Wednesday, November 23, 2016

सिनेमा के रंग, बनारसी मस्ती के संग - (भारती सिनेमा)

आदरणीय काशीनाथ सिंह जी वाली अस्सी चौमुहानी से दुर्गाकुंड की ओर जाने वाली सड़क पर एक छोटा सा, नन्हा-मुन्ना सा, सिनेमा हॉल था - भारती। हमारे बचपन के दिनों (1962-1969) में भी वह बहुत पुराना हो चुका था और वहाँ सिर्फ़ रियायती दर पर पुरानी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। संयोग से वो हॉल मेरे घर के बहुत पास था। सड़क से जायें तो आधा किलोमीटर और अगर साधुबेला आश्रम वाली पतली गली पकड़कर लपक जायें तो बस चार मिनट।
भारती सिनेमा के इतने नज़दीक होने का प्रताप था कि हमने देव आनंद और राज कपूर की तमाम पुरानी फ़िल्में देख ली थीं। जाल, बाज़ी, जाली नोट, काला पानी, काला बाज़ार, आवारा, श्री 420, और ऐसी ही और कई। दिलीप कुमार की फ़िल्में देखने में हमारी दिलचस्पी कम थी मगर कभी-कभी माँ-मौसी का साथ देने के लिए देखनी पड़ती थीं। नानी हमारी, अशोक कुमार की बहुत ज़बरदस्त फ़ैन थीं इसलिये किस्मत और संग्राम भी देखीं। सबसे ज़्यादा ज़ुल्म तब हुआ, जब अशोक कुमार-सुचित्रा सेन की फ़िल्म ममता घूमती-घामती भारती में प्रदर्शित हुई और हमें एक सप्ताह में चार बार देखनी पड़ी।
यही एक हॉल था, जिसमें हमें "भले घर की लड़कियों की तरह" पूरे परिवार के साथ नहीं जाना पड़ता था, बल्कि किसी भी ममेरे फुफेरे भाई या बहन के साथ फिल्म देखने की आज़ादी थी। यह सत्य उजागर होने के बाद मेरे सभी भाइयों ने मुझे फिल्म दिखाने को अपना परम पुनीत कर्तव्य मान लिया था। भारती में बृहस्पतिवार को फ़िल्म बदलती थी इसलिये वे मंगलवार या बुधवार को तीन बजे से काफी पहले मेरे घर पहुँच जाते। आँखों-आँखों में बातें हो जातीं। उसके बाद मैं निहायत अफ़सोस से कहती -"हाय, मेरा ये फ़िल्म देखने का बड़ा मन था लेकिन कल से तो ये बदल जायेगी।"
भाई कहता - जाओ, आज देख आओ।
मैं कहती - किसके साथ जाऊँ ?
तो वह कर्तव्य की बलिवेदी पर न्योछावर होने वाले अंदाज़ में कहता - चलो, हम दिखा लाते हैं मगर अभी तुरंत चलना हो तो चलो, शाम को हमें कुछ ज़रूरी काम है।
और इससे पहले कि बड़े लोग हमारी मिलीभगत को भाँपे हम साधुबेला वाली गली से भाग जाते।
भारती में फिल्म देखने का एक बड़ा आकर्षण इंटरवेल में मिलने वाली खाने-पीने की चीज़ें भी थीं। इंटरवेल से दो-तीन मिनट पहले कोकाकोला और लेमन-सोडा बेचने वाले, बोतल खोलने वाली चाबी से बोतलों के गले पर प्रहार करते हुए अद्भुत ताल-तरंग पैदा करते थे। हालाँकि गला ख़राब होने के डर से हमें ठंडा पीने की अनुमति नहीं थी। (हम काफ़ी बेवक़ूफ़ बच्चे थे क्योंकि हमने कभी उस निषेधाज्ञा को तोड़ने की कोशिश नहीं की) दस पैसे की नमकीन की पुड़िया और चार आने की मूँगफली से अगले डेढ़ घंटे तक टूँगने के लिए पर्याप्त मसाला मिल जाता था। मूँगफली बेचने वाला एक ख़ास टेर लगाता था - ए, चीनिया बादाम बालु का भुना। मुझे अँधेरे में उसकी नक़ल करने में बहुत मज़ा आता था। कभी-कभी तो इतनी शानदार नक़ल करती कि लोग मेरी दिशा में मुँह करके चिनिया बादाम माँगने लगते।
भारती की बालकनी का फ़र्श लकड़ी का बना हुआ था। शायद पहले कोई कोल्ड स्टोरेज या गोदाम रहा होगा फिर किसी की व्यवसायी बुद्धि ने उसी ढाँचे को सिनेमा हॉल में परिवर्तित कर दिया था। बालकनी में बहुत कम लोग होते थे, इसलिए हमें ज़ोर-ज़ोर से हँसने और गानों के साथ सुर मिलाने की पूरी सुविधा होती थी। मुझे याद है कि एक मुसाफ़िर एक हसीना और फिर वही दिल लाया हूँ देखते हुए हम ओ पी नय्यर की धुनों में ऐसे बह गए थे कि कई बार नीचे बैठे लोगों की गालियाँ सुननी पड़ी थीं। नय्यर साहब की ढोलक बजते ही पैर ख़ुद-ब-ख़ुद ताल देने लगते थे। लकड़ी के फर्श पर हमारे जूते-चप्पल बजते, तो नीचे बैठे लोगों की खोपड़ी चटकने लगती और वे ख़ालिस बनारसी अंदाज़ में हमें अपनी उपस्थिति का बोध करा देते।
भारती सिनेमा की एक और ख़ासियत थी। वहाँ रविवार की सुबह अंग्रेज़ी पिक्चर दिखायी जाती थीं। उस दिन, उस शो में भारती का व्यक्तित्व और चरित्र बिलकुल बदल जाता था। उस दिन वह सरकारी अफ़सरों, डॉक्टरों-वकीलों और यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरों के मिलने-जुलने का साधन होती थी। उस दिन हम भी वहाँ पतली गली से न जाकर, कार में सवार होकर जाते थे। नानी बढ़िया सिल्क की साड़ी और नानाजी सूट पहनते थे।




