Wednesday, April 20, 2016

उपमा कालिदासस्य

बचपन से किताबें पढ़ने की ऐसी चाट पड़ गयी थी कि जो कुछ हाथ लग जाये - चाट जाती थी। सातवीं क्लास में थी जब पापा की पोस्टिंग गोवा हुई। गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त हुए कुछ ही दिन हुए थे। वातावरण कोंकणी या भारतीय कम, पुर्तगाली अधिक था। खान-पान हो या रहन-सहन सभी पर विदेशी छाप नज़र आती थी। दस-ग्यारह वर्ष के बच्चों के हाथ में बियर की बोतल दिख जाना, कोई अजूबा नहीं था। ऐसे में मुझे पढ़ने के लिए बच्चों की वह पत्र-पत्रिकायें कहाँ से मिलतीं, जिनकी मुझे आदत थी। बनारस और लखनऊ में पराग और चंदामामा नियमित रूप से घर आती थीं। और जब कभी रेल का सफर करना होता, तब बड़े लोग मेरे सवालों की झड़ी से बचने के लिये ए. एच. व्हीलर के स्टॉल से मुझे मनमोहन, राजा भैया या बालक में से कुुछ भी खरीद देने को तैयार हो जाते थे।

पणजी में रेडियो के अधिकारियों के लिए सरकारी आवास नहीं थे। स्थानीय लोग अपने घरों में रहते थे और बाहर से आने वालों को होटल में शरण लेनी पड़ती थी। सरकारी कॉलोनी होती तो साथ खेलने के लिये शायद हम-उम्र बच्चे मिल जाते लेकिन होटल में ऐसी कोई व्यवस्था संभव नहीं थी। होटल मालिक के पास एक बेहद खूँख्वार-सा लगता एलसेशियन कुत्ता था, जो जल्द ही मेरा अच्छा दोस्त बन गया। जिस दिन उसने मुझसे हाथ मिलाया, उसी दिन मैंने अपनी अम्मा को भी ये सौगात दिलानी चाही। मगर अम्मा उसके विकराल रूप से ऐसी घबरायीं कि उलटे मुझे भी उसके साथ खेलने की सख़्त मनाही हो गयी।

इसके बाद मेरे पास किताबों के अलावा कोई साथी नहीं था, पर मुश्किल यह थी कि पापा वहां गिनी-चुनी किताबें ही ले गए थे। उनमें से एक कम्प्लीट वर्क्स ऑफ़ शेक्सपियर थी और दूसरी कालिदास ग्रन्थावली। शेक्सपियर को तो मैंने पूरे सम्मान के साथ अपने कोने में ही खड़े रहने दिया और कालिदास पर ध्यान लगाया। अम्मा ने बताया कि कालिदास से डरने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि उन्होंने भले ही संस्कृत में लिखा था, लेकिन पूरी कहानी वहाँ हिंदी में भी दी हुई है। दरअसल वह आचार्य सीताराम चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित कालिदास ग्रन्थावली थी, जिसमें सभी काव्यों और नाटकों के मूल संस्कृत पाठ के साथ उनका हिंदी अनुवाद भी उसी पृष्ठ पर दिया हुआ था। अब हिंदी पढ़ना तो मैं जानती ही थी - मैंने कालिदास को बाँचने का मन बना लिया।

होटल के जिस कमरे में हम रहते थे, उसके आगे से सर्विस लेन गुज़रती थी। उसके और मेन रोड के बीच हरित पट्टी थी, जिस पर छायादार पेड़ लगे हुए थे। उनमें से एक पेड़ का तना लगभग चार फुट की ऊँचाई पर दो हिस्सों में बँट गया था। पेड़ पर चढ़कर बैठने के लिए यह जगह बहुत सुरक्षित और आरामदेह थी। दूसरे, पत्तियों के बीच से मेरे बालों में बँधा रिबन अम्मा को होटल के कमरे से नज़र आ जाता था, सो वे भी निश्चिन्त रहती थीं। मैंने उस पेड़ को अपना स्टडी कॉर्नर बना लिया। रोज़ सुबह नाश्ते के बाद से दोपहर के खाने तक मैं वहीँ पायी जाती थी। आप शायद विश्वास न करें लेकिन मैंने उसी पेड़ पर बैठे- बैठे रघुवंश, मेघदूत, कुमारसम्भव, शकुंतला, मालविका, उर्वशी, सभी को पढ़ डाला। उस उम्र में मुझे क्या और कितना समझ में आया होगा - यह तो भगवान ही जानें। लेकिन पापा जब कभी किसी नये व्यक्ति से मेरा परिचय कराते हुए कहते कि हमारी बिटिया आजकल कालिदास पढ़ रही है तो मैं अपने आप को विद्योत्तमा से कम नहीं समझती थी।

उसी पुस्तक में कुछ आलोचनात्मक लेख भी थे जैसे निसर्ग कन्या शकुंतला, कालिदास और प्रकृति, या कालिदास की उपमा। मैंने वो लेख भी पढ़ डाले। यहाँ से एक नया खेल मिला। लेखों में जिन श्लोकों का उल्लेख था, उन्हें मूल काव्य या नाटक में ढूँढने का।


जैसे कि एक लेख में पढ़ा कि कालिदास की एक उपमा इतनी पसंद की गयी कि उनका नाम ही "दीपशिखा कालिदास" पड़ गया। वह उपमा थी -

संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा।
नरेंद्र मार्गाट्ट इव प्रपदे विवर्णभावं स स भूमिपालः।।


