मांडोवी नदी और फोर्ट अगुआद से दूर। दस साल वाली शुभ्रा ठुनकने लगी - ये कहाँ ले आई हो, ये मेरा वाला गोआ नहीं है।

उसे डाँट कर चुप कराया। उससे वादा किया कि कल उसे उसकी परिचित जगहें ज़रूर दिखाऊँगी। वहाँ के केयरटेकर से दिन भर की एक टैक्सी की व्यवस्था करने को कहा।

टैक्सी वाले लुइस देखने में ही अच्छे लगे। मैंने उन्हें अपनी गोआ वाली फोटो दिखायी और बताया कि मैं इतनी बड़ी थी जब यहाँ आई थी और अब पचास साल बाद उसी गोआ की तलाश में आई हूँ। लुइस ने मेरे नास्टैल्जिया को समझा और पूरे दिन में एक बार भी कभी, कहीं जल्दी करने को नहीं कहा।

हम बम्बोलिम से पहले डॉना पाओला गये। मुझे याद आया हम जेटी के दाहिनी तरफ किसी जगह नहाये थे। कुछ फोटो खींचे, एक फ्लॉपी हैट ख़रीदा।








वहाँ से हम मिरामार गये, लेकिन मैं वहाँ उतरी भी नहीं। मेरी स्मृतियों का मिरामार बहुत सुन्दर है। वहाँ मैं अपने पापा की बहुत दुलारी बिटिया होती हूँ। हम सब अक्सर शाम को वहाँ जाते हैं।

एक शाम जब मेरा अभी-अभी ख़रीदा जूता समुद्र में बह जाता है तो पापा मुझे दिलासा देते हैं - यह रत्नाकर है बेटा। इसके गर्भ में न जाने कितने रत्न हैं लेकिन यह अपने लिए कुछ नहीं रखता। सब बाहर फेंक देता है। हो सकता है तुम्हारा जूता भी फेंक दे।

हम दोनों सुबह जल्दी उठकर उसे ढूँढ़ने जाते हैं। मगर सागर की फेंकी तमाम चीज़ों के बीच जब जूता नहीं मिलता तो मैं फिर रुआँसी हो जाती हूँ।

पापा फिर समझाते हैं - रोने की क्या बात है? हो सकता है सागर ने तुम्हारा जूता किसी ऐसी बच्ची को दे दिया हो, जिसके पापा के पास जूते दिलाने के पैसे न हों।

मैं ख़ुश हो जाती हूँ और दूसरे पैर का जूता भी समुद्र में फेंक देती हूँ, इस हिदायत के साथ कि इसे भी उसी लड़की को दे देना।


अभी जारी है ........

Wednesday, April 20, 2016

उपमा कालिदासस्य

बचपन से किताबें पढ़ने की ऐसी चाट पड़ गयी थी कि जो कुछ हाथ लग जाये - चाट जाती थी। सातवीं क्लास में थी जब पापा की पोस्टिंग गोवा हुई। गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त हुए कुछ ही दिन हुए थे। वातावरण कोंकणी या भारतीय कम, पुर्तगाली अधिक था। खान-पान हो या रहन-सहन सभी पर विदेशी छाप नज़र आती थी। दस-ग्यारह वर्ष के बच्चों के हाथ में बियर की बोतल दिख जाना, कोई अजूबा नहीं था। ऐसे में मुझे पढ़ने के लिए बच्चों की वह पत्र-पत्रिकायें कहाँ से मिलतीं, जिनकी मुझे आदत थी। बनारस और लखनऊ में पराग और चंदामामा नियमित रूप से घर आती थीं। और जब कभी रेल का सफर करना होता, तब बड़े लोग मेरे सवालों की झड़ी से बचने के लिये ए. एच. व्हीलर के स्टॉल से मुझे मनमोहन, राजा भैया या बालक में से कुुछ भी खरीद देने को तैयार हो जाते थे।

पणजी में रेडियो के अधिकारियों के लिए सरकारी आवास नहीं थे। स्थानीय लोग अपने घरों में रहते थे और बाहर से आने वालों को होटल में शरण लेनी पड़ती थी। सरकारी कॉलोनी होती तो साथ खेलने के लिये शायद हम-उम्र बच्चे मिल जाते लेकिन होटल में ऐसी कोई व्यवस्था संभव नहीं थी। होटल मालिक के पास एक बेहद खूँख्वार-सा लगता एलसेशियन कुत्ता था, जो जल्द ही मेरा अच्छा दोस्त बन गया। जिस दिन उसने मुझसे हाथ मिलाया, उसी दिन मैंने अपनी अम्मा को भी ये सौगात दिलानी चाही। मगर अम्मा उसके विकराल रूप से ऐसी घबरायीं कि उलटे मुझे भी उसके साथ खेलने की सख़्त मनाही हो गयी।

इसके बाद मेरे पास किताबों के अलावा कोई साथी नहीं था, पर मुश्किल यह थी कि पापा वहां गिनी-चुनी किताबें ही ले गए थे। उनमें से एक कम्प्लीट वर्क्स ऑफ़ शेक्सपियर थी और दूसरी कालिदास ग्रन्थावली। शेक्सपियर को तो मैंने पूरे सम्मान के साथ अपने कोने में ही खड़े रहने दिया और कालिदास पर ध्यान लगाया। अम्मा ने बताया कि कालिदास से डरने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि उन्होंने भले ही संस्कृत में लिखा था, लेकिन पूरी कहानी वहाँ हिंदी में भी दी हुई है। दरअसल वह आचार्य सीताराम चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित कालिदास ग्रन्थावली थी, जिसमें सभी काव्यों और नाटकों के मूल संस्कृत पाठ के साथ उनका हिंदी अनुवाद भी उसी पृष्ठ पर दिया हुआ था। अब हिंदी पढ़ना तो मैं जानती ही थी - मैंने कालिदास को बाँचने का मन बना लिया।

