Monday, June 20, 2016

असाढ़ का पहला दिन



कई बरसों बाद ऐसा सुयोग आया है कि जेठ महीने की पूर्णिमा का चाँद देखने छत पर निकली तो लू के थपेड़ों ने नहीं, शीतल मंद बयार ने शरीर का ताप मिटाया। वैसे कल रात चाँद पूरे से थोड़ा सा कम, यानी चौदहवीं का चाँद लग रहा था लेकिन पोथी-पत्रे के चक्करों से बचने के लिए मैंने कल पूर्णिमा और आज जेठ बदी प्रतिपदा मान ली है।

तो कल की ठंडी हवाओं से उम्मीद बँध गयी थी कि शायद कालिदास के शब्दों को सही साबित करते हुए असाढ़ का पहला दिन घन-घटाओं से लैस होगा।
आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।
कुबेर के शाप के कारण एक साल के लिए अपने घर से और अपनी प्रिया से दूर विरही यक्ष ने आषाढ़ के पहले दिन बादलों से लिपटी पहाड़ की चोटी को देखा, तो उसे ऐसा लगा जैसे कोई हाथी खेल-खेल में अपने सर की टक्कर से उसे गिराने की कोशिश कर रहा हो।



मैं भी कोई ऐसा ही नज़ारा देख पाने की आस में सुबह से अपने आठवीं मंज़िल के घर के खिड़की-दरवाज़े खोले बैठी थी। लेकिन दस बजते-न-बजते सूरज की वक्र दृष्टि का प्रहार झेलना कठिन हो गया, तब निराश होकर खिड़कियाँ बंद कर दीं और परदे खींच कर नीम अँधेरा कर लिया।

तीन बजे से फिर ठंडी हवा के झोंके आने शुरू हुए। आसमान भी साँवला-सलोना लग रहा था। बड़ी देर तक, बिमल दा की सुजाता का गीत गुनगुनाती बालकनी में खड़ी रही।

काली घटा छाये, मोरा जिया तरसाये, ऐसे में कहीं कोई मिल जाये
बोलो किसी का क्या जाये रे, क्या जाये रे, क्या जाये?



अब ज़ाहिर है कि साठ साल की उम्र में किसी ऐसे का इंतज़ार तो था नहीं जो "मेरे हाथों को थामे, हँसे और हँसाये, मेरा दुःख भुलाये"। इंतज़ार सिर्फ़ बरखा रानी का था कि वो आये, मुझे भिगाये और घमौरियों का दुःख भुलाये। लेकिन वो भी अजब ठसक में है। दो-चार बूँदें टपका कर अपने आस-पास होने का एहसास करा रही है लेकिन खुलकर सामने नहीं आ रही।

मुझे याद आ गयी मोहन राकेश की मल्लिका। वह भी आषाढ़ के एक दिन पर्वत प्रदेश की वर्षा में भीग कर आयी थी।

" चारों ओर धुँआरे मेघ घिर आये थे। मैं जानती थी वर्षा होगी फिर भी मैं घाटी की पगडण्डी पर नीचे उतरती गयी। एक बार मेरा अंशुक भी हवा ने उड़ा दिया। फिर बूँदें पड़ने लगीं।
बहुत अद्भुत अनुभव था माँ, बहुत अद्भुत। नील कमल की तरह कोमल और आर्द्र ! वायु की तरह हल्का और स्वप्न की तरह चित्रमय !"

बारिश में भीगती मल्लिका की कल्पना करने चलें तो सबसे पहले गुरु फिल्म की ऐश्वर्या राय सामने आ खड़ी होती हैं। ठीक भी है! विश्वस्तरीय कवि की कल्पना कोई विश्व सुंदरी ही तो होगी न?
बरसो रे मेघा-मेघा बरसो रे मेघा-मेघा बरसो रे मेघा बरसो।



बारिश में भीगना मुझे भी बहुत पसंद है। जमकर बरसात हो रही हो तो बंद कमरे में बैठना मेरे लिए असह्य हो जाता है।