रघुवंश का प्रसंग है। इंदुमती का स्वयंवर हो रहा था। बहुत से राजा-राजकुमार जमा हुए थे। हाथ में वरमाला लिए वह जिस राजा को छोड़कर आगे बढ़ जाती उसका चेहरा ऐसा धुँधला पड़ जाता जैसे मशाल के आगे बढ़ जाने से अँधेरे में खोये सड़क किनारे के मकान हों।

अब मुझे धुन चढ़ गयी कि रघुवंश में यह श्लोक खोज निकालना है। पहले कहानी समझी - अयोध्या के राजा दिलीप और उनकी पत्नी सुदक्षिणा, जिनका कोई पुत्र नहीं था। गुरु वसिष्ठ ने उन्हें कामधेनु की पुत्री नंदिनी की सेवा करने का आदेश दिया। उनके बेटे हुए रघु, जिनके नाम से पूरा वंश प्रसिद्ध हुआ। रघु की दिग्विजय, उनका सुशासन, और उनकी दानशीलता। उनके पुत्र अज जिनका विवाह इंदुमती से हुआ। तो विवाह से ठीक पहले कहीं मिलना चाहिए यह श्लोक। और जब मैंने सचमुच उस श्लोक को ढूँढ निकाला तब ज़रा मेरी अकड़ देखी होती आपने। इतना अकड़कर तो बेचारे वास्को डी गामा ने गोवा में प्रवेश नहीं किया होगा।
बाद में बी ए के कोर्स में जब रघुवंश के कुछ और अंश पढ़े तब समझ में आया कि लोग क्यों कालिदास की उपमा का इतना गुणगान करते हैं। पहला श्लोक देखिये -

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ।।

शब्दों और उनके अर्थों को अच्छी तरह समझने के लिये मैं जगत के माता-पिता - पार्वती और शंकर - की वंदना करता हूँ, जो स्वयं भी शब्द तथा अर्थ की तरह सदा जुड़े हुए हैं।

इसके बाद कहते हैं कि मेरी हिम्मत तो देखिये कैसा असम्भव काम करने चला हूँ। इतने महिमाशाली वंश का बखान करने चला हूँ जैसे कोई छोटी सी डोंगी लेकर महासागर को पार करने चले, या जैसे कोई बौना ऊँचे लम्बे पेड़ का फल तोड़ने की कोशिश करे।
क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषयामतिः।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्।।
मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम्।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्बाहुरिव वामनः।।

कालिदास को कहीं से पढ़िये,एक से बढ़कर एक उपमा मिलेगी, एक के बाद एक उपमानों की झड़ी मिलेगी।

शकुन्तला के अछूते सौंदर्य को देखकर दुष्यंत ऐसे ही उपमानों की झड़ी लगा देते हैं -

 
अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै
रनाविद्धं रत्नं मधु नवमनास्वादितरसम्।
अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनघं
न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः।।

यह तो अनसूँघा फूल है, अनछुआ पत्ता है, अनबिंधा रत्न है, अनचाखा शहद है।

न जाने कितने संचित पुण्यों के फल जैसी इस शकुन्तला को पता नहीं विधाता ने किसके भाग्य में लिखा है।

कुमारसम्भवम् में शिव के तपस्वी रूप का वर्णन करते हुए भी एक से बढ़कर एक उपमान देखने को मिलते हैं -





अवृष्टिसंरम्भमिवाम्बुवाहमपामिवाधारमनुत्तरङ्गम्।
अंतश्चराणां मरुतां निरोधान्निर्वातनिष्कम्पमिव प्रदीपम्।।


शरीर के अंदर चलने वाली प्राण-अपान आदि सभी वायु को रोक कर वे ऐसे अचल बैठे हुए हैं जैसे वर्षा न करने वाला बादल, जैसे बिना तरंगों वाला ताल, और जैसे बिना हवा के स्थान में निष्कम्प प्रदीप।

है कहीं कालिदास की इन उपमाओं की कोई उपमा ?

5 comments:

  1. काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।
    तत्रापि च चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम्।।
    जिज्जी ...आनन्द आ गया पढ़ कर ... ये श्लोक याद आ गया जिसे अभिज्ञान शाकुन्तलम् पढ़ते हुए हम खूब उच्चरित करते थे।

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  2. काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।
    तत्रापि च चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम्।।
    जिज्जी ...आनन्द आ गया पढ़ कर ... ये श्लोक याद आ गया जिसे अभिज्ञान शाकुन्तलम् पढ़ते हुए हम खूब उच्चरित करते थे।

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  3. Archna Pant says: अहा ! आनंद आ गया ... आपके बचपन के दिन .. आपकी जीवन्तता ... आपका नटखट स्वभाव... पढने की, जानने की अदम्य जिज्ञासा ... आपका खिलंदड़ी स्वभाव (पेड़ पर उचक कर बैठ जाना और उसे अपनी स्टडी बना लेना ... ये कोई आम लड़की कर सकती है भला ? ....You are the quintessential Grand Sophy !)
    और आपकी लेखनी में मौसाजी जैसे फिर प्राणवान हो गए ...
    सचमुच अद्भुत है आपकी लेखनी !
    कालिदास जी के भी कैसे चुन चुन के श्लोक लायीं हैं आप ... वाकई क्या उपमाएं दीं हैं ...

    संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा।
    नरेंद्र मार्गाट्ट इव प्रपदे विवर्णभावं स स भूमिपालः।।

    इतना सब पढ़ाने के लिए .. बहुत बहुत धन्यवाद ..बहुत बहुत प्यार !

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    1. achiradhasthitrajya: shatru: prakritiswarudhtwat: / navshnrohansithilastruriv shukr: shamuddhartum // mtb - rajsinhasan par jaldi hi baitha huaa shatru , jo praja me apni jadha na jma saka ho , vah shithil vriksha ke saman saralta se ukhada ja sakta hai //

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