होटल के जिस कमरे में हम रहते थे, उसके आगे से सर्विस लेन गुज़रती थी। उसके और मेन रोड के बीच हरित पट्टी थी, जिस पर छायादार पेड़ लगे हुए थे। उनमें से एक पेड़ का तना लगभग चार फुट की ऊँचाई पर दो हिस्सों में बँट गया था। पेड़ पर चढ़कर बैठने के लिए यह जगह बहुत सुरक्षित और आरामदेह थी। दूसरे, पत्तियों के बीच से मेरे बालों में बँधा रिबन अम्मा को होटल के कमरे से नज़र आ जाता था, सो वे भी निश्चिन्त रहती थीं। मैंने उस पेड़ को अपना स्टडी कॉर्नर बना लिया। रोज़ सुबह नाश्ते के बाद से दोपहर के खाने तक मैं वहीँ पायी जाती थी। आप शायद विश्वास न करें लेकिन मैंने उसी पेड़ पर बैठे- बैठे रघुवंश, मेघदूत, कुमारसम्भव, शकुंतला, मालविका, उर्वशी, सभी को पढ़ डाला। उस उम्र में मुझे क्या और कितना समझ में आया होगा - यह तो भगवान ही जानें। लेकिन पापा जब कभी किसी नये व्यक्ति से मेरा परिचय कराते हुए कहते कि हमारी बिटिया आजकल कालिदास पढ़ रही है तो मैं अपने आप को विद्योत्तमा से कम नहीं समझती थी।

उसी पुस्तक में कुछ आलोचनात्मक लेख भी थे जैसे निसर्ग कन्या शकुंतला, कालिदास और प्रकृति, या कालिदास की उपमा। मैंने वो लेख भी पढ़ डाले। यहाँ से एक नया खेल मिला। लेखों में जिन श्लोकों का उल्लेख था, उन्हें मूल काव्य या नाटक में ढूँढने का।


जैसे कि एक लेख में पढ़ा कि कालिदास की एक उपमा इतनी पसंद की गयी कि उनका नाम ही "दीपशिखा कालिदास" पड़ गया। वह उपमा थी -

संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा।
नरेंद्र मार्गाट्ट इव प्रपदे विवर्णभावं स स भूमिपालः।।


रघुवंश का प्रसंग है। इंदुमती का स्वयंवर हो रहा था। बहुत से राजा-राजकुमार जमा हुए थे। हाथ में वरमाला लिए वह जिस राजा को छोड़कर आगे बढ़ जाती उसका चेहरा ऐसा धुँधला पड़ जाता जैसे मशाल के आगे बढ़ जाने से अँधेरे में खोये सड़क किनारे के मकान हों।

अब मुझे धुन चढ़ गयी कि रघुवंश में यह श्लोक खोज निकालना है। पहले कहानी समझी - अयोध्या के राजा दिलीप और उनकी पत्नी सुदक्षिणा, जिनका कोई पुत्र नहीं था। गुरु वसिष्ठ ने उन्हें कामधेनु की पुत्री नंदिनी की सेवा करने का आदेश दिया। उनके बेटे हुए रघु, जिनके नाम से पूरा वंश प्रसिद्ध हुआ। रघु की दिग्विजय, उनका सुशासन, और उनकी दानशीलता। उनके पुत्र अज जिनका विवाह इंदुमती से हुआ। तो विवाह से ठीक पहले कहीं मिलना चाहिए यह श्लोक। और जब मैंने सचमुच उस श्लोक को ढूँढ निकाला तब ज़रा मेरी अकड़ देखी होती आपने। इतना अकड़कर तो बेचारे वास्को डी गामा ने गोवा में प्रवेश नहीं किया होगा।
बाद में बी ए के कोर्स में जब रघुवंश के कुछ और अंश पढ़े तब समझ में आया कि लोग क्यों कालिदास की उपमा का इतना गुणगान करते हैं। पहला श्लोक देखिये -

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ।।

शब्दों और उनके अर्थों को अच्छी तरह समझने के लिये मैं जगत के माता-पिता - पार्वती और शंकर - की वंदना करता हूँ, जो स्वयं भी शब्द तथा अर्थ की तरह सदा जुड़े हुए हैं।

इसके बाद कहते हैं कि मेरी हिम्मत तो देखिये कैसा असम्भव काम करने चला हूँ। इतने महिमाशाली वंश का बखान करने चला हूँ जैसे कोई छोटी सी डोंगी लेकर महासागर को पार करने चले, या जैसे कोई बौना ऊँचे लम्बे पेड़ का फल तोड़ने की कोशिश करे।
क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषयामतिः।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्।।
मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम्।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्बाहुरिव वामनः।।

कालिदास को कहीं से पढ़िये,एक से बढ़कर एक उपमा मिलेगी, एक के बाद एक उपमानों की झड़ी मिलेगी।

शकुन्तला के अछूते सौंदर्य को देखकर दुष्यंत ऐसे ही उपमानों की झड़ी लगा देते हैं -

 
अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै
रनाविद्धं रत्नं मधु नवमनास्वादितरसम्।
अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनघं
न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः।।

यह तो अनसूँघा फूल है, अनछुआ पत्ता है, अनबिंधा रत्न है, अनचाखा शहद है।

न जाने कितने संचित पुण्यों के फल जैसी इस शकुन्तला को पता नहीं विधाता ने किसके भाग्य में लिखा है।

कुमारसम्भवम् में शिव के तपस्वी रूप का वर्णन करते हुए भी एक से बढ़कर एक उपमान देखने को मिलते हैं -





अवृष्टिसंरम्भमिवाम्बुवाहमपामिवाधारमनुत्तरङ्गम्।
अंतश्चराणां मरुतां निरोधान्निर्वातनिष्कम्पमिव प्रदीपम्।।


शरीर के अंदर चलने वाली प्राण-अपान आदि सभी वायु को रोक कर वे ऐसे अचल बैठे हुए हैं जैसे वर्षा न करने वाला बादल, जैसे बिना तरंगों वाला ताल, और जैसे बिना हवा के स्थान में निष्कम्प प्रदीप।

है कहीं कालिदास की इन उपमाओं की कोई उपमा ?

Friday, April 15, 2016

भगवती जागरण

दिल्ली में ब्याह-बारात, धरना-मोर्चा और क्रिकेट मैच की तरह देवी दुर्गा का रतजगा भी कुछ अतिरिक्त शान-शौकत, टीम-टाम और दिखावा लिए होता है। पहली बात तो यही है कि उसे रतजगा न कहकर माता की चौकी या भगवती जागरण कहा जाता है। दूसरे, आधे शहर में उसकी घोषणा करते हुए जो बड़े-बड़े पोस्टर और होर्डिंग लगाए जाते हैं, उनमें शेर पर सवार होकर दैत्यों का संहार करने निकली माता तो कहीं कोने-अतरे में फिट कर दी जाती हैं। होर्डिंग पर सजे होते हैं उनके नाम की चुनरी माथे पर बाँधे बड़े-बड़े गायक, वादक और स्थानीय विधायक जी के चेहरे।
उनसे कुछ दूरी पर ऊपर से नीचे जाते गोल-गोल बुद्बुदों में निगम पार्षद और उनके भाई-भतीजों के चित्र होते हैं। आप पढ़ते जाते हैं कि कैसे उस परिवार के ये सारे सदस्य कभी न कभी, किसी न किसी, महत्त्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित रह चुके हैं। पूर्व विधायक, पूर्व पार्षद, आदि से गुज़रते हुए अगर आप सदस्य, मोहल्ला रक्षक समिति तक पहुँच जायें, तो भी आश्चर्य न कीजियेगा। आख़िर मोहल्ले की सफ़ाई और सुरक्षा का ध्यानं रखना भी तो सराहनीय कार्य है, कि नहीं?

