Sunday, April 10, 2016

दुर्गा दुर्गतिनाशिनी

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का हमारे देश के कैलेंडर में कुछ विशेष महत्त्व ज़रूर है, वरना एक ही तिथि को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से क्यों और कैसे मनाया जाता? उस दिन से नव संवत्सर आरम्भ होता है। वासन्ती नवरात्र आरम्भ होता है। इसके अलावा कहीं चेटी चंड, कहीं गुडि पाड़वा तो कहीं उगाडि अथवा युगादि मनाया जाता है। चलिए यह विमर्श फिर कभी करेंगे। आज देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के नौ दिनों यानी नवरात्रों की बात करते हैं।
शारदीय नवरात्र और वासन्ती नवरात्र एक दूसरे से ठीक छह महीने की दूरी पर आते हैं। एक सर्दियों से ठीक पहले तो दूसरा गर्मियों से ठीक पहले। आज के जलवायु परिवर्तन के दौर की बात छोड़ दें तो अब से पचास या चालीस वर्ष पूर्व तक नवरात्र में मौसम बदलने का साफ़ पता चलने लगता था। स्पष्ट है कि नवरात्र, बदलते मौसम का ऐलान करते हुए आते थे। इस के बाद ही जाड़ा और गर्मी अपने पूरे शबाब पर आते थे। पुराने दिनों में, साधनों के अभाव में प्रचण्ड जाड़ा या गर्मी दोनों ही प्राणलेवा हो सकते थे। ऐसे में माँ की याद आना स्वाभाविक ही है। कहा भी तो है -
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा क्षुधातृषार्ताः जननीं स्मरन्ति।
बच्चा आराम से खेलता रहता है। जब भूख प्यास लगती है, तभी माँ याद आती है। इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं। यह तो सहज स्वाभाविक बात है। उसी तरह हम भी अपने रोज़ के कामों में लगे रहते हैं। जब कभी दुःख-तकलीफ आती है तभी माँ दुर्गा को याद करते हैं। उन्हें अपनी रक्षा करने को बुलाते हैं। ठोकर लगती है तो मुँह से माँ का ही नाम निकलता है।
महाभारत की लड़ाई छिड़ने को थी। युद्ध टालने के कृष्ण के सभी प्रयास विफल हो गए थे। पांडव आधे राज्य की माँग छोड़कर, पाँच गाँवों से संतुष्ट होने को तैयार थे, लेकिन दुर्योधन उन्हें पाँच गाँव तो दूर, सुई की नोक बराबर भूमि देने को तैयार नहीं था। युद्ध अवश्यम्भावी था। बड़ा बेमेल युद्ध होने वाला था। एक ओर भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य जैसे महारथियों के साथ कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना और दूसरी ओर पांडवों की सात अक्षौहिणी। ऊपर से अर्जुन सगे-सम्बन्धियों से लड़ने को तैयार नहीं, संदेह और विषाद से घिरा हुआ।


सारथि कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाने को कहा और हथियार डाल दिये। कहने लगा - भला इनमें से किस पर गांडीव उठाऊँ ? किस पर तीर चलाऊँ ? मुझसे नहीं होगा, केशव।
तब कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। कहा - इन सबको तो एक दिन मरना ही है। तुम तो निमित्त मात्र हो। इसलिए उठो और युद्ध करो -
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।
तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा -
नैवं पापमवाप्स्यसि।
लेकिन कृष्ण ने एक बात और कही थी। उन्होंने अर्जुन को आदेश दिया कि विजय प्राप्त करने के लिये वह देवी दुर्गा की आराधना करे।
अर्जुन ने रथ से उतर कर, हाथ जोड़कर दुर्गा की स्तुति की। तेरह श्लोकों की इस स्तुति में देवी के सभी रूप और उनसे जुडी तमाम कथायें अन्तर्निहित हैं। देवी के विभिन्न नामों जैसे कुमारी, काली, कपाली, कपिला, भद्रकाली, महाकाली, चण्डी, कात्यायनी, कौशिकी, कराली, उमा, शाकम्भरी, स्कन्दमाता, दुर्गा के साथ-साथ उनके स्वरूप का भी विवरण मिलता है। वे पीत वस्त्र धारण करती हैं, अनेक आभूषणों से सुसज्जित हैं, उनके नेत्र धुँए से लाल-लाल हैं, उनके हाथों में शूल,खड्ग,खेटक जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं जिनसे उन्होंने महिष,कैटभ जैसे दैत्यों का संहार किया है। वे नन्द गोप के घर पैदा हुईं और कृष्ण की छोटी बहन के रूप में जानी जाती हैं। अपने भक्तों को वे गहन वन और कठिन संग्राम में अभय देती हैं। युद्ध में विजय दिलाती हैं।
इस नवरात्र में अगर आप कोई विशेष पूजा-अर्चना-उपवास न कर सकें तो कम से कम अर्जुन को विजय दिलाने वाली यह स्तुति तो पढ़ ही लीजिये -




नमस्ते सिद्धसेनानि आर्ये मन्दरवासिनि
कुमारि कालि कापालि कपिले कृष्णपिंगले। १।
भद्रकालि नमस्तुभ्यं महाकालि नमोस्तु ते
चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं तारिणि वरवर्णिनि। २।
कात्यायनि महाभागे करालि विजये जये
शिखिपिच्छध्वजधरे नानाभरणभूषिते। ३।
अट्टशूलप्रहरणे खड्गखेटकधारिणि
गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे नन्दगोपकुलोद्भवे। ४।
महिषासृक्प्रिये नित्यं कौशिकि पीतवासिनि
अट्टहासे कोकमुखे नमस्तेस्तु रणप्रिये। ५।
उमे शाकम्भरि श्वेते कृष्णे कैटभनाशिनि
हिरण्याक्षि विरूपाक्षि सुधूम्राक्षि नमोस्तु ते। ६।
वेदश्रुति महापुण्ये ब्रह्मण्ये जातवेदसि
जम्बू-कटक-चैत्येषु नित्यं सन्निहितालये। ७।
तवं ब्रह्मविद्या विद्यानां महानिद्रा च देहिनां
स्कन्दमातर्भगवति दुर्गे कान्तारवासिनि। ८।
स्वाहाकारः स्वधा चैव कला काष्ठा सरस्वति
सावित्रि वेदमाता च तथा वेदान्त उच्यते। ९।
स्तुतासि त्वं महादेवि विशुद्धेनान्तरात्मना
जयो भवतु मे नित्यं त्वत्प्रसादाद्रणाजिरे। १०।
कान्तारभयदुर्गेषु  भक्तानां चालयेषु च
नित्यं वससि पाताले युद्धे जयसि दानवान्। ११।
त्वं जम्भनी मोहिनी च माया ह्री: श्रीस्तथैव च
संध्या प्रभावती चैव सावित्री जननी तथा। १२।
तुष्टिः पुष्टिर्धृतिर्दीप्तिश्चन्द्रादित्यविवर्द्धिनी
भूतिर्भूतिमतां सङ्ख्ये वीक्ष्यसे सिद्धचारणे। १३।





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