अगर जेम्स बॉन्ड या हेरोल्ड रॉबिन्स के किसी उपन्यास पर बनी फ़िल्म हो तब तो कहना ही क्या। हमने वहाँ कम सेप्टेम्बर, गोल्डफिंगर, थंडरबॉल, कार्पेट बैगर्स, डॉ ज़िवागो, ज़ेपलिन, जैसी बहुत सारी अंग्रेज़ी फ़िल्में देखीं। गॉन विथ द विंड और स्पेस ओडिसी तो चारों शो में प्रदर्शित हुई थीं।
मेरा मौसेरा भाई दीपक, जो उन दिनों जयपुर में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था, छुट्टी में बनारस आया था। रविवार की सुबह भारती में पैटन फ़िल्म दिखाई जानी थी, जो दूसरे विश्व युद्ध के हीरो, अमेरिकी जनरल जॉर्ज एस पैटन पर आधारित थी।
बातों ही बातों में दीपक ने कहा - रविवार की सुबह अंग्रेज़ी पिक्चर देखने पहुँचने वाले सिर्फ़ शान बघारने के लिए जाते हैं, किसी को कुछ समझ में नहीं आता।
मुझे यह बात बिलकुल पसंद नहीं आयी। लगा कि वह मेरे शहर का और मेरा अपमान कर रहा है। ख़ूब बहस हुई। उसने कहा - मैं साबित कर दूँ, तब तो मानोगी?
मैंने कहा - ठीक है, मान लूँगी लेकिन पहले साबित तो करो।
हम फ़िल्म देखने गये। हमारे साथ दो ममेरे भाई भी थे। दीपक ने उनसे कुछ साठ-गाँठ कर रखी थी।
अचानक एक गम्भीर दृश्य के बीच दीपक ज़ोर से हँसा। कुछ और संवाद हुए, उसके बाद तीनों लड़के हँस-हँसकर लोट-पोट होने लगे। मेरे आँख तरेरने का भी कोई असर नहीं हुआ।
पूरी पिक्चर में ये लोग इसी तरह बेवजह हँसते रहे और धीरे-धीरे सारा हॉल दीपक के हर ठहाके में उसका साथ देने लगा। यहाँ तक कि अंत में पैटन की हत्या की योजना के बीच भी वह लोगों को हँसाकर ही माना।
आख़िरकार मुझे मानना ही पड़ा कि अंग्रेज़ी पिक्चर देखने वाला हर शख़्स अंग्रेज़ी का विद्वान नहीं होता।







Monday, November 21, 2016

सिनेमा के रंग, बनारसी मस्ती के संग


बनारस में फ़िल्म देखने का अपना ही मज़ा था। बालकनी या बॉक्स में बैठने के बावजूद आम जनों की टिप्पणियाँ कानों में पड़ती रहतीं और फ़िल्म का मज़ा दुगना कर देतीं।
जैसेकि एक बार मैं और मेरे तीन ममेरे भाई बनारस के ललिता सिनेमा में अनारकली देख रहे थे। अनारकली बीना राय को दीवार में चिनवाया जा रहा था। जैसे-जैसे अनारकली का चेहरा ईंटों से ढँकता जा रहा था, वैसे-वैसे उसकी करुण पुकार आँखों में नमी लाती जा रही थी -  "इसे मज़ार मत कहो, ये महल है प्यार का।"

शाहज़ादा सलीम बने प्रदीप कुमार घोड़ा दौड़ाते चले आ रहे थे।
तभी कोई सज्जन बोले - "जुल्फी नाहीं हिलत हौ, बे।"
सचमुच, इतनी तेज़ गति से दौड़ रहे घोड़े पर बैठे सलीम की क़रीने से सजी घुँघराली लटों का एक भी बाल बाँका नहीं हो रहा था।

इतने ग़मगीन माहौल में उनकी इस पैनी नज़र वाली टिप्पणी पर पूरा हॉल ठहाकों से गूँज उठा।
घोड़े से गिरकर, कोहनियों के बल ज़मीन पर घिसटते हुए प्रदीप कुमार जब किसी तरह नयी बनी दीवार तक पहुँचे, बहुत देर हो चुकी थी। "अलविदा, अलविदा" का क्रेसेंडो शांत हो चुका था। मशालें लिए राज-मिस्त्री वापस लौट रहे थे। प्रदीप उठकर दीवार तक पहुँचे और उस पर अपना सर दे मारा। नाकाम आशिक़ ने अपनी महबूबा हमेशा के लिए खो दी थी। सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी माज़ी के पन्नों में दफ़न हो गयी थी।
बनारस के लोग भला ऐसी नाइंसाफ़ी पर चुप कैसे रह सकते थे ? फ़ौरन राय दे डाली - "अबे, अबहीं मरल न होई। खनके निकाल ले, राजा।"
(अबे, अभी मरी नहीं होगी। खोदकर निकाल लो।)