जब चौकी सज जाती है या माँ का दरबार लग जाता है, तब घरों में बंद लोगों को उकसा कर या लुभा कर पंडाल तक बुलाने का पुण्य कार्य शुरू होता है।
बीच में कोई अधसुरा नवोदित गायक बताता है कि -
माता जिनको याद करे वो किस्मत वाले होते हैं।
इसलिए चलो, घरों से निकलो क्योंकि तुम्हारे लिए बुलावा आया है, माता ने बुलाया है।
बालक बड़े मनोयोग से आप तक बुलावे की खबर पहुँचाता है। जानता है कि अगर लोग कम हुए और चढ़ावा कम आया तो बड़े और नामी गायकों का तो कुछ नुकसान नहीं होगा, वही बेचारा मारा जायेगा।

गाते-गाते जब इस चिंता में उसका गला रुँध जाता है और सुर थोड़ा भटक जाता है तब बाजे वालों की बन आती है। सिंथेसाइज़र और नाल वाला डाइरेक्ट एक दूसरे की आँखों में देखते हैं। उनके बीच एक अबोला समझौता होता है, जिसकी वे सिर हिलाकर पुष्टि भी कर देते हैं। सहसा दोनों वाद्यों से निकलता ध्वनि प्रदूषण, मर्यादा और हाई कोर्ट दोनों की निर्धारित सीमायें पार कर आपको दहलाने लगता है।

छोटे बच्चे रो पड़ते हैं तो उनकी मातायें "डर गया है", "डर रही है" कहती हुई भाग खड़ी होती हैं। लेकिन मोहल्ले की धुरी और भजन संध्या के आयोजकों में से एक उनके सास-ससुर "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे" डटे रहने को मजबूर होते हैं। कोई-कोई विरले ऐसे भी होते हैं कि इस अत्याचार को हँसते-हँसते झेल जाते हैं लेकिन इसमें उनकी भक्ति का नहीं,श्रवण शक्ति का योगदान अधिक होता है।

वाद्य यंत्र जब अपनी चरम सीमा तक पहुँचने के बाद दम लेने को रुकते हैं, तब मंडली के प्रमुख माइक संभाल लेते हैं। माइक पर उनकी पकड़ से साफ़ पता लग जाता है कि अब वह काफी देर ढीली नहीं होगी। वे पहले तो अब तक घर में बैठे लोगों को ललकारते हैं। फिर अपना और मंडली के अन्य सदस्यों का परिचय देते हैं। साथ में हवाई अड्डे की उद्घोषणा प्रणाली की तरह यह भी बताते जाते हैं कि माननीय मुख्य अतिथि महोदय अभी कहाँ तक पहुँचे हैं और उनका ई एस टी यानी एस्टिमेटेड टाइम ऑफ़ अराइवल क्या है।

फिर वे दो-चार जयकारे बुलवा कर एक थोड़ा शांत सा भजन शुरू करते हैं ताकि सामने बैठे अंकल-आंटियों को सौ-पचास के नोट चढ़ाकर मत्था टेकने की प्रथा याद आ जाये। अंकल-आंटी भी सोचते हैं - शुभस्य शीघ्रम - अभी दे दिया तो लोगों को याद रहेगा कि हमने सौ का नोट चढ़ाया है, वरना भीड़ हो जाने के बाद तो लोग दस का नोट फेंक कर चल देते हैं। 

हारमोनियम पर नोट बढ़ने के साथ-साथ मंडली प्रमुख का कंठ-माधुर्य भी बढ़ता जाता है लेकिन तभी मुख्य अतिथि का आगमन होता है। अब मुख्य अतिथि हैं, अकेले तो आयेंगे नहीं। सदल-बल पधारते हैं। आयोजक दौड़-दौड़ कर सबके लिए कुर्सियों की व्यवस्था करते हैं। इसके बाद कुछ देर मुख्य अतिथि का औपचारिक परिचय दिया जाता है, कुछ देर वे नकली दिलचस्पी से लोगों की समस्यायें सुनते हैं और कुछ देर माँ के सामने भक्ति-भाव का अभिनय करते हैं। अगर स्थानीय स्तर के नेता हुए तो कुछ देर पंडाल की शोभा बढ़ाते हैं और अगर राज्य स्तर के हुए तो दीप प्रज्ज्वलित करते ही पीठ दिखाकर चले जाते हैं।

मेरे लिए ऐसे आयोजनों का असली खेल इसके बाद ही शुरू होता है। इनमें से एक खेल है - धुन पकड़ कर गीत पहचानने का और दूसरा खेल है - व्यक्ति के हाव-भाव से उसके दान की राशि भाँपने का। अगर साथ में कुछ अपने मन-मिज़ाज के और भी लोग हों तो इन दोनों खेलों में बहुत मज़ा आता है।

अभी पिछले साल तक मेरी भांजी मेरे साथ रहती थी और इस तरह की खुराफातों में मेरा साथ दिया करती थी। कभी-कभी तो हम पंडाल तक जाये बिना ही भगवती जागरण का आनंद लूट लेते थे।
लेकिन उस दिन पंडाल वालों ने हमें लूट लिया।

काफी देर तक कुछ परिचित और कुछ अपरिचित सा लगता प्री-ल्यूड बजता रहा।
हम दोनों कभी एक, तो कभी दूसरा गाना समझते रहे।
तभी आवाज़ गूँजी - कुक कुक कुक कुक कुक ..............
पर्वत के ऊपर क्या है - पर्वत के ऊपर
मंदर के अंदर क्या है - मंदर के अंदर
हो मंदर में अम्बा मेरी, अम्बा जगदम्बा मेरी
जाऊँ कहाँ मैं तुझे छोड़ के ------ जय माँ। 

मुझे पूरा यकीन है कि शेरों वाली, पहाड़ों वाली, और सच्चियाँ जोताँ वाली माँ कभी इस अनिर्वचनीय गीत को भूल नहीं पायी होंगी। याद आते ही सिहर उठती होंगी।






Tuesday, April 12, 2016

My best friend or Bestie?

कल मेरी सबसे पुरानी सहेली वीणा का जन्म दिन था। मैंने सोचा सुबह-सवेरे दस कामों के बीच उसे मुबारकबाद देने से अच्छा रहेगा कि ऐसे समय फ़ोन करूँ जब कुछ देर फ़ुर्सत से बतिया सकूँ। इसलिये शाम की चाय निबटाकर और रात के खाने की धूम-धाम शुरू होने से पहले, आराम से पंखा चलाकर, सोफ़े पर पसरकर उसे फ़ोन किया। फ़ोन उठाते ही बोली - याद आ गया तुम्हें?

मैंने कहा - याद तो सवेरे से था, लेकिन इत्मीनान से बात करना चाहती थी।

उसकी इस बात पर मुझे बहुत मज़ा आया। कोई तो है जो मुझे इतने कम शब्दों में ताना दे सकता है। और साथ ही कोई ऐसा भी है जो इतने कम शब्दों में मेरी सफ़ाई सुन और समझ सकता है।

यह आज के इंस्टेंट रिश्तों में संभव नहीं हो सकता। आज मिले, कल साथ घूमे, परसों "बेस्टी" बन गये। एक महीने बाद एक-दूसरे के बारे में पूछिये तो हज़ार श्लोकी महाभारत के बराबर शिकायतें मिलेंगी। हो सकता है कि कुछ पशु-पक्षियों के नाम भी सुनने को मिलें, जैसे कुत्ता, लोमड़ी, भेड़िया, गिद्ध, आदि। अगर मासिक परीक्षा में पास हो गये तो साल-दो साल चल जाते हैं ऐसे रिश्ते।

लेकिन मेरे और वीणा जैसे रिश्ते की आस रखते हों तो बर्दाश्त करना सीखिये। बहुत सारा संयम और धैर्य रखने की आदत डालिये।


बचपन में हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे। घर भी हमारे आमने सामने थे। रिक्शे से एक साथ स्कूल जाना तय हुआ। मुझे समय से पहले पहुँच कर हल्ला मचाना अच्छा लगता था। घंटी बजने के बाद प्रार्थना के दौरान मेन गेट बंद हो जाता था। देर से आने वालों का स्वागत हमारी प्रिंसिपल लीला दी की पैनी निगाहें करती थीं।

मुझे देर से आने वालों के बीच खड़ा देख कर बोलीं - शुभ्रा, तुम्हें कैसे देर हो गयी?

उनका लहजा कुछ-कुछ - "Et tu Brute!" वाला था।

मैं शर्म से पानी-पानी। मन ही मन सोचा - अब कभी देर नहीं होने दूँगी।

लेकिन पता नहीं क्यों वीणा को रोज़ ही देर हो जाती।

मैं अपने बरामदे में रुआँसी सी टहलती रहती।

एक दिन मेरी नानी ने कहा - क्यों परेशान होती हो? किसी और के साथ चली जाया करो या कहो तो तुम्हारे लिये अलग रिक्शा बँधवा दें।

मैंने मुश्किल से आँसू रोक कर कहा - किसी और के साथ नहीं जायेंगे। हमारी दोस्त है वो, उसी के साथ जायेंगे।


पिछले साल वीणा की नातिन की अट्ठारहवीं सालगिरह थी। सबका इतना आग्रह था कि मुझे कोलकाता जाना पड़ा।

वीणा की बेटी ने पार्टी में मेरा परिचय देते हुए कहा - ये मेरी बेटी मेघना की बेस्ट फ्रेंड हैं, जो ख़ास इस फंक्शन के लिये दिल्ली से आयी हैं। यह बात और है कि संयोगवश ये मेरी माँ की भी बेस्ट फ्रेंड हैं।

तो दोस्तो! मेरे हिसाब से दोस्ती धीमी आँच पर पकी खीर सरीखी होनी चाहिये। तभी वह मीठी और सोंधी बनती है।


Sunday, April 10, 2016

दुर्गा दुर्गतिनाशिनी

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का हमारे देश के कैलेंडर में कुछ विशेष महत्त्व ज़रूर है, वरना एक ही तिथि को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से क्यों और कैसे मनाया जाता? उस दिन से नव संवत्सर आरम्भ होता है। वासन्ती नवरात्र आरम्भ होता है। इसके अलावा कहीं चेटी चंड, कहीं गुडि पाड़वा तो कहीं उगाडि अथवा युगादि मनाया जाता है। चलिए यह विमर्श फिर कभी करेंगे। आज देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के नौ दिनों यानी नवरात्रों की बात करते हैं।
शारदीय नवरात्र और वासन्ती नवरात्र एक दूसरे से ठीक छह महीने की दूरी पर आते हैं। एक सर्दियों से ठीक पहले तो दूसरा गर्मियों से ठीक पहले। आज के जलवायु परिवर्तन के दौर की बात छोड़ दें तो अब से पचास या चालीस वर्ष पूर्व तक नवरात्र में मौसम बदलने का साफ़ पता चलने लगता था। स्पष्ट है कि नवरात्र, बदलते मौसम का ऐलान करते हुए आते थे। इस के बाद ही जाड़ा और गर्मी अपने पूरे शबाब पर आते थे। पुराने दिनों में, साधनों के अभाव में प्रचण्ड जाड़ा या गर्मी दोनों ही प्राणलेवा हो सकते थे। ऐसे में माँ की याद आना स्वाभाविक ही है। कहा भी तो है -
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा क्षुधातृषार्ताः जननीं स्मरन्ति।
बच्चा आराम से खेलता रहता है। जब भूख प्यास लगती है, तभी माँ याद आती है। इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं। यह तो सहज स्वाभाविक बात है। उसी तरह हम भी अपने रोज़ के कामों में लगे रहते हैं। जब कभी दुःख-तकलीफ आती है तभी माँ दुर्गा को याद करते हैं। उन्हें अपनी रक्षा करने को बुलाते हैं। ठोकर लगती है तो मुँह से माँ का ही नाम निकलता है।
महाभारत की लड़ाई छिड़ने को थी। युद्ध टालने के कृष्ण के सभी प्रयास विफल हो गए थे। पांडव आधे राज्य की माँग छोड़कर, पाँच गाँवों से संतुष्ट होने को तैयार थे, लेकिन दुर्योधन उन्हें पाँच गाँव तो दूर, सुई की नोक बराबर भूमि देने को तैयार नहीं था। युद्ध अवश्यम्भावी था। बड़ा बेमेल युद्ध होने वाला था। एक ओर भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य जैसे महारथियों के साथ कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना और दूसरी ओर पांडवों की सात अक्षौहिणी। ऊपर से अर्जुन सगे-सम्बन्धियों से लड़ने को तैयार नहीं, संदेह और विषाद से घिरा हुआ।


