Wednesday, November 23, 2016

सिनेमा के रंग, बनारसी मस्ती के संग - (भारती सिनेमा)

आदरणीय काशीनाथ सिंह जी वाली अस्सी चौमुहानी से दुर्गाकुंड की ओर जाने वाली सड़क पर एक छोटा सा, नन्हा-मुन्ना सा, सिनेमा हॉल था - भारती। हमारे बचपन के दिनों (1962-1969) में भी वह बहुत पुराना हो चुका था और वहाँ सिर्फ़ रियायती दर पर पुरानी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। संयोग से वो हॉल मेरे घर के बहुत पास था। सड़क से जायें तो आधा किलोमीटर और अगर साधुबेला आश्रम वाली पतली गली पकड़कर लपक जायें तो बस चार मिनट।
भारती सिनेमा के इतने नज़दीक होने का प्रताप था कि हमने देव आनंद और राज कपूर की तमाम पुरानी फ़िल्में देख ली थीं। जाल, बाज़ी, जाली नोट, काला पानी, काला बाज़ार, आवारा, श्री 420, और ऐसी ही और कई। दिलीप कुमार की फ़िल्में देखने में हमारी दिलचस्पी कम थी मगर कभी-कभी माँ-मौसी का साथ देने के लिए देखनी पड़ती थीं। नानी हमारी, अशोक कुमार की बहुत ज़बरदस्त फ़ैन थीं इसलिये किस्मत और संग्राम भी देखीं। सबसे ज़्यादा ज़ुल्म तब हुआ, जब अशोक कुमार-सुचित्रा सेन की फ़िल्म ममता घूमती-घामती भारती में प्रदर्शित हुई और हमें एक सप्ताह में चार बार देखनी पड़ी।
यही एक हॉल था, जिसमें हमें "भले घर की लड़कियों की तरह" पूरे परिवार के साथ नहीं जाना पड़ता था, बल्कि किसी भी ममेरे फुफेरे भाई या बहन के साथ फिल्म देखने की आज़ादी थी। यह सत्य उजागर होने के बाद मेरे सभी भाइयों ने मुझे फिल्म दिखाने को अपना परम पुनीत कर्तव्य मान लिया था। भारती में बृहस्पतिवार को फ़िल्म बदलती थी इसलिये वे मंगलवार या बुधवार को तीन बजे से काफी पहले मेरे घर पहुँच जाते। आँखों-आँखों में बातें हो जातीं। उसके बाद मैं निहायत अफ़सोस से कहती -"हाय, मेरा ये फ़िल्म देखने का बड़ा मन था लेकिन कल से तो ये बदल जायेगी।"
भाई कहता - जाओ, आज देख आओ।
मैं कहती - किसके साथ जाऊँ ?
तो वह कर्तव्य की बलिवेदी पर न्योछावर होने वाले अंदाज़ में कहता - चलो, हम दिखा लाते हैं मगर अभी तुरंत चलना हो तो चलो, शाम को हमें कुछ ज़रूरी काम है।
और इससे पहले कि बड़े लोग हमारी मिलीभगत को भाँपे हम साधुबेला वाली गली से भाग जाते।
भारती में फिल्म देखने का एक बड़ा आकर्षण इंटरवेल में मिलने वाली खाने-पीने की चीज़ें भी थीं। इंटरवेल से दो-तीन मिनट पहले कोकाकोला और लेमन-सोडा बेचने वाले, बोतल खोलने वाली चाबी से बोतलों के गले पर प्रहार करते हुए अद्भुत ताल-तरंग पैदा करते थे। हालाँकि गला ख़राब होने के डर से हमें ठंडा पीने की अनुमति नहीं थी। (हम काफ़ी बेवक़ूफ़ बच्चे थे क्योंकि हमने कभी उस निषेधाज्ञा को तोड़ने की कोशिश नहीं की) दस पैसे की नमकीन की पुड़िया और चार आने की मूँगफली से अगले डेढ़ घंटे तक टूँगने के लिए पर्याप्त मसाला मिल जाता था। मूँगफली बेचने वाला एक ख़ास टेर लगाता था - ए, चीनिया बादाम बालु का भुना। मुझे अँधेरे में उसकी नक़ल करने में बहुत मज़ा आता था। कभी-कभी तो इतनी शानदार नक़ल करती कि लोग मेरी दिशा में मुँह करके चिनिया बादाम माँगने लगते।
भारती की बालकनी का फ़र्श लकड़ी का बना हुआ था। शायद पहले कोई कोल्ड स्टोरेज या गोदाम रहा होगा फिर किसी की व्यवसायी बुद्धि ने उसी ढाँचे को सिनेमा हॉल में परिवर्तित कर दिया था। बालकनी में बहुत कम लोग होते थे, इसलिए हमें ज़ोर-ज़ोर से हँसने और गानों के साथ सुर मिलाने की पूरी सुविधा होती थी। मुझे याद है कि एक मुसाफ़िर एक हसीना और फिर वही दिल लाया हूँ देखते हुए हम ओ पी नय्यर की धुनों में ऐसे बह गए थे कि कई बार नीचे बैठे लोगों की गालियाँ सुननी पड़ी थीं। नय्यर साहब की ढोलक बजते ही पैर ख़ुद-ब-ख़ुद ताल देने लगते थे। लकड़ी के फर्श पर हमारे जूते-चप्पल बजते, तो नीचे बैठे लोगों की खोपड़ी चटकने लगती और वे ख़ालिस बनारसी अंदाज़ में हमें अपनी उपस्थिति का बोध करा देते।
भारती सिनेमा की एक और ख़ासियत थी। वहाँ रविवार की सुबह अंग्रेज़ी पिक्चर दिखायी जाती थीं। उस दिन, उस शो में भारती का व्यक्तित्व और चरित्र बिलकुल बदल जाता था। उस दिन वह सरकारी अफ़सरों, डॉक्टरों-वकीलों और यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरों के मिलने-जुलने का साधन होती थी। उस दिन हम भी वहाँ पतली गली से न जाकर, कार में सवार होकर जाते थे। नानी बढ़िया सिल्क की साड़ी और नानाजी सूट पहनते थे।




अगर जेम्स बॉन्ड या हेरोल्ड रॉबिन्स के किसी उपन्यास पर बनी फ़िल्म हो तब तो कहना ही क्या। हमने वहाँ कम सेप्टेम्बर, गोल्डफिंगर, थंडरबॉल, कार्पेट बैगर्स, डॉ ज़िवागो, ज़ेपलिन, जैसी बहुत सारी अंग्रेज़ी फ़िल्में देखीं। गॉन विथ द विंड और स्पेस ओडिसी तो चारों शो में प्रदर्शित हुई थीं।
मेरा मौसेरा भाई दीपक, जो उन दिनों जयपुर में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था, छुट्टी में बनारस आया था। रविवार की सुबह भारती में पैटन फ़िल्म दिखाई जानी थी, जो दूसरे विश्व युद्ध के हीरो, अमेरिकी जनरल जॉर्ज एस पैटन पर आधारित थी।
बातों ही बातों में दीपक ने कहा - रविवार की सुबह अंग्रेज़ी पिक्चर देखने पहुँचने वाले सिर्फ़ शान बघारने के लिए जाते हैं, किसी को कुछ समझ में नहीं आता।
मुझे यह बात बिलकुल पसंद नहीं आयी। लगा कि वह मेरे शहर का और मेरा अपमान कर रहा है। ख़ूब बहस हुई। उसने कहा - मैं साबित कर दूँ, तब तो मानोगी?
मैंने कहा - ठीक है, मान लूँगी लेकिन पहले साबित तो करो।
हम फ़िल्म देखने गये। हमारे साथ दो ममेरे भाई भी थे। दीपक ने उनसे कुछ साठ-गाँठ कर रखी थी।
अचानक एक गम्भीर दृश्य के बीच दीपक ज़ोर से हँसा। कुछ और संवाद हुए, उसके बाद तीनों लड़के हँस-हँसकर लोट-पोट होने लगे। मेरे आँख तरेरने का भी कोई असर नहीं हुआ।
पूरी पिक्चर में ये लोग इसी तरह बेवजह हँसते रहे और धीरे-धीरे सारा हॉल दीपक के हर ठहाके में उसका साथ देने लगा। यहाँ तक कि अंत में पैटन की हत्या की योजना के बीच भी वह लोगों को हँसाकर ही माना।
आख़िरकार मुझे मानना ही पड़ा कि अंग्रेज़ी पिक्चर देखने वाला हर शख़्स अंग्रेज़ी का विद्वान नहीं होता।







Monday, November 21, 2016

सिनेमा के रंग, बनारसी मस्ती के संग


बनारस में फ़िल्म देखने का अपना ही मज़ा था। बालकनी या बॉक्स में बैठने के बावजूद आम जनों की टिप्पणियाँ कानों में पड़ती रहतीं और फ़िल्म का मज़ा दुगना कर देतीं।
जैसेकि एक बार मैं और मेरे तीन ममेरे भाई बनारस के ललिता सिनेमा में अनारकली देख रहे थे। अनारकली बीना राय को दीवार में चिनवाया जा रहा था। जैसे-जैसे अनारकली का चेहरा ईंटों से ढँकता जा रहा था, वैसे-वैसे उसकी करुण पुकार आँखों में नमी लाती जा रही थी -  "इसे मज़ार मत कहो, ये महल है प्यार का।"

शाहज़ादा सलीम बने प्रदीप कुमार घोड़ा दौड़ाते चले आ रहे थे।
तभी कोई सज्जन बोले - "जुल्फी नाहीं हिलत हौ, बे।"
सचमुच, इतनी तेज़ गति से दौड़ रहे घोड़े पर बैठे सलीम की क़रीने से सजी घुँघराली लटों का एक भी बाल बाँका नहीं हो रहा था।

इतने ग़मगीन माहौल में उनकी इस पैनी नज़र वाली टिप्पणी पर पूरा हॉल ठहाकों से गूँज उठा।
घोड़े से गिरकर, कोहनियों के बल ज़मीन पर घिसटते हुए प्रदीप कुमार जब किसी तरह नयी बनी दीवार तक पहुँचे, बहुत देर हो चुकी थी। "अलविदा, अलविदा" का क्रेसेंडो शांत हो चुका था। मशालें लिए राज-मिस्त्री वापस लौट रहे थे। प्रदीप उठकर दीवार तक पहुँचे और उस पर अपना सर दे मारा। नाकाम आशिक़ ने अपनी महबूबा हमेशा के लिए खो दी थी। सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी माज़ी के पन्नों में दफ़न हो गयी थी।
बनारस के लोग भला ऐसी नाइंसाफ़ी पर चुप कैसे रह सकते थे ? फ़ौरन राय दे डाली - "अबे, अबहीं मरल न होई। खनके निकाल ले, राजा।"
(अबे, अभी मरी नहीं होगी। खोदकर निकाल लो।)

चौक के चित्रा सिनेमा में बड़ी धूम-धाम और फ़ैनफ़ेयर के साथ बी.आर.चोपड़ा की वक़्त फ़िल्म रिलीज़ हुई। वो पहली मल्टी-स्टारर फिल्म थी। साधना और शर्मिला टैगोर के अलावा राज कुमार और सुनील दत्त के दीवानों की भी बनारस में कमी नहीं थी। "अपार भीड़ भरे" किसी सप्ताह में हम भी यह फ़िल्म देखने गए। फ़िल्म के एक दृश्य में सुनील दत्त फ़ोन पर साधना से बात कर रहे थे। बात क्या कर रहे थे, उन्हें अपने सपने के बारे में बता रहे थे - "मैंने एक ख्वाब सा देखा है"
साधना ने कहा - "ज़रा मैं भी सुनूँ "
-"सुनके शर्मा तो न जाओगी?"
- "नहीं, तुमसे नहीं।"
सुनील बताने लगे - "मैंने देखा है कि फूलों से लदी शाखों में तुम लचकती हुई यूँ मेरे क़रीब आयी हो।"
परंपरावादी बनारस के बाशिंदे दोनों की इस क़ुरबत के नज़ारे को हैरान-परेशान, साँस रोके देख रहे थे ।
सुनील का सपना पूरा हुआ तो बनारस वालों ने एक लंबी साँस छोड़ी।


तब तक साधना बोल उठीं - "मैंने भी एक ख़्वाब सा देखा है.........
हीरो का सपना तो किसी तरह बर्दाश्त कर लिया था लोगों ने लेकिन हीरोइन भी सपना देखे, यह हज़म करना मुश्किल था। हॉल में बैठे उनके कोई शुभचिंतक बोले - "ल, इहौ चललिन खाब देखे। ए महारानी तू रहे द। घरे जो।"
(लो, यह भी चलीं ख़्वाब देखने। ऐ महारानी! तुम तो रहने ही दो। जाओ घर जाओ।)

एक और दृश्य उभर रहा है, जिसकी नायिका मेरी नानी थीं। दीपक सिनेमा में शशि कपूर -शर्मिला टैगोर अभिनीत आमने-सामने फ़िल्म प्रदर्शित हुई। हम लोगों ने किसी फिल्मी पत्रिका में पढ़ लिया था कि उसमें शर्मिला ने टू-पीस बिकिनी पहनी है। लेकिन घर में इस बात का ज़िक्र नहीं कर सकते थे, वरना कभी देखने को नहीं मिलती। बल्कि घर में तो यह बताया कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की भतीजी फ़िल्मों में काम कर रही है। सत्यजीत रे की फ़िल्म में भी काम कर चुकी है। इन दो बड़े नामों के बीच बिकिनी की खबर छिपाकर हम फिल्म देखने पहुँच गये। मैं, मेरी सहपाठी मित्र वीणा और मेरी नानी। बालकनी में हमारे अलावा शायद ही कोई महिला मूर्ति रही हो। पूरी बालकनी यूनिवर्सिटी के लड़कों से भरी थी।
आख़िरकार वह सीन भी आ ही गया जब शर्मिला बिकिनी में नज़र आती हैं।

मैं और वीणा कनखी से नानी को देख रहे थे कि अब फटा बम ! लेकिन शांति बनी रही। नानी ने परदे की ओर देखा और धिक्कार के से लहजे में कहा - "शिव -शिव।"
बालकनी में एक समवेत निःश्वास गूँजा और फिर कोने-कोने से लोग अपने-अपने इष्टदेव को याद करने लगे।
"राम-राम"
"हरे-हरे"
"नारायण-नारायण"
नानी ने गर्दन घुमाकर उन तमाम पुण्यात्मा जीवों को देखा और पास बैठे बालक से बोलीं - "बताओ, इतने बड़े ख़ानदान की लड़की --और क्या बाप-दादों का नाम रोशन कर रही है! अरे जब ऐसे-ऐसे कपडे पहनेंगी तो तुम लोग देखोगे नहीं क्या?"
लड़कों को आनंद आ गया। सबके सब - "जी माताजी, हाँ माताजी" में लग गये।
और मैं और वीणा गर्दन झुकाये हँसते रहे।
  

Thursday, July 21, 2016

पापा की पुत्रिका



पापा ने ही बंकिम बाबू के वन्दे मातरम् से लेकर मुझे शुभ्रा नाम दिया था। पुकारने का नाम मनु वैसे तो नानी ने रखा था, मगर उसका शुद्धतम रूप में उपयोग केवल पापा करते थे। बाकी लोग उसे अपनी-अपनी मुख-सुविधा के अनुसार बदल लेते थे। जैसेकि नानी मुझे हमेशा मानू बुलाती रहीं। नानाजी ने मनुआ बुलाना शुरु किया तो बहुत सारे लोग उन्हीं का अनुकरण करने लगे। अम्मा ने ज़रा हटकर मनिया कर दिया। कवयित्री हैं, सो बिटिया के लिये लोरी लिखी -

सोये सोये रे मेरी मनिया, मेरी मनिया को आये निंदिया।

कुछ बड़ी हुई तो देखा कि मेरी पर-ननिहाल में, यानीकि मेरी अम्मा की ननिहाल में मुझसे छोटे बच्चों की पूरी क्रिकेट टीम खड़ी हो चुकी थी। रिश्ते मे तो वो सब मेरे मामा और मासी थे लेकिन डील-डौल से मैं उन सब पर भारी पड़ती थी, इसलिये उन सब ने मुझे मन्नू जिज्जी बुलाने में ही अपनी ख़ैरियत समझी। गेंदतड़ी, आइस बाइस, या ऊँच नीच खेलते हुए ये नाम ज़रा लंबा पड़ता था, इसलिये इसका शार्ट वर्ज़न मनुज्जी ज़्यादा प्रचलित हो गया। अब उन सबके पति अथवा पत्नियों और बच्चों को मिलाकर लगभग साठ लोग इसी प्रचलित नाम का इस्तेमाल करते हैं।

मज़े की बात तब हुई जब मेरी होने वाली बहू ने बताया कि उसकी माँ इन्द्राणी का भी पुकारने का नाम यही है - मानू, जबकि उनकी छोटी बहनों में से एक शानू हैं और दूसरी अनु। तो अब रिश्ता कुछ इस तरह बनता है कि हमारे शानू श्रेयस की मासी सास शानू हैं, और माँ और सास दोनों मानु।

लेकिन बात शुरु हुई थी पापा से......पापा अगर आगे-पीछे बेटा लगाये बग़ैर सिर्फ़ मनु कह कर पुकारते तो मैं डर जाती थी क्योंकि इस तरह बुलाने का साफ़ मतलब था कि मेरी कोई ग़लती पकड़ी गयी है। मैं पापा के पास सिर्फ़ छुट्टियों में जाती थी और बराबर इसी कोशिश में रहती थी कि उन्हें नाराज़ न करूँ। वे मुझसे नाराज़ होते भी नहीं थे। बस, उनकी नज़र में एक ही अक्षम्य अपराध था - चीज़ों को उनकी निर्धारित जगह पर न रखना। उनकी कलम, कंघी, चाबी, हर चीज़ की जगह तय होती थी। काम में लेने के बाद चीज़ को ठीक उसी जगह, उसी तरह रख दो तो कोई झंझट नहीं थी, वरना वे बहुत नाराज़ होते थे और फिर बहुत देर तक यथास्थान वाला भाषण सुनाते थे।

पापा जब कभी बहुत दुलार में आते तो मुझे अपना भोंदू बच्चा कहते। ज़्यादा ही मूड में होते तो गा-गाकर भोंदू का रूप चलाते - भोंदु - भोंदू - भोंदव:।

और मैं उनके दुलार से निहाल होते हुए भी ऊपर-ऊपर से झगड़ा करती - "आपने फिर हमें भोंदू कहा। जाइये, हम आपसे बात नहीं करते।"

और वे हँसकर कहते - 'तुम्हें कहाँ कहा? हम तो भोंदू का रूप याद कर रहे हैं।"

और अगले इतवार को फिर यही संवाद दोहराया जाता।

कभी-कभी पापा मुझे "पुत्रिके" कह कर भी बुलाते। यह संबोधन हमेशा किसी गंभीर बातचीत का संकेत होता, जिसमें मेरी राय की ज़रूरत होती। मसलन इस बार गर्मी की छुट्टियों में कहाँ जाना है या अगली गाड़ी कौन सी लेनी है, ऐसे किसी अहम मुद्दे पर जनमत संग्रह कराना होता तो पुत्रिके कह कर आवाज़ लगाते।

अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले जयपुर गये थे और वहाँ से कुछ पुस्तकें लेकर आये थे। उनमें से दो मुझे सौंपते हुए बोले - ये लो। शानू आजकल मधुशाला गाता है, तो यह उसे दे देना। और यह मनुस्मृति मैं तुम्हारे लिये ले आया हूँ। पुरानी वाली फट रही थी।

जयपुर से लौटने के तीसरे दिन उन्हें ज़बरदस्त ब्रेन हैमरेज हुआ और अगले ही दिन चले भी गये। क्या करना है क्या नहीं, मैं कुछ जानती नहीं थी और कोई बताने वाला भी नहीं था। मुझे लगा कहीं वे इसीलिये तो मुझे मनुस्मृति नहीं पकड़ा गये थे कि मैं इस भटकन में राह तलाश सकूँ। मैं गीता का दूसरा अध्याय पढ़ने के बाद मनुस्मृति लेकर बैठ गयी। श्राद्ध वाला अध्याय पढ़ना शुरु किया तो देखा, किसी व्यक्ति की एक ही संतान- कन्या हो तो उसे पुत्रिका कहते हैं और उसके पुत्र यानी पुत्रिका-पुत्र को नाना के दाहकर्म से लेकर पूरे अंतिम संस्कार करने का अधिकार होता है।

मन में सवाल उठा क्या पापा यह सब जानते थे? क्या इसीलिये वे मुझे पुत्रिका बुलाते थे?

Saturday, July 16, 2016

झूला पड़ा कदंब की डारी



मीना कुमारी की एक फ़िल्म आई थी - बहू बेगम, जिसमें वो और उनकी सहेलियाँ झमाझम बरसते पानी में झूला झूल रही थीं।

पड़ गए झूले सावन रुत आई रे।

/>

संयोग की बात है कि मैंने यह फ़िल्म ऐसी उम्र में देखी थी, जब सहेलियों के साथ सैर-सपाटा, मौज-मस्ती कर पाना जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा और सबसे बड़ी उपलब्धि लगती थी। मत भूलिये यह साठ का दशक था, जब छोटे शहरों की लड़कियों पर दुनिया भर की पाबंदियाँ होती थीं। मेरा परिवार तो काफ़ी आधुनिक चिंतन वाला परिवार था, फिर भी घर के ठीक सामने रहने वाली वीणा के घर नोट्स लेने जाना हो तो नौकर साथ जाता था और साथ लेकर ही लौटता था। ऐसे में सहेलियों के साथ झूला झूलने का अवसर सिर्फ स्कूल के अंदर ही मिल पाता था और वहाँ दाइयाँ हर वक़्त डराती रहती थीं -

ऐ! ऐ! चला लोगन, भीजा जिन। नाहिं, अबहीं जाइके बाई जी (प्रिंसिपल लीला शर्मा जी) के बताईल।

लीला दी ने शायद ही कभी किसी को डाँटा हो, फिर भी उनका ख़ौफ़ ऐसा था कि हम फ़ौरन झूला छोड़कर ग़ायब हो जाते थे।

ऐसे में बार-बार ध्यान आता था कि गोकुल-बृंदावन में कैसा आनंद रहा होगा जहाँ गोपी-ग्वाल, राधा-कृष्ण मिलकर झूलते थे और कोई उन्हें प्रिंसिपल के नाम से डराता भी नहीं था।


कदम्ब पर झूल रहीं राधे जू, साँवरिया दे रह्यो झोंटा।







कदम्ब के पेड़ का राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंग में बड़ा महत्त्व है। मैथिल कवि विद्यापति का पद है -

तट तरंगिनि, कदम कानन, निकट जमुना घाट। उलटि हिरइत उलटि परली, चरन चीरल काँट।। 
राधा याद कर रही हैं कि उस दिन यमुना के घाट पर, कदम्ब के वन में उलट कर कृष्ण को क्या देखा कि जैसे मैं स्वयं ही उलट गयी। चरण में काँटा चुभ गया और मन घायल हो गया।

​लेकिन कामदेव ने अकेले राधा को ही निशाना बनाया हो, ऐसा नहीं है। सखियाँ कहती हैं - तुम्हीं नहीं हो, कान्ह भी तुम्हारे लिए पागल हैं। तुम्हारे गुणों पर लुब्ध हो गए हैं। कहीं और जा रहे हैं, पर आँखें इधर ही लगी हैं। ऐसे लुभाए नयनों को हटा भी कैसे सकते हैं। वे अगर नटवर नागर हैं तो तुम भी उनसे कम नहीं, बराबर ही हो। तुम दोनों जैसे एक ही डाल पर खिले हुए दो फूल हो। कवि विद्यापति कहते हैं कि कामदेव ने एक ही तीर से दो जीवों को मार दिया है।
ये सखि ये सखि न बोलहु आन, तुअ गुन लुबुधलनि अब कान।
अनतहु जाइत इतिहि निहार,लुबुधल नयन हटाये के पार।
से अति नागर तों तसु तूल, याक बल गाँथ दुई जनि फूल।
भन विद्यापति कवि कंठहार, यक सर मन्मथ दुई जीव मार।
कवियों की बात मानें तो पाण्डवों के इंद्रप्रस्थ से कृष्ण के वृंदावन तक पूरा का पूरा यमुना तट ताल, पियाल, तमाल और कदम्ब के घने वनों से भरा हुआ था। राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन इन पेड़ों के वर्णन के बिना अधूरा है। जयदेव और विद्यापति से लेकर सूरदास और मीरा तक सभी इनका नाम लेते नहीं थकते। इन वनों के आस-पास रहने वाले इन्हें ख़ूब अच्छी तरह जानते-पहचानते रहे होंगे।तब स्कूली बच्चों को इनके फोटो और डिस्क्रिप्शन ढूंढ़कर लाने का हॉलिडे होमवर्क नहीं मिलता होगा और न पर्यावरण-प्रेमियों को इको सिस्टम बिगड़ने की चिंता करनी पड़ती होगी। आज ज़रा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों से पूछकर देखिये,उनमें से कितने कदम्ब का पेड़ पहचान सकते हैं।

लगभग पच्चीस वर्ष पहले की बात है। दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र से सुबह संस्कृत का साप्ताहिक कार्यक्रम प्रसारित होता था। मेरा भी उसमें थोड़ा-सा योगदान रहता था। हमने मेघदूत पर आधारित कुछ कड़ियाँ प्रसारित करने की सोची। श्लोकों के सस्वर पाठ की रिकॉर्डिंग हो गयी। उन पर विज़ुअल डालने के लिए बादल-बरसात, खेत-खलिहान, फूल-पत्ते, सारस-बगुले के स्टॉक-शॉट्स मिल गये, लेकिन कदम्ब नहीं मिला। और मुझे ज़िद्द चढ़ गयी कि बिना कदम्ब के मेघदूत प्रसारित नहीं होगा। प्रोड्यूसर दुर्गावती सिंह समझाती रहीं कि सरकारी तंत्र में ऐसे ही काम करना पड़ता है। 

नहीं मिलता कदम्ब तो जाने दो, किसी और पेड़ को डिफ्यूज़ करके काम चला लेंगे। मैंने उनसे एक दिन की छुट्टी माँगी और अपनी मारुति लेकर कदम्ब की तलाश में निकल पड़ी। न जाने कितनी नर्सरी, पार्क और लाइब्रेरी छान मारीं लेकिन कहीं कदम्ब नहीं मिला। कुछ खाने के लिए बंगाली मार्किट पहुँची तो वहाँ मुझे अपना बचपन का साथी कबीर मिल गया। लेडी श्री राम कॉलेज में मेरी माँ हिंदी और उसकी माँ उर्दू पढ़ाती थीं। कॉलेज कम्पाउंड में हमारे घर भी पास-पास थे। 

अम्मा के रिटायर होने पर हम कालकाजी चले गए थे मगर वे लोग अब भी वहीँ रहते थे। गप-शप के बीच जब मैंने उसे बताया कि मैं सुबह से कदम्ब का पेड़ तलाश कर रही हूँ तो उसने पूछा कैसा दीखता है। मैंने उसे मेघदूत का श्लोक सुनाया, जो मुझे बहुत प्यारा लगता है -
त्वत्सम्पर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः
कदम्ब के फूल ऐसे लग रहे थे जैसे बादल के आने से पुलक उठे हों, रोमांचित हो गए हों।
कबीर ने मुझे टोककर पूछा - लड्डू जैसा फूल होता है क्या?
मैंने कहा - हाँ।
बोला - बड़े-बड़े, लाइट ग्रीन कलर के पत्ते होते हैं ?
मैंने कहा - हाँ भाई हाँ।
कहने लगा - तो एल. एस. आर. में है न। कॉलेज ऑडिटोरियम के पीछे, जहाँ हम लोग खेला करते थे, ऐसे दो पेड़ हैं।

लो! इसे कहते हैं "गोद में लड़का नगर ढिंढोरा"! मैं सुबह से दुनिया-जहान की ख़ाक छानती फिर रही थी और कदम्ब घर के पिछवाड़े ही मौजूद था।

अगले दिन कैमरा टीम को लेकर गयी और वीडियो रिकॉर्डिंग कर लायी। इस मेहनत के बदले मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिला लेकिन मन कदम्ब के फूलों सा ही पुलकित हो उठा।

Wednesday, July 13, 2016

अविस्मरणीय रेलयात्रा

भगवान बुद्ध ने अच्छा किया था कि अपरिग्रह को सत्य, अहिंसा, अस्तेय और ब्रह्मचर्य के बराबर महत्त्व दिया था। अपने को कोई नुकसान न हो रहा हो तो हम हिंदुस्तानी अमूमन सच बोल लेते हैं, अहिंसा का पालन कर लेते हैं, चोरी से भी बच लेते हैं और देर-सबेर ब्रह्मचारी भी बन जाते हैं। एक ही काम है जिसमें हम कच्चे हैं, और वो है अपरिग्रह। किसी भी घर में जाकर देखिये - पुरानी डायरियों से लेकर गाड़ी के पुराने टायर तक तमाम चीज़ें कहीं कोने-अँतरे में पड़ी मिल जायेंगी। यह हमारा राष्ट्रीय अवगुण है कि हम कभी कोई चीज़ फेंकते नहीं, इस उम्मीद में सहेजकर रख लेते हैं कि कभी न कभी काम आ सकती है।

किसी और को क्या दोष दूँ, मैं ख़ुद भी इस मर्ज़ की शिकार हूँ। टूटी मालायें, बटन, साड़ियों के फ़ॉल, पिछले साल की राखियाँ, शादियों के कार्ड से उखाड़े गणेश, और यहाँ तक कि पिछली दीवाली के जले हुए दिये तक मेरे संग्रह में मिल जायेंगे। हाँ, यह ज़रूर है कि मैं जल्द ही उनके इस्तेमाल के तरीक़े ढूँढ लेती हूँ।



पहचान रहे हैं? दीवाली पर इन मटकियों में दीप जले थे पर अब ये पौधों के गमले बन गये हैं। कुछ इसी तरह का इस्तेमाल मैंने सुराही के स्टैंड का भी किया है। ये मेरे बचपन की यादगार है, जिसे मैं अपने हर नये घर में साथ रखती आयी हूँ। ऐसा लगता है कि अब ग्रेटर नॉएडा का यही घर इसका अंतिम पड़ाव होगा इसलिये इसे भी हीले से लगा दिया है।




मेरे नानाजी उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर थे। अपने पूरे सेवाकाल में कार या जीप से दौरे करते रहे लिहाज़ा ज़रूरत से ज़्यादा सामान साथ लेकर चलने की आदत थी। ये जूता भी रख लो, ये छड़ी भी रख लो, पूजा वाला पीताम्बर भी रख लो। जब तक ये छिटपुट चीज़ें गाड़ी में भर ली जाती थीं, तब तक तो सब कुछ ठीक रहा। लेकिन जब रेलयात्रा में भी उनका यही हाल रहा, तब बहुत मुश्किलें पेश आयीं। नानाजी, नानी और मैं, तीन लोगों के टिकट के साथ कम से कम चौदह नग सामान चलता था। एक आदमी की ड्यूटी हर स्टेज पर इन नगों की गिनती करने की रहती।



पूरे नवाबी ठाठ-बाट से सामान बाँधा जाता। स्टील के ट्रंक और लपेटकर बाँधे जाने वाले बिस्तरबंद निकाले जाते। खाना ले जाने के लिये स्टील का चार डिब्बों वाला टिफ़िन कैरियर और पानी के लिये सुराही स्टैंड स्टोर रूम से ढूँढ़कर निकाले जाते। नानी के ठाकुर जी के लिये एक लकड़ी की सन्दूकची थी, जिसमे हवा के लिये बड़े आर्टिस्टिक छेद कटे हुए थे। उस सन्दूकची में कई गद्दे बिछाकर ठाकुरजी लिटाये जाते थे। सन्दूकची को लाल रेशमी कपडे से बाँधकर ले जाया जाता था ताकि हवा का प्रवेश हो, छूत का नहीं। नानी यात्रा में खाना नहीं खाती थीं इसलिए प्रचुर मात्रा में बेसन के लड्डू और मठरी बनाये जाते, जो पीतल के बड़े से कटोरदान में रखकर ले जाये जाते थे। पानदान, बेटियों के यहाँ दी जाने वाली बनारसी मिठाई और उड़द की बड़ियाँ तक तो मैं बाँध ले जाती थी लेकिन जब बात उनकी छड़ी और छतरियों की आती, तब मुझे विरोध करना ही पड़ता था।

आपको क्या लगता है, अम्मा के पास छाता नहीं होगा? - मैं झींकती।

अरे बेटा, एक छाता रखने से कौन ट्रेन का बोझ बढ़ जायेगा। - वे तर्क देते

बहस आगे बढ़कर विकराल रूप न ले ले, इस डर से नानी मध्यम मार्ग सुझातीं - अलग नग नहीं बनेगा, होल्डाल के बीच में डाल देना।

आख़िरकार नियत दिन-तारीख को चौदहों नग के साथ यात्रा शुरू होती और अगले दिन सुबह दिल्ली पहुँचकर ख़त्म भी हो जाती। लेकिन मेरी मुसीबत ख़त्म नहीं होती क्योंकि दिल्ली पहुँचते ही उन्हें अपना स्वेटर, पैर ढँकने का शॉल, और जप की माला याद आनी शुरू हो जातीं।

वैसे मेरे जीवन की सबसे अविस्मरणीय यात्रा थी लखनऊ से मुंबई तक। पापा का तबादला लखनऊ से पणजी हुआ। गोवा कुछ समय पहले ही पुर्तगालियों के शासन से मुक्त हुआ था, सो सबसे पहले उसे देखने के घमंड में चूर थी मैं। ऊपर से सोने पर सुहागा यह कि अपनी सब सहेलियों से पहले बम्बई जा रही थी।




ज़्यादातर सामान लगेज वैन में बुक किया जा चुका था। हमारे साथ सिर्फ ज़रूरी कपड़े भर थे। गर्मी के दिन थे इसलिए फर्स्ट क्लास कूपे में एक बड़ी-सी अल्युमिनियम की ट्रे रखी गयी थी, जैसी कूलर में पानी भरने के लिए होती है। इसमें बर्फ की बड़ी सी सिल रखी गयी थी ताकि ठंडक रहे। ट्रे में लखनऊ की तमाम सौगातें - दसहरी आम, ख़रबूज़े, ककड़ियाँ भी जमा दी गयी थीं। मैं महा थ्रिल्ड! खाना-वाना खाने के बाद ऊपर की बर्थ पर लेटकर अपनी बाल पत्रिकायें पढ़ते-पढ़ते कब सो गयी, पता ही नहीं चला। तभी अम्मा के बहुत घबराये हुए स्वर से नींद खुली। कह रही थीं - बेटा उठ! मनु उठ! पापा छूट गये हैं और मुझसे ये चेन नहीं खिंच रही।

देखा तो अम्मा पूरा ज़ोर लगा रही थीं लेकिन गाड़ी रोकने वाली ज़ंजीर टस से मस नहीं हो रही थी। मेरे सर के पास ही थी वो ज़ंजीर। बस, मैंने ऊपर की बर्थ से कलैया खायी और ज़ंजीर पकड़ कर लटक गयी। तब तक गाड़ी की स्पीड कम होने लगी थी। कुछ ही देर में सुराही लिये पापा आ गये। उन्होंने बताया कि गाड़ी चल दी तो वे किसी और डिब्बे में चढ़ गये थे और जब गाड़ी रुकी तो वापस आ गये। शायद किसी ने चेन खींच दी है।

अम्मा ने रुंआसे स्वर में कहा - किसी ने नहीं, हमने ही खींची है। बल्कि मुझसे अकेले नहीं खिंची तो मनु ने भी मदद की। पापा हँसते हुए आये थे पर यह सुनकर एकदम गम्भीर हो गये। वहाँ साफ़ लिखा हुआ था - बिना कारण ज़ंजीर खींचना दंडनीय अपराध है।

तभी रेल विभाग के कई कर्मचारी चेन खींचने वाले की ख़बर लेने आ पहुँचे। अम्मा ने उनसे कहा कि मेरे पति छूट गए थे इसलिए मैंने चेन खींची। आख़िर ऐसी ही एमर्जेंसी के लिए तो चेन लगाई गयी है।

लेकिन रेलवे वाले इसे एमर्जेंसी मानने को तैयार ही नहीं थे। काफ़ी देर की बहसा-बहसी और कई आम-खरबूजों का भोग लगाने के बाद वे चेन खींचने को दंडनीय अपराध ना मानने पर राज़ी हो गये। वरना शायद मुझे और अम्मा को बम्बई की सैर के बजाय इटारसी की जेल की सैर करनी पड़ती।

Thursday, July 07, 2016

जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे


आषाढ़ महीने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलते हैं, भाई-बहन के साथ रथ पर सवार होते हैं और वर्षा ऋतु का आनंद लेने निकल पड़ते हैं। उनकी इस पिकनिक में उनकी पत्नी साथ नहीं होतीं लेकिन लाखों की संख्या में उनके अनुयायी साथ होते हैं। अनुयायी का शाब्दिक अर्थ ही है - साथ चलने वाला - उर्दू में जिसे कहते हैं हमसफ़र।

कैसी अजीब बात है? घूमने निकले हैं लेकिन जीवन-साथी को साथ लेकर नहीं चल रहे। साथ में लिया है बड़े भाई को, लाड़ली बहन को और हज़ारों-हज़ार अनुयायियों को।



बचपन से ही ऐसे थे। घर में दूध-दही के मटके भरे रहते थे लेकिन उन्हें तो दूसरों के घर से चुराकर खाना भाता था। वो भी अकेले नहीं, सब सखाओं के साथ। माखन चुराने, खाने और लुटाने की ऐसी बान पड़ी कि गोपियों ने माखनचोर नाम ही रख दिया। पकडे जाते तो भोली सूरत बनाकर कह देते-


मैं बालक बँहियन को छोटो छींको केहि बिधि पायो
ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुख लपटायो।
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। ​

अब इस तरह की शरारतें और बहानेबाज़ी कोई भला आदमी अपने बाल-बच्चों के सामने नहीं कर सकता न, इसलिए उन्हें साथ लेकर नहीं आये हैं। भाई-बहन सब कुछ जानते हैं, इसलिए उन्हें साथ ले लिया है। और साथी न हों तो शरारतों का मज़ा ही क्या? इसलिए खुला निमंत्रण है, जिसे संग आना हो आओ। साथ चलो। रथ चलाओ। रथ पर आकर मुझसे गले मिलो। बरसात में भीगो। पकवान खाओ। बीमार पड़ो तो खिचड़ी खाओ। पूरी मस्ती करो। क्योंकि एक बार मंदिर के अंदर पहुँच गया तो फिर भगवान होने की, जगन्नाथ होने की मर्यादा निभानी पड़ेगी। अदब-क़ायदे से रहना पड़ेगा। जो भोग लगाया जायेगा, वही खाना पड़ेगा। जिस समय जो करने को कहा जायेगा, वही करना पड़ेगा। तब ऐसा निर्बाध आनंद कहाँ मिलेगा।



मंदिर में दर्शन मिलते हैं। साहचर्य नहीं मिलता। तभी तो बंधन तोड़कर भागे हैं। गुंडिचा मंदिर जायेंगे। मौसी के घर जायेंगे। राजसी भोग नहीं, आम लोगों की तरह 'पोड़ा पीठा' खायेंगे। रूठी हुई पत्नी मंदिर में नहीं घुसने देगी तो अपराधियों की तरह रात भर बाहर खड़े रहेंगे। तरह-तरह से उसे मनाने की कोशिश करते रहेंगे। और जब वो रसगुल्ले की माँग करेगी तो उनके सारे साथी दौड़ पड़ेंगे। जहाँ कहीं रसगुल्ला मिलेगा, सीधा जगन्नाथ जी के हाथ में पहुंचा दिया जायेगा कि लो भैया, अपनी रूठी पत्नी को मना लो। दोस्त ऐसे ही तो एक दूसरे के काम आते हैं। ​

तो मेरी आपको यही सलाह है कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने हों तो वर्ष का कोई भी दिन-महीना चुन लीजिये पर अगर सखा कृष्ण से भेंट करना चाहते हैं तो रथयात्रा के समय उनके साथ लग जाइये। मिल ही जायेंगे कहीं न कहीं।


Monday, June 20, 2016

असाढ़ का पहला दिन



कई बरसों बाद ऐसा सुयोग आया है कि जेठ महीने की पूर्णिमा का चाँद देखने छत पर निकली तो लू के थपेड़ों ने नहीं, शीतल मंद बयार ने शरीर का ताप मिटाया। वैसे कल रात चाँद पूरे से थोड़ा सा कम, यानी चौदहवीं का चाँद लग रहा था लेकिन पोथी-पत्रे के चक्करों से बचने के लिए मैंने कल पूर्णिमा और आज जेठ बदी प्रतिपदा मान ली है।

तो कल की ठंडी हवाओं से उम्मीद बँध गयी थी कि शायद कालिदास के शब्दों को सही साबित करते हुए असाढ़ का पहला दिन घन-घटाओं से लैस होगा।
आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।
कुबेर के शाप के कारण एक साल के लिए अपने घर से और अपनी प्रिया से दूर विरही यक्ष ने आषाढ़ के पहले दिन बादलों से लिपटी पहाड़ की चोटी को देखा, तो उसे ऐसा लगा जैसे कोई हाथी खेल-खेल में अपने सर की टक्कर से उसे गिराने की कोशिश कर रहा हो।



मैं भी कोई ऐसा ही नज़ारा देख पाने की आस में सुबह से अपने आठवीं मंज़िल के घर के खिड़की-दरवाज़े खोले बैठी थी। लेकिन दस बजते-न-बजते सूरज की वक्र दृष्टि का प्रहार झेलना कठिन हो गया, तब निराश होकर खिड़कियाँ बंद कर दीं और परदे खींच कर नीम अँधेरा कर लिया।

तीन बजे से फिर ठंडी हवा के झोंके आने शुरू हुए। आसमान भी साँवला-सलोना लग रहा था। बड़ी देर तक, बिमल दा की सुजाता का गीत गुनगुनाती बालकनी में खड़ी रही।

काली घटा छाये, मोरा जिया तरसाये, ऐसे में कहीं कोई मिल जाये
बोलो किसी का क्या जाये रे, क्या जाये रे, क्या जाये?



अब ज़ाहिर है कि साठ साल की उम्र में किसी ऐसे का इंतज़ार तो था नहीं जो "मेरे हाथों को थामे, हँसे और हँसाये, मेरा दुःख भुलाये"। इंतज़ार सिर्फ़ बरखा रानी का था कि वो आये, मुझे भिगाये और घमौरियों का दुःख भुलाये। लेकिन वो भी अजब ठसक में है। दो-चार बूँदें टपका कर अपने आस-पास होने का एहसास करा रही है लेकिन खुलकर सामने नहीं आ रही।

मुझे याद आ गयी मोहन राकेश की मल्लिका। वह भी आषाढ़ के एक दिन पर्वत प्रदेश की वर्षा में भीग कर आयी थी।

" चारों ओर धुँआरे मेघ घिर आये थे। मैं जानती थी वर्षा होगी फिर भी मैं घाटी की पगडण्डी पर नीचे उतरती गयी। एक बार मेरा अंशुक भी हवा ने उड़ा दिया। फिर बूँदें पड़ने लगीं।
बहुत अद्भुत अनुभव था माँ, बहुत अद्भुत। नील कमल की तरह कोमल और आर्द्र ! वायु की तरह हल्का और स्वप्न की तरह चित्रमय !"

बारिश में भीगती मल्लिका की कल्पना करने चलें तो सबसे पहले गुरु फिल्म की ऐश्वर्या राय सामने आ खड़ी होती हैं। ठीक भी है! विश्वस्तरीय कवि की कल्पना कोई विश्व सुंदरी ही तो होगी न?
बरसो रे मेघा-मेघा बरसो रे मेघा-मेघा बरसो रे मेघा बरसो।



बारिश में भीगना मुझे भी बहुत पसंद है। जमकर बरसात हो रही हो तो बंद कमरे में बैठना मेरे लिए असह्य हो जाता है।


​बारिश के मौसम में हमेशा खादी या हैंडलूम के कुर्ते पहनती हूँ, न जाने कब भीगने का मौक़ा मिल जाये। मौक़ा मिल गया तो ठीक, वरना खुरपी से खोदकर निकाल लेती हूँ।

नहीं समझे ? अरे भाई, बाहर रखे गमलों की साज-सँभाल करने पहुँच जाती हूँ। फिर मैं और मेरे पेड़-पौधे मिलकर बरसात का आनंद लेते हैं, जैसे ये दोनों ले रहे हैं -
सोना करे झिलमिल-झिलमिल, रूपा हँसे कैसे खिल-खिल
अहा अहा वृष्टि पड़े टापुर-टुपुर, टिप-टिप टापुर-टुपुर।

Friday, June 17, 2016

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये


याद है दोस्तो! स्कूल में जब अनुप्रास, श्लेष, यमक, उपमा, उत्प्रेक्षा अलंकार पढ़ाये जाते थे? न सिर्फ इनकी परिभाषायें, बल्कि सबके उदाहरण भी याद करने पड़ते थे। आज अचानक उन्हीं दिनों का याद किया यह पद बार-बार कानों में मंजीरे सा बजने लगा।

"तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये"। 

तरणि- तनुजा यानी सूर्य की पुत्री यमुना। पुराणों में यमुना को सूर्य की पुत्री बताया गया है और यम को उनका भाई। तो उसी सूर्य की पुत्री और यम की बहन यमुना के तट पर बहुत सारे ऊँचे घने तमाल के वृक्ष छाये हुए हैं मानो झुक-झुक कर जल का स्पर्श करने की चेष्टा कर रहे हों, या उस जल के दर्पण में अपनी शोभा निहार रहे हों, या यमुना के जल को अत्यन्त पावन जानकर उसे प्रणाम कर रहे हों।
तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये।
किधौं मुकुर में लखत उझकि सब निज-निज सोभा
कै प्रणवत जल जानि परम पावन फल लोभा।।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के इन शब्दों में कुछ ऐसा आकर्षण था कि यमुना तट आँखों में तरंगित होने लगा। ऊँचे -ऊँचे तमाल वृक्षों के बीच से वो पगडण्डी भी दिखाई देने लगी जिस पर दिन भर के गोचारण से क्लांत गोपाल कृष्ण बस आने ही वाले हैं। बल्कि उनकी बाँसुरी की टेर तो सुनाई भी दे रही है। हरे-हरे बाँस की बाँसुरी, जिससे राधा ही नहीं सभी गोपियाँ डाह करती हैं -- 

मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं गुंज की माल गरे पहिरौंगी
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी।
भावतो तोहि कहा रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग भरौंगी
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।

सखी राधा से कहती है - तुम चाहती हो कि मैं कृष्ण का स्वाँग भरूँ तो मैं तुम्हारा कहना मानकर पूरा भेष धरूँगी - सिर पर मोरपंख, गले में गुंजा माला, कटि में पीताम्बर पहन लूँगी। हाथ में लाठी लिए गायों के साथ-साथ फिरूँगी। बस एक ही काम मुझसे नहीं होगा - ये मुरलीधर श्रीकृष्ण के होठों से लगी मुरली मैं अपने होठों पर नहीं रखूँगी। 
 
राधा-कृष्ण के दिव्य अलौकिक प्रेम का आधार है यह यमुना-तट। यह वंशी-वट, जहाँ शरद पूर्णिमा की रात महारास का आयोजन हुआ था। यह कदम्ब, जिस पर झूला पड़ा था और राधा प्यारी और कृष्ण मुरारी बारी-बारी झूले थे। और यह तमाल, जो उनकी लीला-कथा का प्रथम साक्षी बना था।

जयदेव ने गीत गोविन्द के पहले ही श्लोक में लिखा है कि बादलों के उमड़ने-घुमड़ने से आकाश और सघन तमालों से भूमि पहले ही श्यामल हो रही थी कि रात घिर आयी। अब नन्द जी को चिंता है कि ऐसे निविड़ निशीथ में कहीं बालक डरकर घर न भूल जाये इसलिए वे राधा से कहते हैं कि इसे घर पहुँचा दो।
मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमैर्
नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिदं राधे गृहं प्रापय।।

श्याम तमाल का दूसरा गुण है उसके फूलों की मादक गंध। जयदेव कहते हैं - ऐसा लगता है जैसे इसने कस्तूरी की गंध को जबरन अपने वश में कर लिया है।
मृगमद-सौरभ-रभस-वशंवद-नवदल-माल-तमाले



यही गुण उसे कृष्ण के और पास ले जाता है। दोनों एक जैसे काले और जबरन मन मोह लेने वाले।
तभी तो चैतन्य महाप्रभु को तमाल में घनश्याम की प्रतीति होती है और वे तमाल तले समाधिस्थ हो जाते हैं।

लेकिन विडम्बना देखिये हम तमाल को भूल गये हैं। तरणि तनूजा तट के तमाल तरु आपको दिखाने के लिये जब मैंने गूगल महाराज और विकिपीडिया महारानी का सहारा लिया तो उन्होंने मुझे निहायत उलझे और घुमावदार रास्तों पर भटका दिया। कुछ-एक अंग्रेज़ी और वनस्पति-विज्ञानी नाम बताये। तमाल को कभी जंगली बादाम तो कभी तेज-पत्ता बताया।

चित्र ढूँढ़ने चली तो आम, कटहल, जामुन और तेज-पत्ता के चित्र मिले, तमाल नहीं मिला। कम से कम ऐसा कोई चित्र नहीं मिला जिसे आपके सामने रखकर कह सकती - ये लीजिये, यह है तमाल।

जितना समय इस भूलभुलैया में भटकते हुए गँवाया, अगर उतनी देर पैदल चलती तो शर्तिया वृंदावन पहुँच जाती और खुद तमाल का चित्र खींच लाती। आगरा के उस बँगले तक भी पहुँच सकती थी जहाँ वर्षों पूर्व पं० विद्यानिवास मिश्र जी रहते थे और जहाँ किसी ने उन्हें तमाल से परिचित कराया था।

"तमाल के झरोखे से" शीर्षक लेख में वे कहते हैं - इसे पहचानते ही लगा कि जाने कब से इसे पहचानता हूँ। काली कालिंदी को इसी ने अपनी घनी काली छाया से और काला भँवर बना दिया। इसी ने गोरी राधा के उज्ज्वल-नील प्यार की छाँह और सघन, और आर्द्र कर दी। इसको मैं हर वसंत में झरते और झीने-झीने फूलों से भरते देखता हूँ। हर वर्षा में इसे सघन पत्र-जाल का छत्र बना देखता हूँ। इसकी छाँह में जो रसवर्षा होती है वह बाहर की रसवर्षा से कहीं अधिक ज़ोरदार होती है। यह तमाल दोनों रसवर्षाओं से भीग-भीगकर सिहरता रहता है।"


तमाल की तरह जिसने इस रस वर्षा में भीगना सीख लिया उसे ब्रह्म को पाने के लिये इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता। उसका आराध्य उसे यमुना तट पर सहज ही मिल जाता है। यहीं वृंदावन में, तमाल तले, माधवी कुंज में मानिनी राधा की मनुहार करते हुए --
ब्रह्म मैं ढूँढ्यो पुरानन मानन बेद रिचा सुनि चौगुने चायन
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितहुँ वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन
ढूँढत ढूँढत बौरि भई रसखानि बतायो न लोग लुगायन
देख्यो दुर्यो वह कुंज कुटीर में बैठि पलोटतु राधिका पायन।

----------


Tuesday, June 14, 2016

मेरी भी एक मुमताज़ थी...



साठ और सत्तर के दशक में जवान हो रहे लड़कों के दिल, परदे पर मुमताज़ को देखते ही दुगनी-तिगनी रफ़्तार से धड़कने लगते थे। हमारे एक दोस्त बताते हैं कि उन दिनों बॉयज हॉस्टल के सभी कमरों में अलगनी पर टँगे कपड़ों के नीचे मुमताज़ की फ़ोटो या पोस्टर ज़रूर चिपके रहते थे। 'मेरे सनम' में जब वो गाती थीं - "ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अँधेरा न घबराइये,जहाँ तक महक है मेरे गेसुओं की चले आइये" - तो लड़के वाक़ई अपने आस-पास उन घुँघराली ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू महसूस करने लगते थे।

 

लड़कों के बीच मुमताज़ की लोकप्रियता का एक कारण और भी था कि ये लड़के दारा सिंह की फ़िल्में देखते हुए बड़े हुए थे। साठ के दशक में दारा सिंह की फ़िल्में धड़ाधड़ बन रही थीं और उनमें से अधिकांश की हीरोइन मुमताज़ थीं। ज़ाहिर है मुमताज़ लड़कों की पहली पसंद बन गयीं। इस दौरान उन्होंने कई और बी ग्रेड फिल्मों में भी काम किया लेकिन फिल्म 'प्यार किये जा' में महमूद ने उन्हें अपने वाह-वाह प्रोडक्शन की हीरोइन क्या चुना, वे हर निर्माता-निर्देशक की पहली पसंद बन गयीं। याद है, रिकॉर्ड प्लेयर पर उनका वो डांस -

ओ मेरी मैना, तू मान ले मेरा कहना,
अरे मुश्किल हो गया रहना तेरे बिना, अई अई यो, अई अई यो।
ओ मेरे मिट्ठू, तेरी मिट्ठी मिट्ठी बोली,
मैं सुनकर तेरी होली ज़ालमा, अई अई यो, अई अई यो।

 

हिंदी फ़िल्मों में एक से बढ़कर एक प्रशिक्षित नृत्यांगनाओं ने काम किया है - सितारा देवी, वैजयंती माला, त्रावणकोर बहनों के नाम से मशहूर पद्मिनी और रागिनी, कुमकुम, वहीदा रहमान और हेमा मालिनी लेकिन जितनी तालियाँ मुमताज़ लूट ले गयीं, उतनी इनमें से किसी एक के हिस्से में नहीं आयीं। मुमताज़ जब "दूसरी लड़की" के किरदार अदा किया करती थीं, तब भी उनके नृत्य लाजवाब होते थे। उस दौर के उनके दो गीत मुझे बेहद पसंद हैं। एक तो है धर्मेंद्र-शर्मिला अभिनीत 'मेरे हमदम मेरे दोस्त' का वह क़व्वालीनुमा गाना -

अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में,
रूठें पल में न मानें महीनों में।
 
मानना पड़ेगा कि इसमें काफी कुछ कमाल गीत-संगीत का भी है मगर वल्लाह क्या ज़बरदस्त नाची हैं मुम्मू। दूसरा गाना हर लिहाज़ से इस गाने से बिलकुल अलग है। उसमें ठेठ हिंदुस्तानी रंग था, और इसमें कैबरे वाला अंदाज़ है। यह फिल्म थी बलदेव राज चोपड़ा की 'आदमी और इंसान' और इसमें मुमताज़ के साथ धर्मेंद्र के अलावा उनके पसंदीदा को-स्टार फ़ीरोज़ ख़ान भी थे। याद आया आपको?

ज़िन्दगी इत्तिफ़ाक़ है
कल भी इत्तिफ़ाक़ थी आज भी इत्तिफ़ाक़ है।

 

फिर आयी 'दो रास्ते' और बिंदिया चमकाती, चूड़ियाँ खनकाती मुमताज़ सबकी नींद उड़ा ले गयीं। आराधना देखने के बाद से हम राजेश खन्ना के पंखे तो बन ही चुके थे, अब मुम्मू के भी डाई हार्ड फ़ैन हो गये। बहुत से शादी-ब्याह, मुंडन-जनेऊ समारोहों में हमने भी लहक-लहक कर "बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी" और "कोई शहरी बाबू दिल लहरी बाबू" गाया और सहेलियों को नचाया। "जय जय शिव शंकर" और "दुनिया में लोगों को" हमारे क्लास एंथम थे। पार्टियों के लिये कुछ अलग टाइप के गाने तय थे, जैसे - ऐ दुश्मने जाँ, मोतियों की लड़ी हूँ मैं, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी। इस तरह ब्याह-बारात से लेकर प्राइवेट पार्टी तक मुमताज़ का ही राज था।

कुछ तो ख़ास रहा ही होगा उस लड़की में जिससे ख़ुद उसके अपने घर वालों को बहुत उम्मीदें नहीं थीं। जिसने दारा सिंह और महमूद के साथ शुरुआत की लेकिन बहुत जल्द बी ग्रेड फिल्मों का चक्रव्यूह तोड़कर दिलीप कुमार और देव आनंद के साथ फ़िल्में कीं। जितेन्द्र और राजेश खन्ना के साथ अनगिनत हिट फ़िल्में दीं। शम्मी कपूर और शशि कपूर के अलावा रणधीर कपूर के साथ भी काम किया। और उभरते सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के साथ काम करने के बाद फिल्मों को अलविदा कहा। वैसे मुझे फ़ीरोज़ ख़ान के साथ उनकी जोड़ी सबसे अच्छी लगती थी। इसलिए चलते-चलते ये गीत और सुनवाना चाहती हूँ।

हमारे सिवा तुम्हारे और कितने दीवाने हैं,
तुम्हारे और कितने ठिकाने हैं,
कसम से किसी को नहीं मैं जानती,
और किसी को नहीं पहचानती,
अरे छोडो-छोडो ये तो बहाने हैं।

 

Wednesday, June 08, 2016

अमलतास को कौन छिपाये


मार्च-अप्रैल अगर टेसू और आम के महीने कहे जा सकते हैं तो मई-जून अमलतास और गुलमोहर के महीने हैं। मई आते न आते हरी निखरी पत्तियों वाला अमलतास पीले फूलों के गुच्छों से ऐसा सज उठता है जैसे कोई दरबारी रक्कासा कोर्निश बजाने को तैयार खड़ी हो।दूसरी तरफ, नन्हीं-नन्हीं पत्तियाँ बरसाने वाला गुलमोहर, सुर्ख़ फूलों की पगड़ी बँधते ही किसी अकड़ू ज़मींदार जैसा ऐंठ जाता है।

मज़े की बात यह है कि गर्मी के मौसम में जब लाल-पीले रंग के कपडे आँखों में चुभते हैं, तब भी अमलतास और गुलमोहर के फूल मन को ठंडक और सुकून देते हैं।

ब्रिटिश हुकूमत ने जब दिल्ली को हिंदुस्तान की राजधानी बनाने का ऐलान किया तब लाल कोट से लेकर शाहजहानाबाद तक की तमाम दिल्लियों को छोड़, एक बिलकुल नयी दिल्ली की नींव रखी गयी। रायसीना पहाड़ी पर आलीशान वाइस रीगल लॉज, उसके दाहिने-बाँये नॉर्थ और साउथ ब्लॉक, और थोड़ा हटकर पार्लियामेंट। अफ़सरों के लिये शानदार बँगले, गोल डाक ख़ाना, गोल मार्किट, गोल्फ़ और पोलो क्लब। एक-दूसरे को समकोण पर काटती चौड़ी सड़कें और चौराहों पर मौसमी फूलों वाले पार्क। नयी दिल्ली की योजना इतनी तफ़सील से बनायी गयी कि किस सड़क के किनारे कौन से पेड़ लगाये जायेंगे, यह भी पहले से तय कर लिया गया था।

दरअसल दिल्ली के गोशे-गोशे में इतिहास बिखरा पड़ा है। हर तरफ़ कोई पुराना महल, सराय, ख़ानक़ाह या मक़बरा है। उनकी खूबसूरती को उभारने वाले पेड़ लगाने की योजना बनायी गयी थी। इमारत की लम्बाई-चौड़ाई के हिसाब से छोटे-बड़े पेड़ चुने गये। किसी सड़क पर इमली, किसी पर नीम, कहीं जामुन तो कहीं सप्तपर्णी के पेड़ लगाये गये। अमलतास और गुलमोहर उस योजना का हिस्सा नहीं थे इसलिए किसी भी सड़क पर उनकी नियमित क़तार नहीं मिलती। लेकिन शुक्र है बाद की सरकारें और उनके बाग़बानी विभाग के अफ़सर इतना सोच-समझ कर काम नहीं करते थे, इसलिये पीले और लाल फूलों से लदे ये पेड़ किसी भी मोड़ पर मिल जाते हैं और आपको याद दिला जाते हैं कि मई का महीना आ गया है।


वैसे लाल-पीले की इस जुगलबंदी की मैं तभी से क़ायल हो गयी थी, जब बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से एम ए कर रही थी। मुख्य द्वार से अंदर जाते ही सड़क के दोनों तरफ़ अमलतास और गुलमोहर की दोहरी क़तार थी। मई-जून की कड़ी धूप में सड़क का कोलतार पिघल कर चिकनी काली साड़ी जैसा लगता, जिस पर पीले और लाल रंग के गुल-बूटे कढ़े हों। कभी जब आसमान में बादल छाये होते तो तीनों रंग इतने चटकीले लगते जैसे किसी पुरानी तस्वीर पर नया पेंट कर दिया गया हो।


पीले अमलतास के बारे में बच्चन जी ने लिखा है -
डार पात सब पीत पुष्पमय जो कर लेता, अमलतास को कौन छिपाये
सेमल और पलाशों ने सिन्दूर पताके नहीं गगन में क्यों फहराये
बौरे आमों पर बौराये भँवर न आये कैसे समझूँ मधु ऋतु आई ?

लाल गुलमोहर के बारे में गुलज़ार साहब का गाना तो हम सबकी ज़बान पर चढ़ा ही रहता है -
गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता
मौसमे-गुल को हँसाना भी हमारा काम होता।


बचपन में हम गुलमोहर की कली से हाथी बनाते थे। खिलने को तैयार कली में चार पैर और एक सूँड पहले से मौजूद होती थी। सारा हुनर उन्हें हलके हाथों से अलग करने का था। आज बरसों बाद मैंने फिर हाथी बनाने की कोशिश की है। 

नतीजा देखिये:


लाल हाथी डाइनिंग टेबल पर सैर करता 


Monday, June 06, 2016

अम्बुआ की डारी बोले कारी कोयलिया

मेरी नानी 
संगीत का शौक हमारे घरवालों का पुश्तैनी मर्ज़ है। मेरे परनाना पंडित श्याम सुंदर जी बदलते मौसम के अनुरूप होली, चैती, कजरी गुनगुनाते रहते थे। उनकी बड़ी बेटी यानी मेरी नानी केसर कुँवर अपने बाल गोपाल से सारी बतकही गीतों में करती थीं - सुबह सवेरे- "जागिये ब्रजराज कुँवर पंछी बन बोले", श्रृंगार करते समय- "राधे प्यारी दे डारो ना बंसी मोरी" और भोग लगाते समय- "आली म्हाने लागे बृंदावन नीको"। संगीत का यही संस्कार उन्होंने अपनी दोनों बेटियों यानी हमारी माँ-मौसी को भी दिया।

मेरी मौसी और माँ 

तब तक घर में कुत्ते की फोटू वाला चूड़ी बाजा यानी HMV का ग्रामोफ़ोन आ चुका था और दोनों बहनें अपने जेब-ख़र्च से पैसे बचाकर ख़ूब रिकॉर्ड खरीदा करती थीं। शादी के बाद वे दोनों तो पराये घर चली गयीं लेकिन उनके चुन-चुनकर जमा किये रिकॉर्ड, मय ग्रामोफ़ोन के वहीँ रह गये। अब मेरा बचपन चूंकि ननिहाल में बीता इसलिए मैं अकेली ही इस विरासत की हक़दार बनी।

उन रिकार्ड्स में तिमिर बरन, के सी डे, के एल सहगल, जूथिका रे, सचिन देब बर्मन, हेमन्तो मुख़र्जी, खुर्शीद, नूरजहाँ, जैसे परिचित-अपरिचित बहुत से नाम थे। सच पूछिए तो उन दिनों मेरी दिलचस्पी गानों में कम और ग्रामोफ़ोन की सुई बदलने या उसकी चाभी भरने में ज़्यादा रहती थी। फिर भी गाने कान में पड़ते रहते थे और याद भी हो जाते थे। ऐसा ही एक गाना था --

अम्बुआ की डारी बोले कारी कोयलिया, आजा बलमुआ हमार।


चार-पाँच साल की बच्ची को शायद ये गाना इसलिए भी पसंद आया होगा क्योंकि इसकी रिदम बड़ी ज़बरदस्त है, पैर अपने आप ठुमकने लगते हैं। बाद में जाना कि ये गाना आशा भोंसले ने निखिल घोष के निर्देशन में गाया था। निखिल जी प्रख्यात बाँसुरी वादक पं० पन्नालाल घोष के छोटे भाई थे और तबला और सितार दोनों में महारत रखते थे।

कुछ बड़ी हुई और साहित्य-संगीत की अपनी समृद्ध विरासत को जानने-समझने के क़ाबिल होने लगी, तब मेरा परिचय एक और गीत से हुआ जिसमें अम्बुआ की डाली पर कोयल बोलने की बात थी। गोदान फिल्म के लिये मुकेश ने गाया था -

हिया जरत रहत दिन रैन, हो रामा, जरत रहत दिन रैन
अम्बुआ की डाली पे कोयल बोले, तनिक न आवत चैन।



यह फ़िल्म हम लोगों को स्कूली पढ़ाई के हिस्से के तौर पर दिखायी गयी थी। एक तो प्रेमचंद जी के उपन्यास पर आधारित थी, फिर उसे बनारस के एक परिचित सज्जन ने बनाया था, तीसरे संगीत दिया था विश्व विख्यात पंडित रवि शंकर ने।

लेकिन इससे यह नहीं समझ लेना चाहिये कि आम का पेड़ सिर्फ़ कोयल के ही काम आता है। हम लड़कियों के लिये भी बड़े काम का है यह। कौन सी लड़की होगी जिसने चटनी के लिये आये टिकोरों में से दो-चार टिकोरे नहीं चुराये होंगे ? आम तौर पर मैं काफ़ी आज्ञाकारी बालिका थी लेकिन जब टॉन्सिल बढ़ जाने की आशंका से आम-इमली पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा हुआ हो तो इत्ती थोड़ी-सी हाथ की सफ़ाई तो दिखानी ही पड़ती थी।

पके आम मुझे पसंद नहीं थे। बड़े मान-मनुहारों के बाद केवल लंगड़ा आम खाती थी और उसकी भी फाँकें नहीं, सिर्फ गुठली। लेकिन गाना पसंद था -

लाल-लाल होंठवा से बरसे ललैया हो के रस चुएला
जइसे अमवा के मोजरा से रस चुएला।
लागे वाली बतियां न बोल मोरे राजा हो करेजा छुएला
तोरी मीठी-मीठी बोलिया करेजा छुएला।



गाना बड़ा खूबसूरत है। ख़ास तौर पर तलत साहब की आवाज़ इसे और भी मीठा बना देती है। लेकिन न जाने क्यों मेरी नानी ने इस पर टोटल बैन लगा रखा था। गाने ही नहीं देती थीं। कभी भूले भटके शुरू कर दूँ तो फ़ौरन इशारे से बरज देतीं। अब नौकरी से अवकाश ग्रहण कर ग्रेटर नोएडा में रहती हूँ और आम काटते हुए जी खोलकर यह गाना गाती हूँ - कि जइसे अमवा के मोजरा से रस चुएला, हो जी रस चुएला।

एक और गीत है, जो मेरे ही नहीं, हिन्दुस्तान की लाखों बेटियों के दिल के बहुत करीब है।

अब के बरस भेज भैया को बाबुल सावन माँ लीजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ दीजो संदेसा भेजाय रे।
अम्बुआ तले फिर से झूले पड़ेंगे रिमझिम पड़ेंगी फुहारें
लौटेंगी फिर तेरे आँगन में बाबुल सावन की ठंडी बहारें
छलके नयन मोरा कसके रे जियरा बचपन की जब याद आये रे।

Saturday, May 28, 2016

जय जगदीश हरे

कल एक मित्र ने फेस बुक पर आनंद मठ का वह बड़ा ही सुमधुर गीत - जय जगदीश हरे - पोस्ट किया। एक अन्य मित्र ने सवाल उठा दिया कि गीता दत्त और हेमंत कुमार का गाया यह गीत आखिर कह क्या रहा है। सच ही तो है जिसने कवि जयदेव की कोमल कान्त पदावली नहीं पढ़ी है, वो तो बेचारे सिर्फ़ "जय जगदीश हरे" की टेक ही पकड़ पाते हैं।

ये सवाल एक समय मेरे मन में भी उठा था। उन दिनों बनारस में मेरी नानी की भजन मंडली हर शनिवार को जमा होती थी और भजन-कीर्तन से मन बहलाती थी। मैं बराबर नए गीतों की खोज में रहती थी। उन दिनों रफ़ी साहब का गाया - पाँव पडूँ तोरे श्याम ब्रज में लौट चलो, सुलक्षणा पंडित का गाया - कैसे कान्हा का राधा भरोसा करे और शारदा सिन्हा का गाया - जगदम्बा घर में दियरा बार अइनी हो सीखा और भजन मंडली में गाया। लेकिन परिचित धुनों वाले गीत ज़्यादा जमते थे । सोचा जय जगदीश हरे गाकर देखूँ। लेकिन शब्द पकड़ायी में नहीं आ रहे थे। कहीं से सुन लिया कि यह जयदेव के गीत गोविन्द में मिलेगा। बस, मिल गया कोड़ा! अब क्या चाहिए था? जीन, लगाम और घोड़ा।

गीत गोविन्द की तलाश शुरू हो गयी। पहले तो अपने घर की पुस्तकों में ही ढूँढा। नहीं मिली तो एक दिन चौखम्बा जाकर खरीद लायी। कोई प्रमाणिक संस्करण तो नहीं मिला लेकिन अपना काम चल गया क्योंकि जय जगदीश हरे के शब्द मिल गये। हिंदी अनुवाद पढ़कर अर्थ समझ ही लिया था कि यह दशावतार स्तोत्र है, जिसमें विष्णु के मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध और कल्कि अवतारों का वर्णन है। चूँकि जयदेव जगन्नाथ स्वामी के भक्त थे इसलिए वे इन्हें विष्णु के नहीं बल्कि अपने आराध्य श्रीकृष्ण के अवतार मानते हैं। और इसीलिए दस अवतारों में राम के बाद कृष्ण का नहीं बल्कि बलराम का नाम गिनाते हैं।

जय जगदीश हरे को मैंने तभी भजन-मंडली वाली डायरी में उतार लिया था, जो आज काम आया। तो लीजिये जयदेव कृत दशावतार का परायण कीजिये, जो मेरी डायरी से उठकर मेरे ब्लॉग तक आ रहा है।







प्रलय पयोधि जले धृतवानसि वेदम् 
विहित वहित्र चरित्रमखेदम् 
केशव धृत मीन शरीर। जय जगदीश हरे।



क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे 
धरणि-धरण-किण चक्र गरिष्ठे 
केशव धृत कच्छप रूप। जय जगदीश हरे। 




वसतिदशनशिखरे धरणी तव लग्ना 
शशिनिकलंक कलेव निमग्ना 
केशव धृत शूकर रूप। जय जगदीश हरे। 





तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गं 
दलित हिरण्यकशिपु तनु भृङ्गं
केशव धृत नरहरि रूप। जय जगदीश हरे। 



छलयसि विक्रमेण बलिमद्भुत वामन 
पदनखनीरजनित जन पावन 
केशव धृत वामन रूप। जय जगदीश हरे। 




क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् 
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् 
केशव धृत भृगुपति रूप। जय जगदीश हरे। 



वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति कमनीयम् 
दशमुख मौलि बलिं रमणीयम् 
केशव धृत रघुपति रूप। जय जगदीश हरे। 




वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् 
हलहति भीति मिलित यमुनाभम् 
केशव धृत हलधर रूप। जय जगदीश हरे। 



निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् 
सदय हृदय दर्शित पशुघातम् 
केशव धृत बुद्ध शरीर। जय जगदीश हरे। 



म्लेच्छनिवहनिधने धरयसि करवालम् 
धूमकेतुमिव किमपि करालम् 
केशव धृत कल्कि शरीर। जय जगदीश हरे। 



श्रीजयदेव कवेरिदमुदितमुदारम् 
श्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम् 
केशव धृत दशविध रूप। जय जगदीश हरे। 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts