Tuesday, May 29, 2012

Salil Chowdhury- एक विलक्षण प्रतिभा

सलिल चौधरी, एक नाम, एक व्यक्तित्व, एक अदभुत संगीतकार, एक विलक्षण प्रतिभा।  हिन्दी फ़िल्म संगीत के स्वर्णिम दौर के सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में से एक - सलिल चौधरी।

शांत चेहरे और बैचेन नज़रों के पीछे रचनात्मकता का गहरा समुद्र छुपाये, सलिल दा ने न जाने कितनी कालजयी रचनाओं को जन्म दिया।  उन्होंने लगभग ७५ हिन्दी फिल्मों और २६ मलयालम फिल्मों के अलावा बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड, गुजराती, मराठी, असमिया और ओडिया फिल्मों में भी संगीत दिया और क्या खूब दिया !

सलिल चौधरी का जन्म १९ नवम्बर १९२२ को बंगाल के दक्षिण चौबीस परगना जिले के एक गाँव में हुआ था। पिता ज्ञानेन्द्र चौधरी आसाम के चाय बागान  में डॉक्टर थे और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के शौक़ीन।  बचपन से सलिल घर के भीतर उनके रिकॉर्ड और बाहर गूँज रहे बागान मज़दूरों के गीत सुन सुनकर बड़े हुए।  कहते हैं कि आठ साल की उम्र में ही वे उम्दा बाँसुरी बजाने और गाने लगे थे। बड़े भाई के ऑर्केस्ट्रा की बदौलत कई और वाद्य बजाना सीख गए, जिनमें इसराज, वॉयलिन और पियानो प्रमुख थे।  उनके पिता चाय बागानों में काम करने वाले गरीब मजदूरों-कुलियों को साथ लेकर नाटकों का मंचन किया करते थे, जिनमें ब्रिटिश शासकों के अन्याय और शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी जाती थी। सलिल दा ने पिता से संगीत प्रेम के साथ समाजवादी विचारधारा भी विरासत में पायी। 

बीज पड़ चुका था, उसे खाद पानी दिया कोलकाता के माहौल ने, जहाँ वे उच्च शिक्षा के लिए गये। बंग्बाशी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे कम्युनिस्ट पार्टी और ’इप्टा’ के सदस्य बने। इस दौर में उन्होंने कई गीत लिखे जो युवाओं के बीच बेहद प्रचलित हुए। बाद में उन्होंने कवि सुकांत भट्टाचार्य की ऐसी ही एक रचना को संगीतबद्ध किया और हेमंत कुमार से गवाया। 

माहौल कुछ ऐसा था कि सलिल दा की रचनात्मकता ऊंची उड़ानें भर रही थी और वे लेख, कविता, कहानी, निबंध, बहुत कुछ लिखते जा रहे थे।  इसी बीच, कोलकाता के एक ग़रीब रिक्शावाले पर आधारित उनकी कहानी पर इसी नाम से बांग्ला फिल्म बनी। बिमल रॉय ने उसे “दो बीघा जमीन” नाम से हिन्दी में बनाया।  १९५३ में हिंदी फिल्मों से नाता क्या जुड़ा कि वे विधिवत संगीतकार बन गये और आने वाले कई दशकों तक सुरों की अनवरत वर्षा करते रहे।
-- धरती कहे पुकार के (दो बीघा ज़मीन)

राज कपूर की फ़िल्मों का संगीत हमेशा शंकर- जयकिशन की जोड़ी ही दिया करती थी लेकिन जब उन्होंने लीक से हटकर जागते रहो बनायी तो उसके संगीत निर्देशन का ज़िम्मा सलिल दा को सौंपा. इस फिल्म के क्लाईमैक्स का  गीत न सिर्फ आर के बैनर से नर्गिस की विदाई का गीत है बल्कि ख़ुद एक अहम् किरदार का दर्जा रखता है. कहते हैं, राज कपूर ने इस गीत की रिकार्डिंग के दौरान शंकर जयकिशन को विशेष रूप से आमंत्रित किया था ताकि वे सलिल दा की रचना प्रक्रिया को देख सकें.
--- जागो मोहन प्यारे (जागते रहो)

सलिल दा की आसान सी दिखने वाली रचनाओं में भी कुछ ऐसे गूढ़ प्रयोग होते थे जो महान गायकों को भी उलझन में डाल देते थे. माया फिल्म के एक गीत के लिए रफ़ी साहब जैसे मंझे हुए कलाकार को १२ - १३ रीटेक देने पड़े थे तब कहीं जाकर सलिल दा संतुष्ट हुए थे. लता जी को यह मुश्किल पेश नहीं आई क्योंकि वे दो वर्ष पूर्व इसी रचना को बांग्ला में गा चुकीं थीं.
-- ओगो आर किछु तो नाय
-- तस्वीर तेरी दिल में (माया)

सलिल दा के गीतों में साजों का प्रयोग लाजवाब होता था. लता जी कहती हैं कि सलिल दा की बंदिशों में संगीत के इतने छोटे-छोटे टुकड़े और औचक ट्रांजीशन होते थे कि उन्हें बेहद सजग होकर गाना पड़ता था. उनके कम्प्यूटरी दिमाग में एक साथ न जाने कितने साज बजते रहते थे और सबके सब सिंफनी में. सुनने वाले वाद्यों के संयोजन से उनकी कृतियों को पहचान सकते हैं. जैसे फ़िल्म छाया का यह गीत
--- दिल से दिल की डोर बाँधे (छाया)

इसी फिल्म के एक गीत को लेकर सलिल दा पर आरोप लगा कि उन्होने मोत्ज़ार्ट की सिम्फनी  की  नक़ल की है. लेकिन हकीकत ये है कि उन्होंने इस सिम्फनी के केवल पहले पाँच “बार” ही लिए हैं और बाकी पूरा गीत खुद गढ़ा था. इस बारे में सलिल दा कहते थे कि मैं इन महान संगीतकारों की रचनाओं से प्रेरणा लेता हूं, उनकी बनाई धुनों को “रॉ मैटिरियल” की तरह उपयोग में लाता हूं और उन्हें भारतीय परिवेश में ढाल कर धुन गढ़ता हूं. फ़िल्म छाया का टाइटल म्युजिक भी सलिल दा ने बीथोवन की सिम्फनी से प्रेरित हो के बनाया था.
--- इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा  (छाया)

मधुमती के संगीत को सलिल दा की संगीत यात्रा का चरम उत्कर्ष कहा जा सकता है.  इस फ़िल्म के लिये उन्हें सर्वष्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरुस्कार दिया गया. " आजा रे परदेसी " 'वर्ष का सबसे प्रसिद्ध गीत रहा. इस गीत के लिये बेसिक मेलोडी में सेवेन्थ कॉर्ड का प्रयोग किया  गया है जो अपने आप में एक अधूरापन लिये है और नायिका के अधूरेपन और अधूरी चाह से मेल खाता है।
-- आजा रे मैं तो कबसे खड़ी इस पार  (मधुमती)

मुकेश सलिल दा के पसंदीदा गायक थे. रेंज की  कमी के आरोपों के बावजूद सलिल दा ने मुकेश जी से कुछ बेहद खूबसूरत गीत गवाए हैं. जैसे “कैसे मनाऊं पियवा”, “ये दिन क्या आये”, “कई बार यूं भी देखा है”, “नैन हमारे सांझ सकारे”, “कहीं दूर जब दिन ढल जाये ” या फिर मधुमती का यह बेहद लोकप्रिय गीत.
--  सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं (मधुमती)

तलत महमूद के साथ सलिल दा ने गिने चुने गीत किये, मगर फ़िल्म “एक गाँव की कहानी” में गाये उनके गीतों का शुमार उनके श्रेष्ठ गीतों मे होता है. तलत साहब की मखमली आवाज़ और सलिल दा का वाद्य संयोजन मिलकर तन्हाई और उदासी का ऐसा आलम गढ़ते हैं कि सुनने वालों पर जादुई असर होता है.
-- रात ने क्या क्या ख्वाब दिखाये (एक गाँव की कहानी)

१९६१ में आयी फ़िल्म माया भी संगीत के इस सफ़र का महत्वपूर्ण पड़ाव है. लता जी की आवाज़ में यह दर्द भरा गीत भी इतना मधुर बन पड़ा है, कि दर्द के बजाय आनन्द की अनूभुति कराता है.
--- जा रे जा रे उड़ जा रे पाखी (बांगला)
“जा रे जा रे उड़ जा रे पंछी” ( माया )

पूनम की रात फिल्म में सलिल दा को एक बार फिर रहस्य की चादर ओढ़े माधुर्य रचने का मौक़ा मिला और इस बार भी उन्होने सुनने वालों को निराश नहीं किया. एक और मधुर हॉन्टिंग मैलोडी उभरी.
--- साथी रे तुझ बिन जिया उदास रे (पूनम की रात)

सलिल दा के संगीत में लोक गीतों का बहुत प्रभाव दिखाई देता है.एक बार काठमांडू यात्रा के दौरान सलिल दा ने रात में होटल के चौकीदार को एक नेपाली लोक गीत गाते सुना और जन्म हुआ फ़िल्म नौकरी के इस खूबसूरत गीत का.
-- छोटा सा घर होगा (नौकरी)

एक और पहाड़ी लोकगीत मिलता है मधुमती में
--- दैया रे दैया रे चढ़ गयो पापी बिछुआ ( मधुमती )

१९६५ में बनी मलयालम फ़िल्म "चेमीन" साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तकशी शिवशंकर पिल्लै के उपन्यास पर आधारित थी. समुद्र किनारे बसने वाले मछवारों के प्रेम त्रिकोण पर आधारित इस उपन्यास का कई  भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, रुसी, जर्मन, इटालियन और फ्रेंच भाषा में भी अनुवाद हुआ.   निर्देशक रामू करिआत ने संगीत का जिम्मा सौंपा हमारे सलिल दा को. सलिल दा जानते थे कि उन पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और वे इसमें कोई कोर कसर नही छोड़ना चाहते थे. सो वे अचानक  मुंबई से ग़ायब हो गए और वह भी दो-एक दिन के लिए नहीं, बल्कि चार पाँच महीनों के लिए. किसी को पता नहीं था कि वे केरल में मछवारों की बस्ती में उनके साथ रह रहे थे ताकि उनके जीवन को नज़दीक से देख सकें और उनके संगीत को आत्मसात कर सकें. तभी तो बन सके फिल्म "चेमीन" के यादगार गीत.

इस फ़िल्म के संगीत ने मलयालम संगीत का पैटर्न ही बदल डाला. यहीं सलिल दा को मिला एक बेहद प्रतिभाशाली गायक -येसुदास. सलिल दा ने “छोटी सी बात” में येसुदास और आशा जी की आवाज़ में एक गीत बनाया, जिसे पर्दे पर अतिथि कलाकार धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी ने अदा किया.
-- जानेमन जानेमन (छोटी सी बात)

 स्वामी विवेकानंद" के जीवन पर आधारित फ़िल्म में सलिल दा ने ८ गीत स्वरबद्ध किए. कुछ ख़ुद विवेकानंद जी के लिखे गीत हैं  तो कुछ कबीर, जयदेव और सूरदास के. दो गीत गुलज़ार साहब ने लिखे हैं, जिसमें येसुदास का गाया बेहद खूबसूरत "चलो मन" भी शामिल है. एक और गीत "जाना है जाना है..." को उनकी बेटी अंतरा चौधरी ने आवाज़ दी है.

अंतरा जब काफी छोटी थीं तभी उन्होंने मीनू फिल्म में प्रमुख भूमिका निभाने वाली बाल कलाकार के लिए पार्श्व गायन किया था. बताया जाता है कि इस फिल्म के एक गीत की रेकॉर्डिंग सात रीटेक के बाद जाकर पूरी हुई. वजह थे मन्ना डे, जो गाते गाते बीच में रुक जाते थे. उनकी यह परेशानी देखकर सलिल दा ने पूछा, दादा कोई दिक्कत है गाने में ? तो बोले नहीं, ये लड़की इतना बढ़िया गा रही है कि मेरा ध्यान इसको सुनने में चला जाता है।
--- तेरी गलियों में हम आये ( मीनू )

सलिल दा ने कई नाटकों और बैले के लिए भी संगीत दिया. सचिन शंकर बेले यूनिट द्वारा १९७१ में रचित  "बोटमेन ऑफ़ ईस्ट बंगाल" में उनका एक गीत बहुत ही सुन्दर बना, दयानी करिबो अल्लाह रे" जिसे पंकज मित्रा ने अपनी महकती आवाज़ से सजाया. सलिल दा के गहरे दोस्त, लोक गायक निर्मलेंदु चौधरी ने इसी धुन पर हिन्दी फ़िल्म लालबत्ती (१९५७) के लिए "क्या से क्या हो गए अल्लाह रे' गाया था.

७० के दशक के प्रारंभ में हिन्दी सिनेमा और संगीत ने बहुत बड़े बदलाव की लहर देखी. पुराने दौर के नायकों की जगह ली रोमांटिक राजेश खन्ना और एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन ने. एक नये किस्म के सिनेमा का जन्म हुआ  जिसे “मिडल ऑफ़ द रोड” सिनेमा का नाम दिया गया. ह्रषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी, गुलज़ार जहाँ इसके पुरोधा बने वहीँ संगीतकार के तौर पर सलिल दा इसके “फ़्लैग बीअरर” बने. इस दौर की एक सफल फिल्म थी आनन्द, जिसे आज तक राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के अभिनय, हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन, गुलज़ार के संवादों और सलिल चौधरी के गीतों के लिए याद किया जाता है। इस फ़िल्म में मुकेश का गाया यह गीत उनके सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है।

--- मैंने तेरे लिए ही सात रंग के (आनंद)

आनंद में महिला किरदारों के गीत की गुन्जाइश नहीं थी, लेकिन सलिल दा का संगीत हो और लता जी एक भी गीत न गायें? यह कैसे मुमकिन था? लिहाज़ा ह्रषि दा ने गीत की सिचुएशन निकाली और सलिल दा ने धुन  बनाई। निर्देशक और संगीतकार के बीच गलतफहमी की वजह से एक ही धुन पर दो अलग अलग गीतकारों गुलज़ार और योगेश ने अलग अलग गीत लिख लिए. ह्रषि दा को यह पता नहीं था. उन्होने गुलज़ार का गीत फ़ाइनल कर दिया| बाद में उन्होंने योगेश से एक और गीत - कहीं दूर जब दिन ढल जाए - लिखवाया। फ़िलहाल सुनिए लता जी का यह गीत|
---ना जिया लागे ना (आनंद)

उन्हीं दिनों आयी फ़िल्म अन्नदाता में जया भादुड़ी के सहज अभिनय के साथ-साथ “रातों के साये घने”, “नैन हमारे साँझ सकारे ” और “गुजर जाए दिन” जैसे गीत भुलाये नहीं भूलते हैं. कहा जाता है कि गुज़र जाये दिन गाने में किशोर कुमार को बहुत कठिनाई हुई थी और १७ रीटेक के बाद रेकॉर्डिंग पूरी हो सकी थी. किशोर कुमार इसे अपने गाए सबसे बेहतरीन और कठिन गीतों में से एक मानते थे.
--- गुज़र जाये दिन (अन्नदाता)

इसी दौर की एक और फिल्म थी रजनीगंधा जो अपने मधुर संगीत के लिये आज भी जानी जाती है। गायक मुकेश को इस फ़िल्म के गीत “कई बार यूं ही देखा है” के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया । फ़िल्म के शीर्षक गीत को लता जी ने अपने स्वर माधुर्य से गरिमा प्रदान की और उस दौर के सर्वश्रेष्ठ गीतों में जगह दिलाई.
--- रजनीगंधा फूल तुम्हारे (रजनीगंधा )
जागते रहो में एक दार्शनिक गीत था “ज़िंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या” जो महान कलाकार मोतीलाल जी पर फ़िल्माया गया था। सलिल दा की संगीत रचना और मुकेश के स्वर ने नशे में दार्शनिक बातें करने वाले इस चरित्र को जीवंत बना दिया।
--- ज़िंदगी ख्वाब है (जागते रहो)

१९५४ में आयी फ़िल्म परिवार में सलिल दा ने राग हंसध्वनी में  जो गीत रचा, वह आज भी लोगों को झूमने पर मजबूर कर देता है.
-- जा तोसे नहीं बोलूं कन्हैया (परिवार )

इसी तरह फ़िल्म परख में लता जी के गाये इस गीत की बानगी देखिये
--- ठन्डे ठन्डे हरे हरे नीम तले (परख )

और यही धुन बांग्ला शब्दों के साथ, सलिल दा की पत्नी सबिता चौधरी के स्वर में
--- एने दे एने दे 

बांग्ला संगीत की बात चली है तो यह भी बताते चलें कि सलिल चौधरी और हेमन्त कुमार की संगीतकार-गायक की जोड़ी ने बहुत से यादगार गीत दिये हैं. एक समय था जब यह जोड़ी बांग्ला संगीत में शीर्ष स्थान रखती थी.

सलिल दा ने कोरस का बेहतरीन उपयोग किया है. कई बार वे स्थायी और अंतरे के बीच वाद्यों की जगह कोरस का इस्तेमाल करते थे. जैसे -
-- ज़िन्दगी कैसी है पहेली (आनंद )
-- न जाने क्यूं (छोटी सी बात)

बहुत मीठे और रोमानी गीत रचे सलिल दा ने. जैसे फ़िल्म “उसने कहा था” का यह गीत, जिसमें रात और बारिश के वातावरण को वाद्य संयोजन से सजीव बनाया गया है. हेमंत कुमार और लता का गाया यह गीत इतना प्यारा है, इसकी धुन इतनी मीठी है, इसकी लय इतनी दिलकश है कि लगता है बस सुनते ही रहें....
--- आहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे (उसने कहा था) 

वैसे भी सलिल दा जैसे वर्षा के गीत और कहाँ हैं? सच कहिये जब आकाश में बदल घिर रहे हों, तब सबसे पहले आपको कौन सा गीत याद आता है? यही न?
--- ओ सजना बरखा बाहर आई (परख )

एच. एम. वी ने अपनी स्वर्ण जयंती पर शास्त्रीय और फ़िल्म संगीत के महान कलाकारों से अपने पसंदीदा गीत चुनने को कहा था. और शायद आप को आश्चर्य हो कि यह गीत उन सभी की सूची में शामिल था. लता जी भी इसे  अपने सर्वश्रेष्ठ गीतों में स्थान देती हैं। और उससे भी ज़्यादा मज़े की बात ये कि सलिल दा की कार के वाईपर्स की धुन और लय से इसका जन्म हुआ था। ऐसे थे हमारे सलिल दा ...जिनके लिए कण कण में संगीत रचा बसा था.  यह उनकी विलक्षण प्रतिभा और सृजनशीलता का कमाल था कि जहाँ एक ओर उन्होंने चम्पावती जैसे मस्ती में झूमते गीत रचे वहीँ गाँव-घर के आँगन में मधुर दीपक की लौ सरीखा यह गीत भी दिया.
--- मेरे मन के दिए (परख ) ( अंत तक अंडर प्ले )

नियोन रौशनी की चकाचौंध के बीच माटी के इस दिए का मोल कभी कम नहीं होगा..... हो ही नहीं सकता.

क्या है ग़ज़ल?

उर्दू शायरी की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा है ग़ज़ल. यह बात दीगर है कि हिंदी पट्टी वाले उसे मूंगफली और तिल - गुड़ की गजक की तरह "गजल" बोल डालते हैं, लेकिन इससे ग़ज़ल के प्रति उनका लगाव तो कम नहीं हो जाता. जब तक ग़ज़लें बेगम अख्तर या फ़रीदा ख़ानम की आवाज़ में सुनने को मिलती थीं, कोई- कोई बिरले ही उसके मुरीद होते थे. लेकिन भला हो जगजीत और चित्रा सिंह का जिन्होंने ग़ज़ल को चुनिन्दा कद्रदानों की महफ़िल से निकाला और गली -मोहल्ले की खुली हवा में गुँजा दिया. फिर तो अकेले जगजीत ही क्यों, मनहर और पंकज उधास, चन्दन दास, तलत अज़ीज़, पीनाज़ मसानी और अहमद और मोहम्मद हुसैन के स्वर भी अक्सर सुनाई देने लगे. सरहद पार से मेहदी हसन और ग़ुलाम अली साहबान भी अक्सर इधर तशरीफ़ लाने और हमें अपनी ग़ज़लों से लुभाने लगे.
ग़ज़ल से हमारा परिचय तो खूब बढ़ा लेकिन सच पूछिए तो हम अब तक उसके सही स्वरूप से परिचित नहीं हैं. क्या है ग़ज़ल?
शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो ग़ज़ल हसीनों से या उनके बारे में बातचीत करने का तरीक़ा है. यह शब्द अरबी के गज़ाला और अंग्रेज़ी के gazelle से उर्दू में आया है. इसका अर्थ है खूबसूरत आँखों वाली हिरनी. ज़ाहिर है शेरो-शायरी की यह विधा ज़्यादातर हुस्न-ओ-इश्क़ की दास्ताँ बयान करने के काम में आती है. ग़ालिब भी जिन मीर साहब का लोहा मानते थे - ( रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब, कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था ),

वही मीर फरमाते हैं -
हस्ती अपनी हुबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है.
मीर उन नीमबाज़ आँखों की
सारी मस्ती शराब की सी है.

ग़ज़ल के कलेवर में शायर को अपनी बात कहने की छूट रहती है. एक ही ग़ज़ल में वह हालात का भी ज़िक्र कर सकता है, महबूब की शोखी और अपनी लाचारी भी बयान कर सकता है.

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी.
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी.
उनकी आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी मायल कभी ऐसी तो न थी.

ग़ज़ल के हर शेर में दो मिसरे यानी पंक्तियां होती हैं. पहले मिसरे को मिसरा-ए- ऊला और दूसरे को मिसरा-ए-सानी कहते हैं. जैसे बहादुर शाह ज़फ़र की इस ग़ज़ल में मिसरा-ए-ऊला है - बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी,  और मिसरा-ए-सानी है - जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी.
ग़ज़ल के पहले शेर को मतला कहते हैं. इस शेर के दोनों मिसरों के अंतिम कुछ शब्द एक जैसे होने चाहिए, जैसे यहाँ - "कभी ऐसी तो न थी" ये शब्द हैं.

अंतिम शेर को मक़ता कहा जाता है. अमूमन इसमें शायर का नाम या तख़ल्लुस भी होता है, जैसे इस ग़ज़ल में मक़ता है - क्या सबब तू जो बिगड़ता है "ज़फ़र" से हर बार, के तेरी हूर शुमायल कभी ऐसी तो न थी.
ग़ज़ल के मीटर को "बहर" कहते हैं. एक ग़ज़ल में कितने ही शेर हो सकते है मगर सब एक ही बहर में होने चाहिए. हिंदी या संस्कृत की तरह इसमें ह्रस्व- दीर्घ के अलग-अलग संयोजन वाले निश्चित छंद नहीं हैं. शायर अपनी बात कहने के लिए कोई भी बहर चुन सकते हैं. उर्दू अदब में वैसे तो १९ बहर बतायी गयी हैं लेकिन आम तौर पर ३ बहर पायी जाती हैं. छोटी, मंझोली और बड़ी.
छोटी बहर -  कोई उम्मीद बर नहीं आती,
                  कोई सूरत नज़र नहीं आती.

 मंझोली बहर -   बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं,
                      तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं.

 बड़ी बहर -     आशियाँ जल गया गुलसिताँ लुट गया अब क़फ़स से निकल कर किधर जायेंगे,
                      ऐसे मानूस सैयाद से हो गए अब रिहाई मिलेगी तो मर जायेंगे.

 ग़ज़ल में दूसरी पाबन्दी होती है - रदीफ़ और काफ़िया.
पहले शेर के दोनों मिसरे और बाक़ी शेरों के दूसरे मिसरे के अंतिम शब्द एक जैसे होने चाहिए. जैसे छोटी बहर के उदाहरण में ग़ालिब की जो ग़ज़ल दी है, उस पूरी ग़ज़ल का हर शेर "नहीं आती" से ख़त्म होता है. यह रदीफ़ है.
 रदीफ़ से पहले के शब्दों में भी एकरूपता रखी जाती है,  जैसे - बर नहीं आती, नज़र नहीं आती, बात पर नहीं आती, रात भर नहीं आती. इसे काफ़िया कहते हैं. कच्चे शायर रदीफ़ का तो ध्यान रख लेते हैं पर कभी-कभी काफ़िया मिलाने में चूक जाते हैं. 

हिंदी और संस्कृत साहित्य में जिस तरह "समस्यापूर्ति" की परंपरा थी, उसी तरह उर्दू शायरी में भी "तरही मुशायरे" होते थे. शायरों के आगे एक मिसरा रख दिया जाता था, जिस पर वे पूरी ग़ज़ल कहते थे.
कैफ़ी आज़मी साहब कुल जमा ११ साल के थे, जब अपने बड़े भाई के साथ एक मुशायरे में गए. वहां उन्होंने अपनी लिखी ग़ज़ल पढ़ी लेकिन लोगों ने यही समझा कि बड़े भाई ने अपनी लिखी कोई ग़ज़ल पकड़ा दी है. बाद में इनका इम्तिहान लेने के लिए एक और मिसरा दिया गया - "इतना हँसो कि आँख से आँसू निकल पड़ें". उन्होंने वहीँ बैठे-बैठे ३-४ शेर कहे. बाद में वही ग़ज़ल न जाने कैसे बेगम अख्तर के हाथ लग गयी. उन्होंने उसे गाया और ग़ज़ल  सारे ज़माने में मशहूर हो गयी.
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े.

शेरो-शायरी की बात चले और बैत बाज़ी का ज़िक्र न हो तो कुछ अधूरा -सा लगता है. शेर का एक दूसरा नाम बैत भी है. इसीलिए ग़ज़ल का जो शेर सबसे ख़ास समझा जाता है, उसे हासिल-ए-ग़ज़ल या बैतुल-ग़ज़ल कहा जाता है. जब तक हमारे बच्चों को फ़िल्मी गानों की अन्ताक्षरी का रोग नहीं लगा था तब तक हम सब दोहों-चौपाइयों से अन्ताक्षरी या शेरों से बैत बाज़ी में समय बिताते थे. तब हमने जो कवितायेँ या शेर याद किये थे, वे आज तक हमारी स्मृतियों में वैसे ही सजीव हैं और अनायास हमें जीवन की कठिनाइयों से जूझने का साहस और धैर्य दे जाते हैं.
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