सारथि कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाने को कहा और हथियार डाल दिये। कहने लगा - भला इनमें से किस पर गांडीव उठाऊँ ? किस पर तीर चलाऊँ ? मुझसे नहीं होगा, केशव।
तब कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। कहा - इन सबको तो एक दिन मरना ही है। तुम तो निमित्त मात्र हो। इसलिए उठो और युद्ध करो -
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।
तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा -
नैवं पापमवाप्स्यसि।
लेकिन कृष्ण ने एक बात और कही थी। उन्होंने अर्जुन को आदेश दिया कि विजय प्राप्त करने के लिये वह देवी दुर्गा की आराधना करे।
अर्जुन ने रथ से उतर कर, हाथ जोड़कर दुर्गा की स्तुति की। तेरह श्लोकों की इस स्तुति में देवी के सभी रूप और उनसे जुडी तमाम कथायें अन्तर्निहित हैं। देवी के विभिन्न नामों जैसे कुमारी, काली, कपाली, कपिला, भद्रकाली, महाकाली, चण्डी, कात्यायनी, कौशिकी, कराली, उमा, शाकम्भरी, स्कन्दमाता, दुर्गा के साथ-साथ उनके स्वरूप का भी विवरण मिलता है। वे पीत वस्त्र धारण करती हैं, अनेक आभूषणों से सुसज्जित हैं, उनके नेत्र धुँए से लाल-लाल हैं, उनके हाथों में शूल,खड्ग,खेटक जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं जिनसे उन्होंने महिष,कैटभ जैसे दैत्यों का संहार किया है। वे नन्द गोप के घर पैदा हुईं और कृष्ण की छोटी बहन के रूप में जानी जाती हैं। अपने भक्तों को वे गहन वन और कठिन संग्राम में अभय देती हैं। युद्ध में विजय दिलाती हैं।
इस नवरात्र में अगर आप कोई विशेष पूजा-अर्चना-उपवास न कर सकें तो कम से कम अर्जुन को विजय दिलाने वाली यह स्तुति तो पढ़ ही लीजिये -




नमस्ते सिद्धसेनानि आर्ये मन्दरवासिनि
कुमारि कालि कापालि कपिले कृष्णपिंगले। १।
भद्रकालि नमस्तुभ्यं महाकालि नमोस्तु ते
चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं तारिणि वरवर्णिनि। २।
कात्यायनि महाभागे करालि विजये जये
शिखिपिच्छध्वजधरे नानाभरणभूषिते। ३।
अट्टशूलप्रहरणे खड्गखेटकधारिणि
गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे नन्दगोपकुलोद्भवे। ४।
महिषासृक्प्रिये नित्यं कौशिकि पीतवासिनि
अट्टहासे कोकमुखे नमस्तेस्तु रणप्रिये। ५।
उमे शाकम्भरि श्वेते कृष्णे कैटभनाशिनि
हिरण्याक्षि विरूपाक्षि सुधूम्राक्षि नमोस्तु ते। ६।
वेदश्रुति महापुण्ये ब्रह्मण्ये जातवेदसि
जम्बू-कटक-चैत्येषु नित्यं सन्निहितालये। ७।
तवं ब्रह्मविद्या विद्यानां महानिद्रा च देहिनां
स्कन्दमातर्भगवति दुर्गे कान्तारवासिनि। ८।
स्वाहाकारः स्वधा चैव कला काष्ठा सरस्वति
सावित्रि वेदमाता च तथा वेदान्त उच्यते। ९।
स्तुतासि त्वं महादेवि विशुद्धेनान्तरात्मना
जयो भवतु मे नित्यं त्वत्प्रसादाद्रणाजिरे। १०।
कान्तारभयदुर्गेषु  भक्तानां चालयेषु च
नित्यं वससि पाताले युद्धे जयसि दानवान्। ११।
त्वं जम्भनी मोहिनी च माया ह्री: श्रीस्तथैव च
संध्या प्रभावती चैव सावित्री जननी तथा। १२।
तुष्टिः पुष्टिर्धृतिर्दीप्तिश्चन्द्रादित्यविवर्द्धिनी
भूतिर्भूतिमतां सङ्ख्ये वीक्ष्यसे सिद्धचारणे। १३।





Monday, April 04, 2016

चैती

होली के बीतते ही आता है चैत का महीना। बौराये आमों पर छके हुए भौंरों की गुंजार का महीना। खेत-खलिहान में जागने का महीना और जागती आँखों में सुनहरी फसलों के सपने सजाने का महीना। चैती की तान छेड़ने का महीना -

हिया जरत रहत दिन रैन, हो रामा, जरत रहत दिन रैन 
अम्बुआ की डाली पे कोयल बोले तनिक न आवत चैन हो रामा, जरत रहत दिन रैन।  
बँसवारी में मधुर सुर बाजे बिरही पपिहरा बोलन लागे 
मधुर-मधुर मधु बैन हो रामा। 
आस अधूरी प्यासी उमरिया छाये अँधेरा सूनी डगरिया 
डरत जिया बेचैन हो रामा। 