​बारिश के मौसम में हमेशा खादी या हैंडलूम के कुर्ते पहनती हूँ, न जाने कब भीगने का मौक़ा मिल जाये। मौक़ा मिल गया तो ठीक, वरना खुरपी से खोदकर निकाल लेती हूँ।

नहीं समझे ? अरे भाई, बाहर रखे गमलों की साज-सँभाल करने पहुँच जाती हूँ। फिर मैं और मेरे पेड़-पौधे मिलकर बरसात का आनंद लेते हैं, जैसे ये दोनों ले रहे हैं -
सोना करे झिलमिल-झिलमिल, रूपा हँसे कैसे खिल-खिल
अहा अहा वृष्टि पड़े टापुर-टुपुर, टिप-टिप टापुर-टुपुर।

Friday, June 17, 2016

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये


याद है दोस्तो! स्कूल में जब अनुप्रास, श्लेष, यमक, उपमा, उत्प्रेक्षा अलंकार पढ़ाये जाते थे? न सिर्फ इनकी परिभाषायें, बल्कि सबके उदाहरण भी याद करने पड़ते थे। आज अचानक उन्हीं दिनों का याद किया यह पद बार-बार कानों में मंजीरे सा बजने लगा।

"तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये"। 

तरणि- तनुजा यानी सूर्य की पुत्री यमुना। पुराणों में यमुना को सूर्य की पुत्री बताया गया है और यम को उनका भाई। तो उसी सूर्य की पुत्री और यम की बहन यमुना के तट पर बहुत सारे ऊँचे घने तमाल के वृक्ष छाये हुए हैं मानो झुक-झुक कर जल का स्पर्श करने की चेष्टा कर रहे हों, या उस जल के दर्पण में अपनी शोभा निहार रहे हों, या यमुना के जल को अत्यन्त पावन जानकर उसे प्रणाम कर रहे हों।
तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये।
किधौं मुकुर में लखत उझकि सब निज-निज सोभा
कै प्रणवत जल जानि परम पावन फल लोभा।।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के इन शब्दों में कुछ ऐसा आकर्षण था कि यमुना तट आँखों में तरंगित होने लगा। ऊँचे -ऊँचे तमाल वृक्षों के बीच से वो पगडण्डी भी दिखाई देने लगी जिस पर दिन भर के गोचारण से क्लांत गोपाल कृष्ण बस आने ही वाले हैं। बल्कि उनकी बाँसुरी की टेर तो सुनाई भी दे रही है। हरे-हरे बाँस की बाँसुरी, जिससे राधा ही नहीं सभी गोपियाँ डाह करती हैं -- 

मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं गुंज की माल गरे पहिरौंगी
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी।
भावतो तोहि कहा रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग भरौंगी
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।

सखी राधा से कहती है - तुम चाहती हो कि मैं कृष्ण का स्वाँग भरूँ तो मैं तुम्हारा कहना मानकर पूरा भेष धरूँगी - सिर पर मोरपंख, गले में गुंजा माला, कटि में पीताम्बर पहन लूँगी। हाथ में लाठी लिए गायों के साथ-साथ फिरूँगी। बस एक ही काम मुझसे नहीं होगा - ये मुरलीधर श्रीकृष्ण के होठों से लगी मुरली मैं अपने होठों पर नहीं रखूँगी। 
 
राधा-कृष्ण के दिव्य अलौकिक प्रेम का आधार है यह यमुना-तट। यह वंशी-वट, जहाँ शरद पूर्णिमा की रात महारास का आयोजन हुआ था। यह कदम्ब, जिस पर झूला पड़ा था और राधा प्यारी और कृष्ण मुरारी बारी-बारी झूले थे। और यह तमाल, जो उनकी लीला-कथा का प्रथम साक्षी बना था।

जयदेव ने गीत गोविन्द के पहले ही श्लोक में लिखा है कि बादलों के उमड़ने-घुमड़ने से आकाश और सघन तमालों से भूमि पहले ही श्यामल हो रही थी कि रात घिर आयी। अब नन्द जी को चिंता है कि ऐसे निविड़ निशीथ में कहीं बालक डरकर घर न भूल जाये इसलिए वे राधा से कहते हैं कि इसे घर पहुँचा दो।
मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमैर्
नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिदं राधे गृहं प्रापय।।

श्याम तमाल का दूसरा गुण है उसके फूलों की मादक गंध। जयदेव कहते हैं - ऐसा लगता है जैसे इसने कस्तूरी की गंध को जबरन अपने वश में कर लिया है।
मृगमद-सौरभ-रभस-वशंवद-नवदल-माल-तमाले



यही गुण उसे कृष्ण के और पास ले जाता है। दोनों एक जैसे काले और जबरन मन मोह लेने वाले।
तभी तो चैतन्य महाप्रभु को तमाल में घनश्याम की प्रतीति होती है और वे तमाल तले समाधिस्थ हो जाते हैं।

लेकिन विडम्बना देखिये हम तमाल को भूल गये हैं। तरणि तनूजा तट के तमाल तरु आपको दिखाने के लिये जब मैंने गूगल महाराज और विकिपीडिया महारानी का सहारा लिया तो उन्होंने मुझे निहायत उलझे और घुमावदार रास्तों पर भटका दिया। कुछ-एक अंग्रेज़ी और वनस्पति-विज्ञानी नाम बताये। तमाल को कभी जंगली बादाम तो कभी तेज-पत्ता बताया।

चित्र ढूँढ़ने चली तो आम, कटहल, जामुन और तेज-पत्ता के चित्र मिले, तमाल नहीं मिला। कम से कम ऐसा कोई चित्र नहीं मिला जिसे आपके सामने रखकर कह सकती - ये लीजिये, यह है तमाल।

जितना समय इस भूलभुलैया में भटकते हुए गँवाया, अगर उतनी देर पैदल चलती तो शर्तिया वृंदावन पहुँच जाती और खुद तमाल का चित्र खींच लाती। आगरा के उस बँगले तक भी पहुँच सकती थी जहाँ वर्षों पूर्व पं० विद्यानिवास मिश्र जी रहते थे और जहाँ किसी ने उन्हें तमाल से परिचित कराया था।

"तमाल के झरोखे से" शीर्षक लेख में वे कहते हैं - इसे पहचानते ही लगा कि जाने कब से इसे पहचानता हूँ। काली कालिंदी को इसी ने अपनी घनी काली छाया से और काला भँवर बना दिया। इसी ने गोरी राधा के उज्ज्वल-नील प्यार की छाँह और सघन, और आर्द्र कर दी। इसको मैं हर वसंत में झरते और झीने-झीने फूलों से भरते देखता हूँ। हर वर्षा में इसे सघन पत्र-जाल का छत्र बना देखता हूँ। इसकी छाँह में जो रसवर्षा होती है वह बाहर की रसवर्षा से कहीं अधिक ज़ोरदार होती है। यह तमाल दोनों रसवर्षाओं से भीग-भीगकर सिहरता रहता है।"


तमाल की तरह जिसने इस रस वर्षा में भीगना सीख लिया उसे ब्रह्म को पाने के लिये इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता। उसका आराध्य उसे यमुना तट पर सहज ही मिल जाता है। यहीं वृंदावन में, तमाल तले, माधवी कुंज में मानिनी राधा की मनुहार करते हुए --
ब्रह्म मैं ढूँढ्यो पुरानन मानन बेद रिचा सुनि चौगुने चायन
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितहुँ वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन
ढूँढत ढूँढत बौरि भई रसखानि बतायो न लोग लुगायन
देख्यो दुर्यो वह कुंज कुटीर में बैठि पलोटतु राधिका पायन।

----------


Tuesday, June 14, 2016

मेरी भी एक मुमताज़ थी...



