Friday, April 22, 2016

पचास साल बाद

कम लोगों के जीवन में ऐसे अवसर आते होंगे कि वे पचास साल पहले की भूली-बिसरी यादों पर जमी धूल झाड़कर चमकीले रंगों वाली तस्वीर को फिर से देख सकें। ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे ऐसा मौक़ा मिला कि साठ साला आँखों से दस साल वाली शुभ्रा की जानी-पहचानी जगहों को देख सकी, उसकी बेफ़िक्री और मस्ती को महसूस कर सकी।



इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं- बेटा श्रेयस, बहू अपर्णा और बेटी-सी श्रेया।

एक ने ज़िद करके टिकट बुक करा दिये। दूसरी ने समझाया - कभी तो अपने बारे में भी कुछ सोच लो, कर लो। और तीसरी ने मुँह लटका लिया - आप नहीं जाओगी तो मुझे बहोत-बहोत दुख होगा।

सिर्फ अपने मन की बात होती तो शायद मार भी लेती लेकिन इन तीन तिलंगों का मन कैसे मारती ? आख़िरकार जाना ही पड़ा।

ये बड़ा सुखद संयोग है कि मेरी दोनों गोआ यात्राओं में आकाशवाणी का भरपूर योगदान रहा। पहली बार जब पापा का तबादला हुआ और दूसरी बार जब निपट अकेली महिला के होटल में ठहरने के संकोच से मैंने आकाशवाणी के अतिथि-गृह में रहने का फैसला किया।



1964 में मेरे पापा ( श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा 'भिक्खु' ) की पोस्टिंग लखनऊ से पणजी हुई। अम्मा (डॉ शकुन्तला शर्मा) दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में प्रवक्ता थीं और मैं नाना-नानी के पास बनारस में रहती थी। गर्मी की छुट्टियों में अम्मा मुझे लेकर पापा के पास जाती थीं। इस तरह मेरी छुट्टियाँ कभी लखनऊ, कभी पटना, कभी पणजी तो कभी कोहिमा में बीतती थीं। उस वर्ष भी गर्मी के लगभग दो महीने हमने पापा के साथ गोआ में बिताये।

इतना तो याद है कि पानी के जहाज़ का सफ़र मेरे और पापा के लिये बहुत कठिन रहा। हम सारे रास्ते निढाल पड़े रहे। पणजी पहुँचने के बाद दो दिन तक मुझे ऐसा लगता रहा जैसे पैरों के नीचे की ज़मीन कभी एक तरफ़ तो कभी दूसरी तरफ़ झुकी जा रही है।

पहले-पहल हम जिस होटल में ठहरे थे वहाँ शाकाहारी खाने की कोई व्यवस्था नहीं थी लिहाज़ा हम वहाँ से दूसरे होटल में आ गये। इस होटल का कमरा खूब बड़ा और हवादार था। समुद्र की तरफ़ खुलने वाली दो बड़ी खिड़कियाँ थीं। कमरे से अगुआद का क़िला दिखाई देता था। होटल के बगल से होकर एक सड़क सब्ज़ी मंडी की तरफ जाती थी। अम्मा ने जब उस कमरे के एक कोने में अपना चूल्हा-चौका जमा लिया, तब उनके लिए सब्ज़ी लाने की ड्यूटी मुझे दी गयी। हर शाम वे मुझे वहीँ से खरीदी बरसाती पहनाकर, लिटल रेड राइडिंग हुड की तरह तैयार कर देतीं। मैं एक मुन्ने से बटुए में पैसे सँभालकर जाती और आलू, टमाटर, भिंडी के साथ उनके बालों के लिये एक वेणी भी ख़रीद लाती थी। इस सड़क के दूसरी ओर मिलिट्री हॉस्पिटल था। होटल के सामने से गुजरने वाली बड़ी सड़क मिरामार बीच की तरफ जाती थी। बस, 1964 की इन मुट्ठी भर यादों को साथ लिये मैं 2014 में गोवा पहुँच गयी।




हवाई अड्डे पर तो लगा जैसे पचास वर्ष में कई युग बदल गए हों। मेरे सहयात्री तेज़ी से उतरती सीढ़ियों से फटाफट नीचे उतर गये। मुझे ज़रा एस्केलेटर से डर लगता है, इसलिये निहायत दिलचस्पी से पोस्टर और बोर्ड पढ़ने के बहाने मैं असली सीढ़ियाँ ढूँढती रही। जब मिल गयीं तब ख़रामा-ख़रामा नीचे उतरी। आकाशवाणी के गेस्ट-हाउस का अता-पता समझा और प्री-पेड टैक्सी करके पहुँच गयी।

गेस्ट हाउस पणजी में नहीं, बम्बोलिम में है - ट्रांसमीटर के नज़दीक। कुछ परिवार वहां रहते हैं लेकिन कई फ्लैट खाली पड़े हैं। सामने ज़ुआरी नदी का चौड़ा पाट और एक तरफ़ किसी पांच सितारा होटल के सीढ़ीनुमा कमरे।




लेकिन गोआ का ये हिस्सा मेरी यादों से बहुत अलग था। पणजी से दूर, मांडोवी नदी और फोर्ट अगुआद से दूर। दस साल वाली शुभ्रा ठुनकने लगी - ये कहाँ ले आई हो, ये मेरा वाला गोआ नहीं है।

उसे डाँट कर चुप कराया। उससे वादा किया कि कल उसे उसकी परिचित जगहें ज़रूर दिखाऊँगी। वहाँ के केयरटेकर से दिन भर की एक टैक्सी की व्यवस्था करने को कहा।

टैक्सी वाले लुइस देखने में ही अच्छे लगे। मैंने उन्हें अपनी गोआ वाली फोटो दिखायी और बताया कि मैं इतनी बड़ी थी जब यहाँ आई थी और अब पचास साल बाद उसी गोआ की तलाश में आई हूँ। लुइस ने मेरे नास्टैल्जिया को समझा और पूरे दिन में एक बार भी कभी, कहीं जल्दी करने को नहीं कहा।

हम बम्बोलिम से पहले डॉना पाओला गये। मुझे याद आया हम जेटी के दाहिनी तरफ किसी जगह नहाये थे। कुछ फोटो खींचे, एक फ्लॉपी हैट ख़रीदा।








वहाँ से हम मिरामार गये, लेकिन मैं वहाँ उतरी भी नहीं। मेरी स्मृतियों का मिरामार बहुत सुन्दर है। वहाँ मैं अपने पापा की बहुत दुलारी बिटिया होती हूँ। हम सब अक्सर शाम को वहाँ जाते हैं।

एक शाम जब मेरा अभी-अभी ख़रीदा जूता समुद्र में बह जाता है तो पापा मुझे दिलासा देते हैं - यह रत्नाकर है बेटा। इसके गर्भ में न जाने कितने रत्न हैं लेकिन यह अपने लिए कुछ नहीं रखता। सब बाहर फेंक देता है। हो सकता है तुम्हारा जूता भी फेंक दे।

हम दोनों सुबह जल्दी उठकर उसे ढूँढ़ने जाते हैं। मगर सागर की फेंकी तमाम चीज़ों के बीच जब जूता नहीं मिलता तो मैं फिर रुआँसी हो जाती हूँ।

पापा फिर समझाते हैं - रोने की क्या बात है? हो सकता है सागर ने तुम्हारा जूता किसी ऐसी बच्ची को दे दिया हो, जिसके पापा के पास जूते दिलाने के पैसे न हों।

मैं ख़ुश हो जाती हूँ और दूसरे पैर का जूता भी समुद्र में फेंक देती हूँ, इस हिदायत के साथ कि इसे भी उसी लड़की को दे देना।


अभी जारी है ........

7 comments:

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  2. Bahut hi khubsurat likha hai... :)

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  3. Archna Pant says : ओह ! भावुक कर दिया !
    कितना प्यारा लिखतीं हैं आप !

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  4. Tulika Sharma says : दिदिया हमें भी ले लिया आपने अपने साथ

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  5. Tulika Sharma says : दिदिया हमें भी ले लिया आपने अपने साथ

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  6. Kash main bhi wahan par hoti.... How lucky you are.... Touch wood...

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