फ़िल्मी गीत होने के बावजूद इसमें लोकगीत की मिठास है। माटी की सुगंध है। शायद इसलिए कि इस गीत की रचना प्रक्रिया से जुड़े सभी लोग कहीं न कहीं बनारस-ग़ाज़ीपुर से जुड़े थे। उपन्यास के लेखक प्रेमचंद जी बनारस के पास लमही ग्राम के रहने वाले थे, जो अब हिन्दी के लेखक-पत्रकारों के लिए तीर्थ बन चुका है। फिल्म के निर्माता-निर्देशक त्रिलोक जेटली और गीतकार अंजान ख़ास बनारस के रहने वाले थे। और शायद कम  लोग जानते हों कि इस फिल्म के संगीतकार पंडित रविशंकर का बचपन बनारस के पास ग़ाज़ीपुर में बीता था। ग़ाज़ीपुर ने फिल्मी दुनिया को एक और ज़बरदस्त पटकथा-संवाद-गीत लेखक दिया था -  राही मासूम रज़ा। वही आधा गाँव उपन्यास और महाभारत टीवी सीरियल वाले - राही मासूम रज़ा। और अंजान यानी लालजी टंडन के बेटे समीर भी इन दिनों ख़ासे लोकप्रिय गीतकार माने जाते हैं।
तो बात हो रही थी गोदान फिल्म की इस चैती की, जिसे स्वर दिया था मुकेश जी ने और परदे पर अदा किया था राजकुमार जी ने। जब यह फिल्म बन रही थी तब लोगों को आशंका थी कि स्टाइलिश कपडे-जूते पहनने वाले राजकुमार भला गाँव के ग़रीब किसान होरी की भूमिका कैसे निभा पायेंगे। लेकिन राजकुमार ने जिस तरह प्रेमचंद जी के इस किरदार को परदे पर पेश किया, देखने वालों को एक पल के लिए भी याद नहीं आया कि वे होरी को नहीं राजकुमार को देख रहे हैं।
इस फिल्म में होरी के बेटे गोबर्धन बने थे महमूद। गोबर शहर में काम करता है और होली मनाने गाँव आता है। उसके पाँव जैसे घर की तरफ दौड़े चले जा रहे हैं। यहाँ भी एक बेहद खूबसूरत गीत था -

पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा कि हियरा में उठत हिलोर 
पुरवा के झोंकवा में आयो रे सन्देसवा कि चल आज देसवा की ओर। 
झुकि-झुकि बोलें कारे-कारे ये बदरवा कबसे पुकारे तोहे नैनों का कजरवा 
उमड़-घुमड़ जब गरजे बदरिया रे ठुमुक-ठुमुक नाचे मोर। 
सिमिट-सिमिट बोले लम्बी ये डगरिया, जल्दी-जल्दी चल राही अपनी नगरिया 
रहिया तकत बिरहिनिया दुल्हनिया रे बाँधि के लगनिया की डोर। 
यही नहीं गोदान की होली और सोहर भी खाँटी बनारसी रंग लिए हुए थीं।

बनारस में हमारे घर एक बड़े बुज़ुर्ग आते थे, जिनका जीवन पहले बड़े ही ऐशो-आराम में बीता था। शहर के बीच बीसियों दुकानों वाला कटरा, बहरी अलंग के लिये सारनाथ के पास अपना खुद का बहुत बड़ा बगइचा और सैर के लिए बग्घी-घोड़ों की सवारी। रईसों वाला एक शौक़ भी था - अच्छा संगीत सुनने का। मैं जब तक स्कूल में पहुँची, तब तक बिकने योग्य काफ़ी चीज़ें उस शौक़ की भेंट चढ़ चुकी थीं। लेकिन गीत रह गए थे - कुछ बड़ी मोती बाई के, कुछ रसूलन बाई के तो कुछ सिद्धेश्वरी जी के। जब कभी मौज में आते, हारमोनियम निकलवा कर हमें सिखाने लगते। आवाज़ बहुत धीमी, पर बड़ी मीठी थी उनकी। एक-एक खटका बड़े मनोयोग से सिखाते थे। उनसे सीखी थी ये चैती -

एहि ठैंया मोतिया हेराइ गइले रामा, कँहवा मैं ढूँढू।  
सास से पुछ्ल्युं ननदिया से पुछ्ल्युं 
सैंया से पूछत लजाय गइल्युं रामा, कँहवा मैं ढूँढू। 

दिल्ली आने के बाद मैं होली तो पहले की तरह गाती रही - कभी अम्मा के लेडी श्रीराम कॉलेज में, कभी अपने कोणार्क अपार्टमेंट्स में, तो कभी मनोहर श्याम जोशी जी के यहाँ कुमाऊँनी होली मिलन में, लेकिन चैती-कजरी कहीं "हेराइ गइलीं"..... मैं उन्हें ढूँढती भी तो कहाँ ढूँढती? और अगर ढूँढ भी लेती तो किसे सुनाती? बहुत साल बाद बनारस से जुडी एक फिल्म में उस पुरानी चैती के कुछ अंश फिर सुनने को मिले। यू ट्यूब महाराज की कृपा से ढूँढा और बार-बार सुना। लागा चुनरी में दाग़ के लिये रेखा भारद्वाज ने इसे परदे के पीछे से और हेमा मालिनी ने परदे के ऊपर गाया है। लेकिन बनारसी माटी की खुशबू नहीं मिली। वो तो वहीँ मिली, जहाँ बनारस की माटी के साथ गंगाजल भी रचा-बसा था। जी हाँ, पद्म विभूषण, विदुषी गिरिजा देवी के पास -

चैत मास चुनरी रंगइबे हो रामा, पिया घर अइहैं। 
पीत रंग लंहगा सबुज रंग चोलिया 
लाल रंग चुनरी रंगइबै हो रामा, पिया घर अइहैं।  

और अब बनारस की माटी और गंगाजल की सुगंध लिये मेरी अम्मा का एक गीत सुनिये जिसमें चैत की बयार में झूमती अमराई है और मन-मृदंग पर यादों की थाप है --
चैत की बयार बहे नाचे अमराई रे
मन मृदंग पर सुधि ने थाप सी लगाई रे। 

प्राण के मंजीर बँधे साँसों की डोर में 
मान-मनुहारों की ग्रंथियाँ हैं छोर में 
धड़कनों की राधिका मुरली सुन आई रे। 


 पलकों से छान कोई सोम सुधा पी आये 
अलसा कर गीतों की बगिया में सो जाये 
जैसे दबी बाँहों पर रेख  उभर आई रे। 

कल्पना की अल्पना चाहों के आँगन में 
चित के चौबारे पर नयन दीप साधन में 
आस की अँगुरियों ने बाती उकसाई रे। 

रंग भरी सहालग में भावना की लगन चढ़ी 
पन्ने की थाली में धरती ले पियरी खड़ी 
न्हाइ-धोई दुलहिन सी याद निखर आई रे। 

Holi





इस बार होली पर दोस्तों की महफ़िल में मैंने एक सवाल रखा -

मेरे लिए होली का मतलब है गुलाल, गीत और गुझिया। आपके लिये ?

बहुत सारे जवाब आये। सबने अपने-अपने तरीके से होली मनाने का ब्यौरा दिया। मगर देखा कि उनमें से ज़्यादातर चित्र बचपन के थे और गीत सभी के अभिन्न अंग थे।

अपने बचपन से शुरू करूँ तो होली से जुड़ा जो पहला गीत स्मृति में उभरता है, वह था -

जमुना तट श्याम खेलैं होरी, जमुना तट।
एक ओर खेलें कुँवर कन्हैया, एक ओर राधा गोरी रे, जमुना तट।


होली की एक टोली के चले जाने पर रंग-गुलाल से भीगे लोग घास पर पसरकर गुझिया-ठंडाई का आनंद लेते और हारमोनियम-तबले पर चलते रहते गीत -

फगवा ब्रिज देखन को चलो री।
फगवे में मिलेंगे कुँवर कान्ह, बाट चलत बोले कगवा।

और - आज बिरज में होरी रे रसिया,
होरी नहीं बरजोरी रे रसिया।

या फिर - कान्हा बरसाने में आय जइयो बुलाय गयीं राधा प्यारी
बुलाय गयीं राधा प्यारी रे समझाय गयीं राधा प्यारी।

लेकिन यह तो धुलड्डी के दिन की बात है। होली की तैयारी तो उससे बहुत दिन पहले से शुरू हो जाती थी। महिलाओं के बीच अनुपम "बहन-चारा" लागू हो जाता था। जो गुझिया की विशेषज्ञ होतीं, वे यू-ट्यूब के बिना ही उत्तम गुझिया बनाने का प्रशिक्षण देने लगतीं । सेव-गाठिया-पापड़ी की एक्सपर्ट विशेष प्रकार का बेसन या तेल मँगाने की सलाह देती। और, ठंडाई में सौंफ या काली मिर्च कितनी रखी जाये, यह बहस संयुक्त राष्ट्र की बहसों से भी ज़्यादा धमाकेदार हो जाती।

दूध वाले को हिदायत दी जाती कि रोज़ थोड़ा गोबर लाकर देगा। उस गोबर के छोटे-छोटे कंडे या उपले पाथे जाते। सूख जाने पर उनके बीच में छेदकर, मूँज की रस्सी में पिरोकर छोटी-बड़ी मालायें बनायी जातीं। आँगन के बीचोंबीच रेत का चौका पूरकर इन मालाओं से एक मिनी पहाड़ बनाया जाता। होलिका-दहन के समय चौराहे से कुछ अंगारे लाकर होली जलायी जाती। हम बच्चे यथाशक्ति गला फाड़कर चिल्लाते - "होलिका माता जर गयीं, बच्चन का आसीस दे गयीं।" गेहूं और चने की बालियों को होलिका में भूनते हुए परिक्रमा करते और लोटे से गुड़ घुले पानी का प्रसाद पाते। यहीं पूजा करते हुए पहली बार गुलाल का टीका लगाने और गुलाल उड़ाने की इजाज़त मिलती। तब लगता कि अब होली आयी।

बनारस आने से पहले नानाजी गोरखपुर में पोस्टेड थे। वहाँ आँगन के एक कोने में बर्तन माँजने का शेड था और पानी जमा करने के लिए सीमेंट की एक पक्की टंकी थी। इतनी बड़ी कि चार-पाँच बच्चे आराम से छपर-छपर कर सकते थे। नहीं कर पाते थे क्योंकि नानी और उनके दरबारी शरारती बच्चों की रग-रग से वाक़िफ़ थे। लेकिन होली के दिन हमें उस टंकी में कूदने-नहाने की खुली छूट थी। होली से कुछ दिन पहले उसकी काई साफ़ की जाती और दो दिन पहले से टेसू के फूल पानी में डाल दिए जाते। 

होली की टोलियाँ आतीं तब एकाध बाल्टी गरम पानी भी डाल दिया जाता। पहले हम आने वालों के साथ शराफत से पिचकारियाँ भरकर रंग खेलते लेकिन जल्दी ही याद आता कि टंकी बस आज के दिन ही हमारी है। बस छपाक-छैंया शुरू हो जाती। बारह बजे के बाद कान पकड़कर ही बाहर निकाले जाते। फिर नहलाने-धुलाने का महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू होता। हालांकि टेसू का रंग और लाल-पीला गुलाल छुड़ाने में कोई ख़ास मेहनत नहीं पड़ती थी लेकिन रस्म-अदायगी के तौर पर डाँट बराबर पड़ती रहती।

शाम को फिर गीत-संगीत की महफ़िल गुलज़ार होती। ब्रिज में कान्हा, बरसाने में राधा और अवध में रघुबीरा की होली के संगीतमय विवरण के साथ कभी-कभी औघड़ बाबा भोलेनाथ की होली का भी बयान होता -

भोला काहे ना ताकेला अँखियाँ खोलके, सुन्दर मुख से बोलके ना।
दिव्य होलियों की इस महफ़िल में कभी कोई भूले से दिलीप कुमार- मीना कुमारी की --

तन रंग लो जी आज मन रंग लो, तन रंग लो

या फिर सुनील दत्त और चंचल की - होली आई रे कन्हाई रंग छलके, सुना दे ज़रा बाँसुरी - सुना बैठता तो बड़े-बूढ़ों को पसंद नहीं आता। इसके बाद फ़िल्मी गाने सुनाने वाला अगर ख़ुद ही "वृंदावन धाम अपार भजे जा राधे-राधे" पर लौट आता, तब तो ठीक वरना फिर उसे चाय-मिठाई लाने के बहाने महफ़िल से उठा दिया जाता। जो लोग गा नहीं सकते थे, वे कवित्त-सवैयों से लैस होकर आते।

फाग की भीर अबीरन की गुपालहि लै गयी भीतर गोरी
नैन नचाय कही मुसकाय लला फिर आइयो खेलन होरी।

भई, झूठ क्यों कहें हमें तो वो फिल्मी होली गाने वाले अंकल-आंटी भी अच्छे लगते थे। और वो दीदियाँ भी जो न जाने कहाँ से बड़ी मज़ेदार होलियाँ सीख आती थीं, जैसे -

होली में बाबा देवर लागे, होली में।
और -- फागुन मस्त महिनवा हो सजना छोड़ , नौकरिया घर बइठ।

फिर जब हम सीनियर स्कूल में पहुँचे और राजेश खन्ना को "लाइक" करने लगे, तब हमने पहली बार बग़ावत का झंडा बुलंद किया। बात यह थी कि जब राजेश खन्ना ने कह दिया कि -

आज न छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली -- खेलेंगे हम होली
चाहे भीगे तेरी चुनरिया चाहे भीगे रे चोली -- खेलेंगे हम होली।

तो हमने भी उनके इस ऐलान-ए-जंग को होली की हर बैठक तक पहुँचाना, अपना परम धर्म मान लिया। क्या करें तब तक बाबू मोशाय अमिताभ बच्चन ने अपना रंग नहीं बरसाया था न!

रंग बरसे भीजे चुनर वाली, रंग बरसे।

उनका रंग बरसते ही सारे पिछले रंग फीके पड़ गये। हालाँकि हम अपनी ज़िद्द में नवरंग के नटखट को तब भी गाली देते रहे।

अरे जारे हट नटखट, न छू रे मेरा घूँघट, पलट के दूँगी आज तुझे गाली रे
मुझे समझो न तुम भोली-भाली रे।
आया होली का त्यौहार, पड़े रंग की बौछार, तू है नार नखरेदार मतवाली रे
आज मीठी लगे है तेरी गाली रे।

तब से अब तक बहुत सारी होलियाँ बीत चुकी हैं। हमें जैसे कपडे आठ साल की उम्र में पहनने की अनुमति नहीं थी, उन्हें पहनकर आज की अट्ठाइस साला युवती गा रही होती है --

बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी तो सीधी-सादी लड़की शराबी हो गयी।

लेकिन होली तो फिर भी होली है। उमंग, उछाह और उम्मीदों का त्यौहार। यह बात दीगर है कि अब मेरे गालों के बजाय पैरों पर गुलाल लगाने वालों की संख्या बढ़ गयी है लेकिन तो भी न तो मेरा गाने का उत्साह मंद हुआ है, न गुझिया खाने का, और न गुलाल लगवाने का।

बोल जोगीरा सरररर!

Friday, April 01, 2016

साँझ

साँझ
---डॉ शकुन्तला शर्मा

साँझ ऐसी मुरझायी सी ढर आये रे
जैसे गेंदा की बगिया ठिठर जाये रे।
बादल के छज्जे पे लहँगे की लहरन
पेड़ों की गोट जड़ी जोड़-जोड़ कतरन
अधर में लटकती सी पकड़ क्षितिज की धरन
धरती पर दलदल है कहाँ धरे थके चरन
भूखे खेतों का मुखड़ा उभर आये तो दबी कोहरे सी पीड़ा पसर जाये रे।

साँझ ऐसी .......
सागर की सीमा पे ललछौंही गहरन
दुखियारी आँखों में काजल की धुँधलन
मेघों की हलचल में किरणों की उलझन
मेले में जैसे भटक जाये दुलहन
घिरते अंधियारे में ऐसी घबराये रे, बंद कमरे में ज्यों पाँखी डर जाये रे।

साँझ ऐसी .........
अनचाहे बालक से गाँव के घरौंदे
नदिया में पाँव कहीं डाँव-डाँव डोलते
पपड़ी भरे होठों सा छपरी मुख खोलते
दिया बरे लायेगी मैया कुछ खोजके
मैले नभ से सितारे छिटक आये रे, जैसे आँचल से मकई बिथर जाये रे।

साँझ ऐसी .........



संध्या सुन्दरी 
----निराला

दिवसावसान का समय-
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या-सुन्दरी, परी सी,
धीरे, धीरे, धीरे
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,
किंतु ज़रा गंभीर, नहीं है उसमें हास-विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक-
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले-काले बालों से,
हृदय राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
अलसता की-सी लता,
किंतु कोमलता की वह कली,
सखी-नीरवता के कंधे पर डाले बाँह,
छाँह सी अम्बर-पथ से चली।
नहीं बजती उसके हाथ में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,
नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा 'चुप चुप चुप'
है गूँज रहा सब कहीं-


एक तारा 
---सुमित्रानंदन पंत
नीरव सन्ध्या में प्रशान्त
डूबा है सारा ग्राम-प्रान्त।
पत्रों के आनत अधरों पर सो गया निखिल बन का मर्मर,
ज्यों वीणा के तारों में स्वर।
खग-कूजन भी हो रहा लीन, निर्जन गोपथ अब धूलि-हीन,
धूसर भुजंग-सा जिह्म, क्षीण।
झींगुर के स्वर का प्रखर तीर, केवल प्रशान्ति को रहा चीर,
सन्ध्या-प्रशान्ति को कर गभीर।
इस महाशान्ति का उर उदार, चिर आकांक्षा की तीक्ष्ण-धार
ज्यों बेध रही हो आर-पार।
अब हुआ सान्ध्य-स्वर्णाभ लीन,
सब वर्ण-वस्तु से विश्व हीन।
गंगा के चल-जल में निर्मल, कुम्हला किरणों का रक्तोपल
है मूँद चुका अपने मृदु-दल।
लहरों पर स्वर्ण-रेख सुन्दर, पड़ गई नील, ज्यों अधरों पर
अरुणाई प्रखर-शिशिर से डर।
तरु-शिखरों से वह स्वर्ण-विहग, उड़ गया, खोल निज पंख सुभग,
किस गुहा-नीड़ में रे किस मग!
मृदु-मृदु स्वप्नों से भर अंचल, नव नील-नील, कोमल-कोमल,
छाया तरु-वन में तम श्यामल।
पश्चिम-नभ में हूँ रहा देख
उज्ज्वल, अमन्द नक्षत्र एक!
अकलुष, अनिन्द्य नक्षत्र एक ज्यों मूर्तिमान ज्योतित-विवेक,
उर में हो दीपित अमर टेक।
किस स्वर्णाकांक्षा का प्रदीप वह लिए हुए? किसके समीप?
मुक्तालोकित ज्यों रजत-सीप!
क्या उसकी आत्मा का चिर-धन स्थिर, अपलक-नयनों का चिन्तन?
क्या खोज रहा वह अपनापन?
दुर्लभ रे दुर्लभ अपनापन, लगता यह निखिल विश्व निर्जन,
वह निष्फल-इच्छा से निर्धन!


William Wordsworth
It is a beauteous evening, calm and free;
The holy time is quiet as a nun
Breathless with adoration; the broad sun
Is sinking down in its tranquility;
The gentleness of heaven is on the sea.

Lew Sarett
God is at the anvil, beating out the sun
Where the molten metal spills
At his forge among the hills
He has hammered out the glory of a day that's done.

Anon
Lord of the far horizons
Give us the eyes to see
Over the verge of the sundown
The glory that is to be.
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