साठ और सत्तर के दशक में जवान हो रहे लड़कों के दिल, परदे पर मुमताज़ को देखते ही दुगनी-तिगनी रफ़्तार से धड़कने लगते थे। हमारे एक दोस्त बताते हैं कि उन दिनों बॉयज हॉस्टल के सभी कमरों में अलगनी पर टँगे कपड़ों के नीचे मुमताज़ की फ़ोटो या पोस्टर ज़रूर चिपके रहते थे। 'मेरे सनम' में जब वो गाती थीं - "ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अँधेरा न घबराइये,जहाँ तक महक है मेरे गेसुओं की चले आइये" - तो लड़के वाक़ई अपने आस-पास उन घुँघराली ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू महसूस करने लगते थे।

 

लड़कों के बीच मुमताज़ की लोकप्रियता का एक कारण और भी था कि ये लड़के दारा सिंह की फ़िल्में देखते हुए बड़े हुए थे। साठ के दशक में दारा सिंह की फ़िल्में धड़ाधड़ बन रही थीं और उनमें से अधिकांश की हीरोइन मुमताज़ थीं। ज़ाहिर है मुमताज़ लड़कों की पहली पसंद बन गयीं। इस दौरान उन्होंने कई और बी ग्रेड फिल्मों में भी काम किया लेकिन फिल्म 'प्यार किये जा' में महमूद ने उन्हें अपने वाह-वाह प्रोडक्शन की हीरोइन क्या चुना, वे हर निर्माता-निर्देशक की पहली पसंद बन गयीं। याद है, रिकॉर्ड प्लेयर पर उनका वो डांस -

ओ मेरी मैना, तू मान ले मेरा कहना,
अरे मुश्किल हो गया रहना तेरे बिना, अई अई यो, अई अई यो।
ओ मेरे मिट्ठू, तेरी मिट्ठी मिट्ठी बोली,
मैं सुनकर तेरी होली ज़ालमा, अई अई यो, अई अई यो।

 

हिंदी फ़िल्मों में एक से बढ़कर एक प्रशिक्षित नृत्यांगनाओं ने काम किया है - सितारा देवी, वैजयंती माला, त्रावणकोर बहनों के नाम से मशहूर पद्मिनी और रागिनी, कुमकुम, वहीदा रहमान और हेमा मालिनी लेकिन जितनी तालियाँ मुमताज़ लूट ले गयीं, उतनी इनमें से किसी एक के हिस्से में नहीं आयीं। मुमताज़ जब "दूसरी लड़की" के किरदार अदा किया करती थीं, तब भी उनके नृत्य लाजवाब होते थे। उस दौर के उनके दो गीत मुझे बेहद पसंद हैं। एक तो है धर्मेंद्र-शर्मिला अभिनीत 'मेरे हमदम मेरे दोस्त' का वह क़व्वालीनुमा गाना -

अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में,
रूठें पल में न मानें महीनों में।
 
मानना पड़ेगा कि इसमें काफी कुछ कमाल गीत-संगीत का भी है मगर वल्लाह क्या ज़बरदस्त नाची हैं मुम्मू। दूसरा गाना हर लिहाज़ से इस गाने से बिलकुल अलग है। उसमें ठेठ हिंदुस्तानी रंग था, और इसमें कैबरे वाला अंदाज़ है। यह फिल्म थी बलदेव राज चोपड़ा की 'आदमी और इंसान' और इसमें मुमताज़ के साथ धर्मेंद्र के अलावा उनके पसंदीदा को-स्टार फ़ीरोज़ ख़ान भी थे। याद आया आपको?

ज़िन्दगी इत्तिफ़ाक़ है
कल भी इत्तिफ़ाक़ थी आज भी इत्तिफ़ाक़ है।

 

फिर आयी 'दो रास्ते' और बिंदिया चमकाती, चूड़ियाँ खनकाती मुमताज़ सबकी नींद उड़ा ले गयीं। आराधना देखने के बाद से हम राजेश खन्ना के पंखे तो बन ही चुके थे, अब मुम्मू के भी डाई हार्ड फ़ैन हो गये। बहुत से शादी-ब्याह, मुंडन-जनेऊ समारोहों में हमने भी लहक-लहक कर "बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी" और "कोई शहरी बाबू दिल लहरी बाबू" गाया और सहेलियों को नचाया। "जय जय शिव शंकर" और "दुनिया में लोगों को" हमारे क्लास एंथम थे। पार्टियों के लिये कुछ अलग टाइप के गाने तय थे, जैसे - ऐ दुश्मने जाँ, मोतियों की लड़ी हूँ मैं, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी। इस तरह ब्याह-बारात से लेकर प्राइवेट पार्टी तक मुमताज़ का ही राज था।