चौक के चित्रा सिनेमा में बड़ी धूम-धाम और फ़ैनफ़ेयर के साथ बी.आर.चोपड़ा की वक़्त फ़िल्म रिलीज़ हुई। वो पहली मल्टी-स्टारर फिल्म थी। साधना और शर्मिला टैगोर के अलावा राज कुमार और सुनील दत्त के दीवानों की भी बनारस में कमी नहीं थी। "अपार भीड़ भरे" किसी सप्ताह में हम भी यह फ़िल्म देखने गए। फ़िल्म के एक दृश्य में सुनील दत्त फ़ोन पर साधना से बात कर रहे थे। बात क्या कर रहे थे, उन्हें अपने सपने के बारे में बता रहे थे - "मैंने एक ख्वाब सा देखा है"
साधना ने कहा - "ज़रा मैं भी सुनूँ "
-"सुनके शर्मा तो न जाओगी?"
- "नहीं, तुमसे नहीं।"
सुनील बताने लगे - "मैंने देखा है कि फूलों से लदी शाखों में तुम लचकती हुई यूँ मेरे क़रीब आयी हो।"
परंपरावादी बनारस के बाशिंदे दोनों की इस क़ुरबत के नज़ारे को हैरान-परेशान, साँस रोके देख रहे थे ।
सुनील का सपना पूरा हुआ तो बनारस वालों ने एक लंबी साँस छोड़ी।


तब तक साधना बोल उठीं - "मैंने भी एक ख़्वाब सा देखा है.........
हीरो का सपना तो किसी तरह बर्दाश्त कर लिया था लोगों ने लेकिन हीरोइन भी सपना देखे, यह हज़म करना मुश्किल था। हॉल में बैठे उनके कोई शुभचिंतक बोले - "ल, इहौ चललिन खाब देखे। ए महारानी तू रहे द। घरे जो।"
(लो, यह भी चलीं ख़्वाब देखने। ऐ महारानी! तुम तो रहने ही दो। जाओ घर जाओ।)

एक और दृश्य उभर रहा है, जिसकी नायिका मेरी नानी थीं। दीपक सिनेमा में शशि कपूर -शर्मिला टैगोर अभिनीत आमने-सामने फ़िल्म प्रदर्शित हुई। हम लोगों ने किसी फिल्मी पत्रिका में पढ़ लिया था कि उसमें शर्मिला ने टू-पीस बिकिनी पहनी है। लेकिन घर में इस बात का ज़िक्र नहीं कर सकते थे, वरना कभी देखने को नहीं मिलती। बल्कि घर में तो यह बताया कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की भतीजी फ़िल्मों में काम कर रही है। सत्यजीत रे की फ़िल्म में भी काम कर चुकी है। इन दो बड़े नामों के बीच बिकिनी की खबर छिपाकर हम फिल्म देखने पहुँच गये। मैं, मेरी सहपाठी मित्र वीणा और मेरी नानी। बालकनी में हमारे अलावा शायद ही कोई महिला मूर्ति रही हो। पूरी बालकनी यूनिवर्सिटी के लड़कों से भरी थी।
आख़िरकार वह सीन भी आ ही गया जब शर्मिला बिकिनी में नज़र आती हैं।

मैं और वीणा कनखी से नानी को देख रहे थे कि अब फटा बम ! लेकिन शांति बनी रही। नानी ने परदे की ओर देखा और धिक्कार के से लहजे में कहा - "शिव -शिव।"
बालकनी में एक समवेत निःश्वास गूँजा और फिर कोने-कोने से लोग अपने-अपने इष्टदेव को याद करने लगे।
"राम-राम"
"हरे-हरे"
"नारायण-नारायण"
नानी ने गर्दन घुमाकर उन तमाम पुण्यात्मा जीवों को देखा और पास बैठे बालक से बोलीं - "बताओ, इतने बड़े ख़ानदान की लड़की --और क्या बाप-दादों का नाम रोशन कर रही है! अरे जब ऐसे-ऐसे कपडे पहनेंगी तो तुम लोग देखोगे नहीं क्या?"
लड़कों को आनंद आ गया। सबके सब - "जी माताजी, हाँ माताजी" में लग गये।
और मैं और वीणा गर्दन झुकाये हँसते रहे।
  

Thursday, July 21, 2016

पापा की पुत्रिका



पापा ने ही बंकिम बाबू के वन्दे मातरम् से लेकर मुझे शुभ्रा नाम दिया था। पुकारने का नाम मनु वैसे तो नानी ने रखा था, मगर उसका शुद्धतम रूप में उपयोग केवल पापा करते थे। बाकी लोग उसे अपनी-अपनी मुख-सुविधा के अनुसार बदल लेते थे। जैसेकि नानी मुझे हमेशा मानू बुलाती रहीं। नानाजी ने मनुआ बुलाना शुरु किया तो बहुत सारे लोग उन्हीं का अनुकरण करने लगे। अम्मा ने ज़रा हटकर मनिया कर दिया। कवयित्री हैं, सो बिटिया के लिये लोरी लिखी -

सोये सोये रे मेरी मनिया, मेरी मनिया को आये निंदिया।

कुछ बड़ी हुई तो देखा कि मेरी पर-ननिहाल में, यानीकि मेरी अम्मा की ननिहाल में मुझसे छोटे बच्चों की पूरी क्रिकेट टीम खड़ी हो चुकी थी। रिश्ते मे तो वो सब मेरे मामा और मासी थे लेकिन डील-डौल से मैं उन सब पर भारी पड़ती थी, इसलिये उन सब ने मुझे मन्नू जिज्जी बुलाने में ही अपनी ख़ैरियत समझी। गेंदतड़ी, आइस बाइस, या ऊँच नीच खेलते हुए ये नाम ज़रा लंबा पड़ता था, इसलिये इसका शार्ट वर्ज़न मनुज्जी ज़्यादा प्रचलित हो गया। अब उन सबके पति अथवा पत्नियों और बच्चों को मिलाकर लगभग साठ लोग इसी प्रचलित नाम का इस्तेमाल करते हैं।

मज़े की बात तब हुई जब मेरी होने वाली बहू ने बताया कि उसकी माँ इन्द्राणी का भी पुकारने का नाम यही है - मानू, जबकि उनकी छोटी बहनों में से एक शानू हैं और दूसरी अनु। तो अब रिश्ता कुछ इस तरह बनता है कि हमारे शानू श्रेयस की मासी सास शानू हैं, और माँ और सास दोनों मानु।

लेकिन बात शुरु हुई थी पापा से......पापा अगर आगे-पीछे बेटा लगाये बग़ैर सिर्फ़ मनु कह कर पुकारते तो मैं डर जाती थी क्योंकि इस तरह बुलाने का साफ़ मतलब था कि मेरी कोई ग़लती पकड़ी गयी है। मैं पापा के पास सिर्फ़ छुट्टियों में जाती थी और बराबर इसी कोशिश में रहती थी कि उन्हें नाराज़ न करूँ। वे मुझसे नाराज़ होते भी नहीं थे। बस, उनकी नज़र में एक ही अक्षम्य अपराध था - चीज़ों को उनकी निर्धारित जगह पर न रखना। उनकी कलम, कंघी, चाबी, हर चीज़ की जगह तय होती थी। काम में लेने के बाद चीज़ को ठीक उसी जगह, उसी तरह रख दो तो कोई झंझट नहीं थी, वरना वे बहुत नाराज़ होते थे और फिर बहुत देर तक यथास्थान वाला भाषण सुनाते थे।

पापा जब कभी बहुत दुलार में आते तो मुझे अपना भोंदू बच्चा कहते। ज़्यादा ही मूड में होते तो गा-गाकर भोंदू का रूप चलाते - भोंदु - भोंदू - भोंदव:।

और मैं उनके दुलार से निहाल होते हुए भी ऊपर-ऊपर से झगड़ा करती - "आपने फिर हमें भोंदू कहा। जाइये, हम आपसे बात नहीं करते।"

और वे हँसकर कहते - 'तुम्हें कहाँ कहा? हम तो भोंदू का रूप याद कर रहे हैं।"

और अगले इतवार को फिर यही संवाद दोहराया जाता।

कभी-कभी पापा मुझे "पुत्रिके" कह कर भी बुलाते। यह संबोधन हमेशा किसी गंभीर बातचीत का संकेत होता, जिसमें मेरी राय की ज़रूरत होती। मसलन इस बार गर्मी की छुट्टियों में कहाँ जाना है या अगली गाड़ी कौन सी लेनी है, ऐसे किसी अहम मुद्दे पर जनमत संग्रह कराना होता तो पुत्रिके कह कर आवाज़ लगाते।

अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले जयपुर गये थे और वहाँ से कुछ पुस्तकें लेकर आये थे। उनमें से दो मुझे सौंपते हुए बोले - ये लो। शानू आजकल मधुशाला गाता है, तो यह उसे दे देना। और यह मनुस्मृति मैं तुम्हारे लिये ले आया हूँ। पुरानी वाली फट रही थी।

जयपुर से लौटने के तीसरे दिन उन्हें ज़बरदस्त ब्रेन हैमरेज हुआ और अगले ही दिन चले भी गये। क्या करना है क्या नहीं, मैं कुछ जानती नहीं थी और कोई बताने वाला भी नहीं था। मुझे लगा कहीं वे इसीलिये तो मुझे मनुस्मृति नहीं पकड़ा गये थे कि मैं इस भटकन में राह तलाश सकूँ। मैं गीता का दूसरा अध्याय पढ़ने के बाद मनुस्मृति लेकर बैठ गयी। श्राद्ध वाला अध्याय पढ़ना शुरु किया तो देखा, किसी व्यक्ति की एक ही संतान- कन्या हो तो उसे पुत्रिका कहते हैं और उसके पुत्र यानी पुत्रिका-पुत्र को नाना के दाहकर्म से लेकर पूरे अंतिम संस्कार करने का अधिकार होता है।

मन में सवाल उठा क्या पापा यह सब जानते थे? क्या इसीलिये वे मुझे पुत्रिका बुलाते थे?

Saturday, July 16, 2016

झूला पड़ा कदंब की डारी



मीना कुमारी की एक फ़िल्म आई थी - बहू बेगम, जिसमें वो और उनकी सहेलियाँ झमाझम बरसते पानी में झूला झूल रही थीं।

पड़ गए झूले सावन रुत आई रे।

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संयोग की बात है कि मैंने यह फ़िल्म ऐसी उम्र में देखी थी, जब सहेलियों के साथ सैर-सपाटा, मौज-मस्ती कर पाना जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा और सबसे बड़ी उपलब्धि लगती थी। मत भूलिये यह साठ का दशक था, जब छोटे शहरों की लड़कियों पर दुनिया भर की पाबंदियाँ होती थीं। मेरा परिवार तो काफ़ी आधुनिक चिंतन वाला परिवार था, फिर भी घर के ठीक सामने रहने वाली वीणा के घर नोट्स लेने जाना हो तो नौकर साथ जाता था और साथ लेकर ही लौटता था। ऐसे में सहेलियों के साथ झूला झूलने का अवसर सिर्फ स्कूल के अंदर ही मिल पाता था और वहाँ दाइयाँ हर वक़्त डराती रहती थीं -

ऐ! ऐ! चला लोगन, भीजा जिन। नाहिं, अबहीं जाइके बाई जी (प्रिंसिपल लीला शर्मा जी) के बताईल।

लीला दी ने शायद ही कभी किसी को डाँटा हो, फिर भी उनका ख़ौफ़ ऐसा था कि हम फ़ौरन झूला छोड़कर ग़ायब हो जाते थे।

ऐसे में बार-बार ध्यान आता था कि गोकुल-बृंदावन में कैसा आनंद रहा होगा जहाँ गोपी-ग्वाल, राधा-कृष्ण मिलकर झूलते थे और कोई उन्हें प्रिंसिपल के नाम से डराता भी नहीं था।


कदम्ब पर झूल रहीं राधे जू, साँवरिया दे रह्यो झोंटा।







कदम्ब के पेड़ का राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंग में बड़ा महत्त्व है। मैथिल कवि विद्यापति का पद है -

तट तरंगिनि, कदम कानन, निकट जमुना घाट। उलटि हिरइत उलटि परली, चरन चीरल काँट।। 
राधा याद कर रही हैं कि उस दिन यमुना के घाट पर, कदम्ब के वन में उलट कर कृष्ण को क्या देखा कि जैसे मैं स्वयं ही उलट गयी। चरण में काँटा चुभ गया और मन घायल हो गया।

​लेकिन कामदेव ने अकेले राधा को ही निशाना बनाया हो, ऐसा नहीं है। सखियाँ कहती हैं - तुम्हीं नहीं हो, कान्ह भी तुम्हारे लिए पागल हैं। तुम्हारे गुणों पर लुब्ध हो गए हैं। कहीं और जा रहे हैं, पर आँखें इधर ही लगी हैं। ऐसे लुभाए नयनों को हटा भी कैसे सकते हैं। वे अगर नटवर नागर हैं तो तुम भी उनसे कम नहीं, बराबर ही हो। तुम दोनों जैसे एक ही डाल पर खिले हुए दो फूल हो। कवि विद्यापति कहते हैं कि कामदेव ने एक ही तीर से दो जीवों को मार दिया है।
ये सखि ये सखि न बोलहु आन, तुअ गुन लुबुधलनि अब कान।
अनतहु जाइत इतिहि निहार,लुबुधल नयन हटाये के पार।
से अति नागर तों तसु तूल, याक बल गाँथ दुई जनि फूल।
भन विद्यापति कवि कंठहार, यक सर मन्मथ दुई जीव मार।
कवियों की बात मानें तो पाण्डवों के इंद्रप्रस्थ से कृष्ण के वृंदावन तक पूरा का पूरा यमुना तट ताल, पियाल, तमाल और कदम्ब के घने वनों से भरा हुआ था। राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन इन पेड़ों के वर्णन के बिना अधूरा है। जयदेव और विद्यापति से लेकर सूरदास और मीरा तक सभी इनका नाम लेते नहीं थकते। इन वनों के आस-पास रहने वाले इन्हें ख़ूब अच्छी तरह जानते-पहचानते रहे होंगे।तब स्कूली बच्चों को इनके फोटो और डिस्क्रिप्शन ढूंढ़कर लाने का हॉलिडे होमवर्क नहीं मिलता होगा और न पर्यावरण-प्रेमियों को इको सिस्टम बिगड़ने की चिंता करनी पड़ती होगी। आज ज़रा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों से पूछकर देखिये,उनमें से कितने कदम्ब का पेड़ पहचान सकते हैं।

लगभग पच्चीस वर्ष पहले की बात है। दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र से सुबह संस्कृत का साप्ताहिक कार्यक्रम प्रसारित होता था। मेरा भी उसमें थोड़ा-सा योगदान रहता था। हमने मेघदूत पर आधारित कुछ कड़ियाँ प्रसारित करने की सोची। श्लोकों के सस्वर पाठ की रिकॉर्डिंग हो गयी। उन पर विज़ुअल डालने के लिए बादल-बरसात, खेत-खलिहान, फूल-पत्ते, सारस-बगुले के स्टॉक-शॉट्स मिल गये, लेकिन कदम्ब नहीं मिला। और मुझे ज़िद्द चढ़ गयी कि बिना कदम्ब के मेघदूत प्रसारित नहीं होगा। प्रोड्यूसर दुर्गावती सिंह समझाती रहीं कि सरकारी तंत्र में ऐसे ही काम करना पड़ता है। 

नहीं मिलता कदम्ब तो जाने दो, किसी और पेड़ को डिफ्यूज़ करके काम चला लेंगे। मैंने उनसे एक दिन की छुट्टी माँगी और अपनी मारुति लेकर कदम्ब की तलाश में निकल पड़ी। न जाने कितनी नर्सरी, पार्क और लाइब्रेरी छान मारीं लेकिन कहीं कदम्ब नहीं मिला। कुछ खाने के लिए बंगाली मार्किट पहुँची तो वहाँ मुझे अपना बचपन का साथी कबीर मिल गया। लेडी श्री राम कॉलेज में मेरी माँ हिंदी और उसकी माँ उर्दू पढ़ाती थीं। कॉलेज कम्पाउंड में हमारे घर भी पास-पास थे। 

अम्मा के रिटायर होने पर हम कालकाजी चले गए थे मगर वे लोग अब भी वहीँ रहते थे। गप-शप के बीच जब मैंने उसे बताया कि मैं सुबह से कदम्ब का पेड़ तलाश कर रही हूँ तो उसने पूछा कैसा दीखता है। मैंने उसे मेघदूत का श्लोक सुनाया, जो मुझे बहुत प्यारा लगता है -
त्वत्सम्पर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः
कदम्ब के फूल ऐसे लग रहे थे जैसे बादल के आने से पुलक उठे हों, रोमांचित हो गए हों।
कबीर ने मुझे टोककर पूछा - लड्डू जैसा फूल होता है क्या?
मैंने कहा - हाँ।
बोला - बड़े-बड़े, लाइट ग्रीन कलर के पत्ते होते हैं ?
मैंने कहा - हाँ भाई हाँ।
कहने लगा - तो एल. एस. आर. में है न। कॉलेज ऑडिटोरियम के पीछे, जहाँ हम लोग खेला करते थे, ऐसे दो पेड़ हैं।

लो! इसे कहते हैं "गोद में लड़का नगर ढिंढोरा"! मैं सुबह से दुनिया-जहान की ख़ाक छानती फिर रही थी और कदम्ब घर के पिछवाड़े ही मौजूद था।

अगले दिन कैमरा टीम को लेकर गयी और वीडियो रिकॉर्डिंग कर लायी। इस मेहनत के बदले मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिला लेकिन मन कदम्ब के फूलों सा ही पुलकित हो उठा।

Wednesday, July 13, 2016

अविस्मरणीय रेलयात्रा

भगवान बुद्ध ने अच्छा किया था कि अपरिग्रह को सत्य, अहिंसा, अस्तेय और ब्रह्मचर्य के बराबर महत्त्व दिया था। अपने को कोई नुकसान न हो रहा हो तो हम हिंदुस्तानी अमूमन सच बोल लेते हैं, अहिंसा का पालन कर लेते हैं, चोरी से भी बच लेते हैं और देर-सबेर ब्रह्मचारी भी बन जाते हैं। एक ही काम है जिसमें हम कच्चे हैं, और वो है अपरिग्रह। किसी भी घर में जाकर देखिये - पुरानी डायरियों से लेकर गाड़ी के पुराने टायर तक तमाम चीज़ें कहीं कोने-अँतरे में पड़ी मिल जायेंगी। यह हमारा राष्ट्रीय अवगुण है कि हम कभी कोई चीज़ फेंकते नहीं, इस उम्मीद में सहेजकर रख लेते हैं कि कभी न कभी काम आ सकती है।

किसी और को क्या दोष दूँ, मैं ख़ुद भी इस मर्ज़ की शिकार हूँ। टूटी मालायें, बटन, साड़ियों के फ़ॉल, पिछले साल की राखियाँ, शादियों के कार्ड से उखाड़े गणेश, और यहाँ तक कि पिछली दीवाली के जले हुए दिये तक मेरे संग्रह में मिल जायेंगे। हाँ, यह ज़रूर है कि मैं जल्द ही उनके इस्तेमाल के तरीक़े ढूँढ लेती हूँ।



पहचान रहे हैं? दीवाली पर इन मटकियों में दीप जले थे पर अब ये पौधों के गमले बन गये हैं। कुछ इसी तरह का इस्तेमाल मैंने सुराही के स्टैंड का भी किया है। ये मेरे बचपन की यादगार है, जिसे मैं अपने हर नये घर में साथ रखती आयी हूँ। ऐसा लगता है कि अब ग्रेटर नॉएडा का यही घर इसका अंतिम पड़ाव होगा इसलिये इसे भी हीले से लगा दिया है।




मेरे नानाजी उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर थे। अपने पूरे सेवाकाल में कार या जीप से दौरे करते रहे लिहाज़ा ज़रूरत से ज़्यादा सामान साथ लेकर चलने की आदत थी। ये जूता भी रख लो, ये छड़ी भी रख लो, पूजा वाला पीताम्बर भी रख लो। जब तक ये छिटपुट चीज़ें गाड़ी में भर ली जाती थीं, तब तक तो सब कुछ ठीक रहा। लेकिन जब रेलयात्रा में भी उनका यही हाल रहा, तब बहुत मुश्किलें पेश आयीं। नानाजी, नानी और मैं, तीन लोगों के टिकट के साथ कम से कम चौदह नग सामान चलता था। एक आदमी की ड्यूटी हर स्टेज पर इन नगों की गिनती करने की रहती।



पूरे नवाबी ठाठ-बाट से सामान बाँधा जाता। स्टील के ट्रंक और लपेटकर बाँधे जाने वाले बिस्तरबंद निकाले जाते। खाना ले जाने के लिये स्टील का चार डिब्बों वाला टिफ़िन कैरियर और पानी के लिये सुराही स्टैंड स्टोर रूम से ढूँढ़कर निकाले जाते। नानी के ठाकुर जी के लिये एक लकड़ी की सन्दूकची थी, जिसमे हवा के लिये बड़े आर्टिस्टिक छेद कटे हुए थे। उस सन्दूकची में कई गद्दे बिछाकर ठाकुरजी लिटाये जाते थे। सन्दूकची को लाल रेशमी कपडे से बाँधकर ले जाया जाता था ताकि हवा का प्रवेश हो, छूत का नहीं। नानी यात्रा में खाना नहीं खाती थीं इसलिए प्रचुर मात्रा में बेसन के लड्डू और मठरी बनाये जाते, जो पीतल के बड़े से कटोरदान में रखकर ले जाये जाते थे। पानदान, बेटियों के यहाँ दी जाने वाली बनारसी मिठाई और उड़द की बड़ियाँ तक तो मैं बाँध ले जाती थी लेकिन जब बात उनकी छड़ी और छतरियों की आती, तब मुझे विरोध करना ही पड़ता था।

आपको क्या लगता है, अम्मा के पास छाता नहीं होगा? - मैं झींकती।

अरे बेटा, एक छाता रखने से कौन ट्रेन का बोझ बढ़ जायेगा। - वे तर्क देते

बहस आगे बढ़कर विकराल रूप न ले ले, इस डर से नानी मध्यम मार्ग सुझातीं - अलग नग नहीं बनेगा, होल्डाल के बीच में डाल देना।

आख़िरकार नियत दिन-तारीख को चौदहों नग के साथ यात्रा शुरू होती और अगले दिन सुबह दिल्ली पहुँचकर ख़त्म भी हो जाती। लेकिन मेरी मुसीबत ख़त्म नहीं होती क्योंकि दिल्ली पहुँचते ही उन्हें अपना स्वेटर, पैर ढँकने का शॉल, और जप की माला याद आनी शुरू हो जातीं।

वैसे मेरे जीवन की सबसे अविस्मरणीय यात्रा थी लखनऊ से मुंबई तक। पापा का तबादला लखनऊ से पणजी हुआ। गोवा कुछ समय पहले ही पुर्तगालियों के शासन से मुक्त हुआ था, सो सबसे पहले उसे देखने के घमंड में चूर थी मैं। ऊपर से सोने पर सुहागा यह कि अपनी सब सहेलियों से पहले बम्बई जा रही थी।




ज़्यादातर सामान लगेज वैन में बुक किया जा चुका था। हमारे साथ सिर्फ ज़रूरी कपड़े भर थे। गर्मी के दिन थे इसलिए फर्स्ट क्लास कूपे में एक बड़ी-सी अल्युमिनियम की ट्रे रखी गयी थी, जैसी कूलर में पानी भरने के लिए होती है। इसमें बर्फ की बड़ी सी सिल रखी गयी थी ताकि ठंडक रहे। ट्रे में लखनऊ की तमाम सौगातें - दसहरी आम, ख़रबूज़े, ककड़ियाँ भी जमा दी गयी थीं। मैं महा थ्रिल्ड! खाना-वाना खाने के बाद ऊपर की बर्थ पर लेटकर अपनी बाल पत्रिकायें पढ़ते-पढ़ते कब सो गयी, पता ही नहीं चला। तभी अम्मा के बहुत घबराये हुए स्वर से नींद खुली। कह रही थीं - बेटा उठ! मनु उठ! पापा छूट गये हैं और मुझसे ये चेन नहीं खिंच रही।

देखा तो अम्मा पूरा ज़ोर लगा रही थीं लेकिन गाड़ी रोकने वाली ज़ंजीर टस से मस नहीं हो रही थी। मेरे सर के पास ही थी वो ज़ंजीर। बस, मैंने ऊपर की बर्थ से कलैया खायी और ज़ंजीर पकड़ कर लटक गयी। तब तक गाड़ी की स्पीड कम होने लगी थी। कुछ ही देर में सुराही लिये पापा आ गये। उन्होंने बताया कि गाड़ी चल दी तो वे किसी और डिब्बे में चढ़ गये थे और जब गाड़ी रुकी तो वापस आ गये। शायद किसी ने चेन खींच दी है।

अम्मा ने रुंआसे स्वर में कहा - किसी ने नहीं, हमने ही खींची है। बल्कि मुझसे अकेले नहीं खिंची तो मनु ने भी मदद की। पापा हँसते हुए आये थे पर यह सुनकर एकदम गम्भीर हो गये। वहाँ साफ़ लिखा हुआ था - बिना कारण ज़ंजीर खींचना दंडनीय अपराध है।

तभी रेल विभाग के कई कर्मचारी चेन खींचने वाले की ख़बर लेने आ पहुँचे। अम्मा ने उनसे कहा कि मेरे पति छूट गए थे इसलिए मैंने चेन खींची। आख़िर ऐसी ही एमर्जेंसी के लिए तो चेन लगाई गयी है।

लेकिन रेलवे वाले इसे एमर्जेंसी मानने को तैयार ही नहीं थे। काफ़ी देर की बहसा-बहसी और कई आम-खरबूजों का भोग लगाने के बाद वे चेन खींचने को दंडनीय अपराध ना मानने पर राज़ी हो गये। वरना शायद मुझे और अम्मा को बम्बई की सैर के बजाय इटारसी की जेल की सैर करनी पड़ती।

Thursday, July 07, 2016

जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे


आषाढ़ महीने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलते हैं, भाई-बहन के साथ रथ पर सवार होते हैं और वर्षा ऋतु का आनंद लेने निकल पड़ते हैं। उनकी इस पिकनिक में उनकी पत्नी साथ नहीं होतीं लेकिन लाखों की संख्या में उनके अनुयायी साथ होते हैं। अनुयायी का शाब्दिक अर्थ ही है - साथ चलने वाला - उर्दू में जिसे कहते हैं हमसफ़र।

कैसी अजीब बात है? घूमने निकले हैं लेकिन जीवन-साथी को साथ लेकर नहीं चल रहे। साथ में लिया है बड़े भाई को, लाड़ली बहन को और हज़ारों-हज़ार अनुयायियों को।



बचपन से ही ऐसे थे। घर में दूध-दही के मटके भरे रहते थे लेकिन उन्हें तो दूसरों के घर से चुराकर खाना भाता था। वो भी अकेले नहीं, सब सखाओं के साथ। माखन चुराने, खाने और लुटाने की ऐसी बान पड़ी कि गोपियों ने माखनचोर नाम ही रख दिया। पकडे जाते तो भोली सूरत बनाकर कह देते-


मैं बालक बँहियन को छोटो छींको केहि बिधि पायो
ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुख लपटायो।
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। ​

अब इस तरह की शरारतें और बहानेबाज़ी कोई भला आदमी अपने बाल-बच्चों के सामने नहीं कर सकता न, इसलिए उन्हें साथ लेकर नहीं आये हैं। भाई-बहन सब कुछ जानते हैं, इसलिए उन्हें साथ ले लिया है। और साथी न हों तो शरारतों का मज़ा ही क्या? इसलिए खुला निमंत्रण है, जिसे संग आना हो आओ। साथ चलो। रथ चलाओ। रथ पर आकर मुझसे गले मिलो। बरसात में भीगो। पकवान खाओ। बीमार पड़ो तो खिचड़ी खाओ। पूरी मस्ती करो। क्योंकि एक बार मंदिर के अंदर पहुँच गया तो फिर भगवान होने की, जगन्नाथ होने की मर्यादा निभानी पड़ेगी। अदब-क़ायदे से रहना पड़ेगा। जो भोग लगाया जायेगा, वही खाना पड़ेगा। जिस समय जो करने को कहा जायेगा, वही करना पड़ेगा। तब ऐसा निर्बाध आनंद कहाँ मिलेगा।



मंदिर में दर्शन मिलते हैं। साहचर्य नहीं मिलता। तभी तो बंधन तोड़कर भागे हैं। गुंडिचा मंदिर जायेंगे। मौसी के घर जायेंगे। राजसी भोग नहीं, आम लोगों की तरह 'पोड़ा पीठा' खायेंगे। रूठी हुई पत्नी मंदिर में नहीं घुसने देगी तो अपराधियों की तरह रात भर बाहर खड़े रहेंगे। तरह-तरह से उसे मनाने की कोशिश करते रहेंगे। और जब वो रसगुल्ले की माँग करेगी तो उनके सारे साथी दौड़ पड़ेंगे। जहाँ कहीं रसगुल्ला मिलेगा, सीधा जगन्नाथ जी के हाथ में पहुंचा दिया जायेगा कि लो भैया, अपनी रूठी पत्नी को मना लो। दोस्त ऐसे ही तो एक दूसरे के काम आते हैं। ​

तो मेरी आपको यही सलाह है कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने हों तो वर्ष का कोई भी दिन-महीना चुन लीजिये पर अगर सखा कृष्ण से भेंट करना चाहते हैं तो रथयात्रा के समय उनके साथ लग जाइये। मिल ही जायेंगे कहीं न कहीं।


Monday, June 20, 2016

असाढ़ का पहला दिन



कई बरसों बाद ऐसा सुयोग आया है कि जेठ महीने की पूर्णिमा का चाँद देखने छत पर निकली तो लू के थपेड़ों ने नहीं, शीतल मंद बयार ने शरीर का ताप मिटाया। वैसे कल रात चाँद पूरे से थोड़ा सा कम, यानी चौदहवीं का चाँद लग रहा था लेकिन पोथी-पत्रे के चक्करों से बचने के लिए मैंने कल पूर्णिमा और आज जेठ बदी प्रतिपदा मान ली है।

तो कल की ठंडी हवाओं से उम्मीद बँध गयी थी कि शायद कालिदास के शब्दों को सही साबित करते हुए असाढ़ का पहला दिन घन-घटाओं से लैस होगा।
आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।
कुबेर के शाप के कारण एक साल के लिए अपने घर से और अपनी प्रिया से दूर विरही यक्ष ने आषाढ़ के पहले दिन बादलों से लिपटी पहाड़ की चोटी को देखा, तो उसे ऐसा लगा जैसे कोई हाथी खेल-खेल में अपने सर की टक्कर से उसे गिराने की कोशिश कर रहा हो।



मैं भी कोई ऐसा ही नज़ारा देख पाने की आस में सुबह से अपने आठवीं मंज़िल के घर के खिड़की-दरवाज़े खोले बैठी थी। लेकिन दस बजते-न-बजते सूरज की वक्र दृष्टि का प्रहार झेलना कठिन हो गया, तब निराश होकर खिड़कियाँ बंद कर दीं और परदे खींच कर नीम अँधेरा कर लिया।

तीन बजे से फिर ठंडी हवा के झोंके आने शुरू हुए। आसमान भी साँवला-सलोना लग रहा था। बड़ी देर तक, बिमल दा की सुजाता का गीत गुनगुनाती बालकनी में खड़ी रही।

काली घटा छाये, मोरा जिया तरसाये, ऐसे में कहीं कोई मिल जाये
बोलो किसी का क्या जाये रे, क्या जाये रे, क्या जाये?



अब ज़ाहिर है कि साठ साल की उम्र में किसी ऐसे का इंतज़ार तो था नहीं जो "मेरे हाथों को थामे, हँसे और हँसाये, मेरा दुःख भुलाये"। इंतज़ार सिर्फ़ बरखा रानी का था कि वो आये, मुझे भिगाये और घमौरियों का दुःख भुलाये। लेकिन वो भी अजब ठसक में है। दो-चार बूँदें टपका कर अपने आस-पास होने का एहसास करा रही है लेकिन खुलकर सामने नहीं आ रही।

मुझे याद आ गयी मोहन राकेश की मल्लिका। वह भी आषाढ़ के एक दिन पर्वत प्रदेश की वर्षा में भीग कर आयी थी।

" चारों ओर धुँआरे मेघ घिर आये थे। मैं जानती थी वर्षा होगी फिर भी मैं घाटी की पगडण्डी पर नीचे उतरती गयी। एक बार मेरा अंशुक भी हवा ने उड़ा दिया। फिर बूँदें पड़ने लगीं।
बहुत अद्भुत अनुभव था माँ, बहुत अद्भुत। नील कमल की तरह कोमल और आर्द्र ! वायु की तरह हल्का और स्वप्न की तरह चित्रमय !"

बारिश में भीगती मल्लिका की कल्पना करने चलें तो सबसे पहले गुरु फिल्म की ऐश्वर्या राय सामने आ खड़ी होती हैं। ठीक भी है! विश्वस्तरीय कवि की कल्पना कोई विश्व सुंदरी ही तो होगी न?
बरसो रे मेघा-मेघा बरसो रे मेघा-मेघा बरसो रे मेघा बरसो।



बारिश में भीगना मुझे भी बहुत पसंद है। जमकर बरसात हो रही हो तो बंद कमरे में बैठना मेरे लिए असह्य हो जाता है।


​बारिश के मौसम में हमेशा खादी या हैंडलूम के कुर्ते पहनती हूँ, न जाने कब भीगने का मौक़ा मिल जाये। मौक़ा मिल गया तो ठीक, वरना खुरपी से खोदकर निकाल लेती हूँ।

नहीं समझे ? अरे भाई, बाहर रखे गमलों की साज-सँभाल करने पहुँच जाती हूँ। फिर मैं और मेरे पेड़-पौधे मिलकर बरसात का आनंद लेते हैं, जैसे ये दोनों ले रहे हैं -
सोना करे झिलमिल-झिलमिल, रूपा हँसे कैसे खिल-खिल
अहा अहा वृष्टि पड़े टापुर-टुपुर, टिप-टिप टापुर-टुपुर।
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