कुछ तो ख़ास रहा ही होगा उस लड़की में जिससे ख़ुद उसके अपने घर वालों को बहुत उम्मीदें नहीं थीं। जिसने दारा सिंह और महमूद के साथ शुरुआत की लेकिन बहुत जल्द बी ग्रेड फिल्मों का चक्रव्यूह तोड़कर दिलीप कुमार और देव आनंद के साथ फ़िल्में कीं। जितेन्द्र और राजेश खन्ना के साथ अनगिनत हिट फ़िल्में दीं। शम्मी कपूर और शशि कपूर के अलावा रणधीर कपूर के साथ भी काम किया। और उभरते सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के साथ काम करने के बाद फिल्मों को अलविदा कहा। वैसे मुझे फ़ीरोज़ ख़ान के साथ उनकी जोड़ी सबसे अच्छी लगती थी। इसलिए चलते-चलते ये गीत और सुनवाना चाहती हूँ।

हमारे सिवा तुम्हारे और कितने दीवाने हैं,
तुम्हारे और कितने ठिकाने हैं,
कसम से किसी को नहीं मैं जानती,
और किसी को नहीं पहचानती,
अरे छोडो-छोडो ये तो बहाने हैं।

 

Wednesday, June 08, 2016

अमलतास को कौन छिपाये


मार्च-अप्रैल अगर टेसू और आम के महीने कहे जा सकते हैं तो मई-जून अमलतास और गुलमोहर के महीने हैं। मई आते न आते हरी निखरी पत्तियों वाला अमलतास पीले फूलों के गुच्छों से ऐसा सज उठता है जैसे कोई दरबारी रक्कासा कोर्निश बजाने को तैयार खड़ी हो।दूसरी तरफ, नन्हीं-नन्हीं पत्तियाँ बरसाने वाला गुलमोहर, सुर्ख़ फूलों की पगड़ी बँधते ही किसी अकड़ू ज़मींदार जैसा ऐंठ जाता है।

मज़े की बात यह है कि गर्मी के मौसम में जब लाल-पीले रंग के कपडे आँखों में चुभते हैं, तब भी अमलतास और गुलमोहर के फूल मन को ठंडक और सुकून देते हैं।

ब्रिटिश हुकूमत ने जब दिल्ली को हिंदुस्तान की राजधानी बनाने का ऐलान किया तब लाल कोट से लेकर शाहजहानाबाद तक की तमाम दिल्लियों को छोड़, एक बिलकुल नयी दिल्ली की नींव रखी गयी। रायसीना पहाड़ी पर आलीशान वाइस रीगल लॉज, उसके दाहिने-बाँये नॉर्थ और साउथ ब्लॉक, और थोड़ा हटकर पार्लियामेंट। अफ़सरों के लिये शानदार बँगले, गोल डाक ख़ाना, गोल मार्किट, गोल्फ़ और पोलो क्लब। एक-दूसरे को समकोण पर काटती चौड़ी सड़कें और चौराहों पर मौसमी फूलों वाले पार्क। नयी दिल्ली की योजना इतनी तफ़सील से बनायी गयी कि किस सड़क के किनारे कौन से पेड़ लगाये जायेंगे, यह भी पहले से तय कर लिया गया था।

दरअसल दिल्ली के गोशे-गोशे में इतिहास बिखरा पड़ा है। हर तरफ़ कोई पुराना महल, सराय, ख़ानक़ाह या मक़बरा है। उनकी खूबसूरती को उभारने वाले पेड़ लगाने की योजना बनायी गयी थी। इमारत की लम्बाई-चौड़ाई के हिसाब से छोटे-बड़े पेड़ चुने गये। किसी सड़क पर इमली, किसी पर नीम, कहीं जामुन तो कहीं सप्तपर्णी के पेड़ लगाये गये। अमलतास और गुलमोहर उस योजना का हिस्सा नहीं थे इसलिए किसी भी सड़क पर उनकी नियमित क़तार नहीं मिलती। लेकिन शुक्र है बाद की सरकारें और उनके बाग़बानी विभाग के अफ़सर इतना सोच-समझ कर काम नहीं करते थे, इसलिये पीले और लाल फूलों से लदे ये पेड़ किसी भी मोड़ पर मिल जाते हैं और आपको याद दिला जाते हैं कि मई का महीना आ गया है।


वैसे लाल-पीले की इस जुगलबंदी की मैं तभी से क़ायल हो गयी थी, जब बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से एम ए कर रही थी। मुख्य द्वार से अंदर जाते ही सड़क के दोनों तरफ़ अमलतास और गुलमोहर की दोहरी क़तार थी। मई-जून की कड़ी धूप में सड़क का कोलतार पिघल कर चिकनी काली साड़ी जैसा लगता, जिस पर पीले और लाल रंग के गुल-बूटे कढ़े हों। कभी जब आसमान में बादल छाये होते तो तीनों रंग इतने चटकीले लगते जैसे किसी पुरानी तस्वीर पर नया पेंट कर दिया गया हो।


पीले अमलतास के बारे में बच्चन जी ने लिखा है -
डार पात सब पीत पुष्पमय जो कर लेता, अमलतास को कौन छिपाये
सेमल और पलाशों ने सिन्दूर पताके नहीं गगन में क्यों फहराये
बौरे आमों पर बौराये भँवर न आये कैसे समझूँ मधु ऋतु आई ?

लाल गुलमोहर के बारे में गुलज़ार साहब का गाना तो हम सबकी ज़बान पर चढ़ा ही रहता है -
गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता
मौसमे-गुल को हँसाना भी हमारा काम होता।


बचपन में हम गुलमोहर की कली से हाथी बनाते थे। खिलने को तैयार कली में चार पैर और एक सूँड पहले से मौजूद होती थी। सारा हुनर उन्हें हलके हाथों से अलग करने का था। आज बरसों बाद मैंने फिर हाथी बनाने की कोशिश की है। 

नतीजा देखिये:


लाल हाथी डाइनिंग टेबल पर सैर करता 


Monday, June 06, 2016

अम्बुआ की डारी बोले कारी कोयलिया

मेरी नानी 
संगीत का शौक हमारे घरवालों का पुश्तैनी मर्ज़ है। मेरे परनाना पंडित श्याम सुंदर जी बदलते मौसम के अनुरूप होली, चैती, कजरी गुनगुनाते रहते थे। उनकी बड़ी बेटी यानी मेरी नानी केसर कुँवर अपने बाल गोपाल से सारी बतकही गीतों में करती थीं - सुबह सवेरे- "जागिये ब्रजराज कुँवर पंछी बन बोले", श्रृंगार करते समय- "राधे प्यारी दे डारो ना बंसी मोरी" और भोग लगाते समय- "आली म्हाने लागे बृंदावन नीको"। संगीत का यही संस्कार उन्होंने अपनी दोनों बेटियों यानी हमारी माँ-मौसी को भी दिया।

मेरी मौसी और माँ 

तब तक घर में कुत्ते की फोटू वाला चूड़ी बाजा यानी HMV का ग्रामोफ़ोन आ चुका था और दोनों बहनें अपने जेब-ख़र्च से पैसे बचाकर ख़ूब रिकॉर्ड खरीदा करती थीं। शादी के बाद वे दोनों तो पराये घर चली गयीं लेकिन उनके चुन-चुनकर जमा किये रिकॉर्ड, मय ग्रामोफ़ोन के वहीँ रह गये। अब मेरा बचपन चूंकि ननिहाल में बीता इसलिए मैं अकेली ही इस विरासत की हक़दार बनी।

उन रिकार्ड्स में तिमिर बरन, के सी डे, के एल सहगल, जूथिका रे, सचिन देब बर्मन, हेमन्तो मुख़र्जी, खुर्शीद, नूरजहाँ, जैसे परिचित-अपरिचित बहुत से नाम थे। सच पूछिए तो उन दिनों मेरी दिलचस्पी गानों में कम और ग्रामोफ़ोन की सुई बदलने या उसकी चाभी भरने में ज़्यादा रहती थी। फिर भी गाने कान में पड़ते रहते थे और याद भी हो जाते थे। ऐसा ही एक गाना था --

अम्बुआ की डारी बोले कारी कोयलिया, आजा बलमुआ हमार।


चार-पाँच साल की बच्ची को शायद ये गाना इसलिए भी पसंद आया होगा क्योंकि इसकी रिदम बड़ी ज़बरदस्त है, पैर अपने आप ठुमकने लगते हैं। बाद में जाना कि ये गाना आशा भोंसले ने निखिल घोष के निर्देशन में गाया था। निखिल जी प्रख्यात बाँसुरी वादक पं० पन्नालाल घोष के छोटे भाई थे और तबला और सितार दोनों में महारत रखते थे।

कुछ बड़ी हुई और साहित्य-संगीत की अपनी समृद्ध विरासत को जानने-समझने के क़ाबिल होने लगी, तब मेरा परिचय एक और गीत से हुआ जिसमें अम्बुआ की डाली पर कोयल बोलने की बात थी। गोदान फिल्म के लिये मुकेश ने गाया था -

हिया जरत रहत दिन रैन, हो रामा, जरत रहत दिन रैन
अम्बुआ की डाली पे कोयल बोले, तनिक न आवत चैन।



यह फ़िल्म हम लोगों को स्कूली पढ़ाई के हिस्से के तौर पर दिखायी गयी थी। एक तो प्रेमचंद जी के उपन्यास पर आधारित थी, फिर उसे बनारस के एक परिचित सज्जन ने बनाया था, तीसरे संगीत दिया था विश्व विख्यात पंडित रवि शंकर ने।

लेकिन इससे यह नहीं समझ लेना चाहिये कि आम का पेड़ सिर्फ़ कोयल के ही काम आता है। हम लड़कियों के लिये भी बड़े काम का है यह। कौन सी लड़की होगी जिसने चटनी के लिये आये टिकोरों में से दो-चार टिकोरे नहीं चुराये होंगे ? आम तौर पर मैं काफ़ी आज्ञाकारी बालिका थी लेकिन जब टॉन्सिल बढ़ जाने की आशंका से आम-इमली पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा हुआ हो तो इत्ती थोड़ी-सी हाथ की सफ़ाई तो दिखानी ही पड़ती थी।

पके आम मुझे पसंद नहीं थे। बड़े मान-मनुहारों के बाद केवल लंगड़ा आम खाती थी और उसकी भी फाँकें नहीं, सिर्फ गुठली। लेकिन गाना पसंद था -

लाल-लाल होंठवा से बरसे ललैया हो के रस चुएला
जइसे अमवा के मोजरा से रस चुएला।
लागे वाली बतियां न बोल मोरे राजा हो करेजा छुएला
तोरी मीठी-मीठी बोलिया करेजा छुएला।



गाना बड़ा खूबसूरत है। ख़ास तौर पर तलत साहब की आवाज़ इसे और भी मीठा बना देती है। लेकिन न जाने क्यों मेरी नानी ने इस पर टोटल बैन लगा रखा था। गाने ही नहीं देती थीं। कभी भूले भटके शुरू कर दूँ तो फ़ौरन इशारे से बरज देतीं। अब नौकरी से अवकाश ग्रहण कर ग्रेटर नोएडा में रहती हूँ और आम काटते हुए जी खोलकर यह गाना गाती हूँ - कि जइसे अमवा के मोजरा से रस चुएला, हो जी रस चुएला।

एक और गीत है, जो मेरे ही नहीं, हिन्दुस्तान की लाखों बेटियों के दिल के बहुत करीब है।

अब के बरस भेज भैया को बाबुल सावन माँ लीजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ दीजो संदेसा भेजाय रे।
अम्बुआ तले फिर से झूले पड़ेंगे रिमझिम पड़ेंगी फुहारें
लौटेंगी फिर तेरे आँगन में बाबुल सावन की ठंडी बहारें
छलके नयन मोरा कसके रे जियरा बचपन की जब याद आये रे।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts