Thursday, July 21, 2016

पापा की पुत्रिका



पापा ने ही बंकिम बाबू के वन्दे मातरम् से लेकर मुझे शुभ्रा नाम दिया था। पुकारने का नाम मनु वैसे तो नानी ने रखा था, मगर उसका शुद्धतम रूप में उपयोग केवल पापा करते थे। बाकी लोग उसे अपनी-अपनी मुख-सुविधा के अनुसार बदल लेते थे। जैसेकि नानी मुझे हमेशा मानू बुलाती रहीं। नानाजी ने मनुआ बुलाना शुरु किया तो बहुत सारे लोग उन्हीं का अनुकरण करने लगे। अम्मा ने ज़रा हटकर मनिया कर दिया। कवयित्री हैं, सो बिटिया के लिये लोरी लिखी -

सोये सोये रे मेरी मनिया, मेरी मनिया को आये निंदिया।

कुछ बड़ी हुई तो देखा कि मेरी पर-ननिहाल में, यानीकि मेरी अम्मा की ननिहाल में मुझसे छोटे बच्चों की पूरी क्रिकेट टीम खड़ी हो चुकी थी। रिश्ते मे तो वो सब मेरे मामा और मासी थे लेकिन डील-डौल से मैं उन सब पर भारी पड़ती थी, इसलिये उन सब ने मुझे मन्नू जिज्जी बुलाने में ही अपनी ख़ैरियत समझी। गेंदतड़ी, आइस बाइस, या ऊँच नीच खेलते हुए ये नाम ज़रा लंबा पड़ता था, इसलिये इसका शार्ट वर्ज़न मनुज्जी ज़्यादा प्रचलित हो गया। अब उन सबके पति अथवा पत्नियों और बच्चों को मिलाकर लगभग साठ लोग इसी प्रचलित नाम का इस्तेमाल करते हैं।

मज़े की बात तब हुई जब मेरी होने वाली बहू ने बताया कि उसकी माँ इन्द्राणी का भी पुकारने का नाम यही है - मानू, जबकि उनकी छोटी बहनों में से एक शानू हैं और दूसरी अनु। तो अब रिश्ता कुछ इस तरह बनता है कि हमारे शानू श्रेयस की मासी सास शानू हैं, और माँ और सास दोनों मानु।

लेकिन बात शुरु हुई थी पापा से......पापा अगर आगे-पीछे बेटा लगाये बग़ैर सिर्फ़ मनु कह कर पुकारते तो मैं डर जाती थी क्योंकि इस तरह बुलाने का साफ़ मतलब था कि मेरी कोई ग़लती पकड़ी गयी है। मैं पापा के पास सिर्फ़ छुट्टियों में जाती थी और बराबर इसी कोशिश में रहती थी कि उन्हें नाराज़ न करूँ। वे मुझसे नाराज़ होते भी नहीं थे। बस, उनकी नज़र में एक ही अक्षम्य अपराध था - चीज़ों को उनकी निर्धारित जगह पर न रखना। उनकी कलम, कंघी, चाबी, हर चीज़ की जगह तय होती थी। काम में लेने के बाद चीज़ को ठीक उसी जगह, उसी तरह रख दो तो कोई झंझट नहीं थी, वरना वे बहुत नाराज़ होते थे और फिर बहुत देर तक यथास्थान वाला भाषण सुनाते थे।

पापा जब कभी बहुत दुलार में आते तो मुझे अपना भोंदू बच्चा कहते। ज़्यादा ही मूड में होते तो गा-गाकर भोंदू का रूप चलाते - भोंदु - भोंदू - भोंदव:।

और मैं उनके दुलार से निहाल होते हुए भी ऊपर-ऊपर से झगड़ा करती - "आपने फिर हमें भोंदू कहा। जाइये, हम आपसे बात नहीं करते।"

और वे हँसकर कहते - 'तुम्हें कहाँ कहा? हम तो भोंदू का रूप याद कर रहे हैं।"

और अगले इतवार को फिर यही संवाद दोहराया जाता।

कभी-कभी पापा मुझे "पुत्रिके" कह कर भी बुलाते। यह संबोधन हमेशा किसी गंभीर बातचीत का संकेत होता, जिसमें मेरी राय की ज़रूरत होती। मसलन इस बार गर्मी की छुट्टियों में कहाँ जाना है या अगली गाड़ी कौन सी लेनी है, ऐसे किसी अहम मुद्दे पर जनमत संग्रह कराना होता तो पुत्रिके कह कर आवाज़ लगाते।

अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले जयपुर गये थे और वहाँ से कुछ पुस्तकें लेकर आये थे। उनमें से दो मुझे सौंपते हुए बोले - ये लो। शानू आजकल मधुशाला गाता है, तो यह उसे दे देना। और यह मनुस्मृति मैं तुम्हारे लिये ले आया हूँ। पुरानी वाली फट रही थी।

जयपुर से लौटने के तीसरे दिन उन्हें ज़बरदस्त ब्रेन हैमरेज हुआ और अगले ही दिन चले भी गये। क्या करना है क्या नहीं, मैं कुछ जानती नहीं थी और कोई बताने वाला भी नहीं था। मुझे लगा कहीं वे इसीलिये तो मुझे मनुस्मृति नहीं पकड़ा गये थे कि मैं इस भटकन में राह तलाश सकूँ। मैं गीता का दूसरा अध्याय पढ़ने के बाद मनुस्मृति लेकर बैठ गयी। श्राद्ध वाला अध्याय पढ़ना शुरु किया तो देखा, किसी व्यक्ति की एक ही संतान- कन्या हो तो उसे पुत्रिका कहते हैं और उसके पुत्र यानी पुत्रिका-पुत्र को नाना के दाहकर्म से लेकर पूरे अंतिम संस्कार करने का अधिकार होता है।

मन में सवाल उठा क्या पापा यह सब जानते थे? क्या इसीलिये वे मुझे पुत्रिका बुलाते थे?

Saturday, July 16, 2016

झूला पड़ा कदंब की डारी



मीना कुमारी की एक फ़िल्म आई थी - बहू बेगम, जिसमें वो और उनकी सहेलियाँ झमाझम बरसते पानी में झूला झूल रही थीं।

पड़ गए झूले सावन रुत आई रे।

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संयोग की बात है कि मैंने यह फ़िल्म ऐसी उम्र में देखी थी, जब सहेलियों के साथ सैर-सपाटा, मौज-मस्ती कर पाना जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा और सबसे बड़ी उपलब्धि लगती थी। मत भूलिये यह साठ का दशक था, जब छोटे शहरों की लड़कियों पर दुनिया भर की पाबंदियाँ होती थीं। मेरा परिवार तो काफ़ी आधुनिक चिंतन वाला परिवार था, फिर भी घर के ठीक सामने रहने वाली वीणा के घर नोट्स लेने जाना हो तो नौकर साथ जाता था और साथ लेकर ही लौटता था। ऐसे में सहेलियों के साथ झूला झूलने का अवसर सिर्फ स्कूल के अंदर ही मिल पाता था और वहाँ दाइयाँ हर वक़्त डराती रहती थीं -

ऐ! ऐ! चला लोगन, भीजा जिन। नाहिं, अबहीं जाइके बाई जी (प्रिंसिपल लीला शर्मा जी) के बताईल।

लीला दी ने शायद ही कभी किसी को डाँटा हो, फिर भी उनका ख़ौफ़ ऐसा था कि हम फ़ौरन झूला छोड़कर ग़ायब हो जाते थे।

ऐसे में बार-बार ध्यान आता था कि गोकुल-बृंदावन में कैसा आनंद रहा होगा जहाँ गोपी-ग्वाल, राधा-कृष्ण मिलकर झूलते थे और कोई उन्हें प्रिंसिपल के नाम से डराता भी नहीं था।


कदम्ब पर झूल रहीं राधे जू, साँवरिया दे रह्यो झोंटा।







कदम्ब के पेड़ का राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंग में बड़ा महत्त्व है। मैथिल कवि विद्यापति का पद है -

तट तरंगिनि, कदम कानन, निकट जमुना घाट। उलटि हिरइत उलटि परली, चरन चीरल काँट।। 
राधा याद कर रही हैं कि उस दिन यमुना के घाट पर, कदम्ब के वन में उलट कर कृष्ण को क्या देखा कि जैसे मैं स्वयं ही उलट गयी। चरण में काँटा चुभ गया और मन घायल हो गया।

​लेकिन कामदेव ने अकेले राधा को ही निशाना बनाया हो, ऐसा नहीं है। सखियाँ कहती हैं - तुम्हीं नहीं हो, कान्ह भी तुम्हारे लिए पागल हैं। तुम्हारे गुणों पर लुब्ध हो गए हैं। कहीं और जा रहे हैं, पर आँखें इधर ही लगी हैं। ऐसे लुभाए नयनों को हटा भी कैसे सकते हैं। वे अगर नटवर नागर हैं तो तुम भी उनसे कम नहीं, बराबर ही हो। तुम दोनों जैसे एक ही डाल पर खिले हुए दो फूल हो। कवि विद्यापति कहते हैं कि कामदेव ने एक ही तीर से दो जीवों को मार दिया है।
ये सखि ये सखि न बोलहु आन, तुअ गुन लुबुधलनि अब कान।
अनतहु जाइत इतिहि निहार,लुबुधल नयन हटाये के पार।
से अति नागर तों तसु तूल, याक बल गाँथ दुई जनि फूल।
भन विद्यापति कवि कंठहार, यक सर मन्मथ दुई जीव मार।
कवियों की बात मानें तो पाण्डवों के इंद्रप्रस्थ से कृष्ण के वृंदावन तक पूरा का पूरा यमुना तट ताल, पियाल, तमाल और कदम्ब के घने वनों से भरा हुआ था। राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन इन पेड़ों के वर्णन के बिना अधूरा है। जयदेव और विद्यापति से लेकर सूरदास और मीरा तक सभी इनका नाम लेते नहीं थकते। इन वनों के आस-पास रहने वाले इन्हें ख़ूब अच्छी तरह जानते-पहचानते रहे होंगे।तब स्कूली बच्चों को इनके फोटो और डिस्क्रिप्शन ढूंढ़कर लाने का हॉलिडे होमवर्क नहीं मिलता होगा और न पर्यावरण-प्रेमियों को इको सिस्टम बिगड़ने की चिंता करनी पड़ती होगी। आज ज़रा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों से पूछकर देखिये,उनमें से कितने कदम्ब का पेड़ पहचान सकते हैं।

लगभग पच्चीस वर्ष पहले की बात है। दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र से सुबह संस्कृत का साप्ताहिक कार्यक्रम प्रसारित होता था। मेरा भी उसमें थोड़ा-सा योगदान रहता था। हमने मेघदूत पर आधारित कुछ कड़ियाँ प्रसारित करने की सोची। श्लोकों के सस्वर पाठ की रिकॉर्डिंग हो गयी। उन पर विज़ुअल डालने के लिए बादल-बरसात, खेत-खलिहान, फूल-पत्ते, सारस-बगुले के स्टॉक-शॉट्स मिल गये, लेकिन कदम्ब नहीं मिला। और मुझे ज़िद्द चढ़ गयी कि बिना कदम्ब के मेघदूत प्रसारित नहीं होगा। प्रोड्यूसर दुर्गावती सिंह समझाती रहीं कि सरकारी तंत्र में ऐसे ही काम करना पड़ता है। 

नहीं मिलता कदम्ब तो जाने दो, किसी और पेड़ को डिफ्यूज़ करके काम चला लेंगे। मैंने उनसे एक दिन की छुट्टी माँगी और अपनी मारुति लेकर कदम्ब की तलाश में निकल पड़ी। न जाने कितनी नर्सरी, पार्क और लाइब्रेरी छान मारीं लेकिन कहीं कदम्ब नहीं मिला। कुछ खाने के लिए बंगाली मार्किट पहुँची तो वहाँ मुझे अपना बचपन का साथी कबीर मिल गया। लेडी श्री राम कॉलेज में मेरी माँ हिंदी और उसकी माँ उर्दू पढ़ाती थीं। कॉलेज कम्पाउंड में हमारे घर भी पास-पास थे। 

अम्मा के रिटायर होने पर हम कालकाजी चले गए थे मगर वे लोग अब भी वहीँ रहते थे। गप-शप के बीच जब मैंने उसे बताया कि मैं सुबह से कदम्ब का पेड़ तलाश कर रही हूँ तो उसने पूछा कैसा दीखता है। मैंने उसे मेघदूत का श्लोक सुनाया, जो मुझे बहुत प्यारा लगता है -
त्वत्सम्पर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः
कदम्ब के फूल ऐसे लग रहे थे जैसे बादल के आने से पुलक उठे हों, रोमांचित हो गए हों।
कबीर ने मुझे टोककर पूछा - लड्डू जैसा फूल होता है क्या?
मैंने कहा - हाँ।
बोला - बड़े-बड़े, लाइट ग्रीन कलर के पत्ते होते हैं ?
मैंने कहा - हाँ भाई हाँ।
कहने लगा - तो एल. एस. आर. में है न। कॉलेज ऑडिटोरियम के पीछे, जहाँ हम लोग खेला करते थे, ऐसे दो पेड़ हैं।

लो! इसे कहते हैं "गोद में लड़का नगर ढिंढोरा"! मैं सुबह से दुनिया-जहान की ख़ाक छानती फिर रही थी और कदम्ब घर के पिछवाड़े ही मौजूद था।

अगले दिन कैमरा टीम को लेकर गयी और वीडियो रिकॉर्डिंग कर लायी। इस मेहनत के बदले मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिला लेकिन मन कदम्ब के फूलों सा ही पुलकित हो उठा।

Wednesday, July 13, 2016

अविस्मरणीय रेलयात्रा

भगवान बुद्ध ने अच्छा किया था कि अपरिग्रह को सत्य, अहिंसा, अस्तेय और ब्रह्मचर्य के बराबर महत्त्व दिया था। अपने को कोई नुकसान न हो रहा हो तो हम हिंदुस्तानी अमूमन सच बोल लेते हैं, अहिंसा का पालन कर लेते हैं, चोरी से भी बच लेते हैं और देर-सबेर ब्रह्मचारी भी बन जाते हैं। एक ही काम है जिसमें हम कच्चे हैं, और वो है अपरिग्रह। किसी भी घर में जाकर देखिये - पुरानी डायरियों से लेकर गाड़ी के पुराने टायर तक तमाम चीज़ें कहीं कोने-अँतरे में पड़ी मिल जायेंगी। यह हमारा राष्ट्रीय अवगुण है कि हम कभी कोई चीज़ फेंकते नहीं, इस उम्मीद में सहेजकर रख लेते हैं कि कभी न कभी काम आ सकती है।

किसी और को क्या दोष दूँ, मैं ख़ुद भी इस मर्ज़ की शिकार हूँ। टूटी मालायें, बटन, साड़ियों के फ़ॉल, पिछले साल की राखियाँ, शादियों के कार्ड से उखाड़े गणेश, और यहाँ तक कि पिछली दीवाली के जले हुए दिये तक मेरे संग्रह में मिल जायेंगे। हाँ, यह ज़रूर है कि मैं जल्द ही उनके इस्तेमाल के तरीक़े ढूँढ लेती हूँ।



पहचान रहे हैं? दीवाली पर इन मटकियों में दीप जले थे पर अब ये पौधों के गमले बन गये हैं। कुछ इसी तरह का इस्तेमाल मैंने सुराही के स्टैंड का भी किया है। ये मेरे बचपन की यादगार है, जिसे मैं अपने हर नये घर में साथ रखती आयी हूँ। ऐसा लगता है कि अब ग्रेटर नॉएडा का यही घर इसका अंतिम पड़ाव होगा इसलिये इसे भी हीले से लगा दिया है।




मेरे नानाजी उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर थे। अपने पूरे सेवाकाल में कार या जीप से दौरे करते रहे लिहाज़ा ज़रूरत से ज़्यादा सामान साथ लेकर चलने की आदत थी। ये जूता भी रख लो, ये छड़ी भी रख लो, पूजा वाला पीताम्बर भी रख लो। जब तक ये छिटपुट चीज़ें गाड़ी में भर ली जाती थीं, तब तक तो सब कुछ ठीक रहा। लेकिन जब रेलयात्रा में भी उनका यही हाल रहा, तब बहुत मुश्किलें पेश आयीं। नानाजी, नानी और मैं, तीन लोगों के टिकट के साथ कम से कम चौदह नग सामान चलता था। एक आदमी की ड्यूटी हर स्टेज पर इन नगों की गिनती करने की रहती।



पूरे नवाबी ठाठ-बाट से सामान बाँधा जाता। स्टील के ट्रंक और लपेटकर बाँधे जाने वाले बिस्तरबंद निकाले जाते। खाना ले जाने के लिये स्टील का चार डिब्बों वाला टिफ़िन कैरियर और पानी के लिये सुराही स्टैंड स्टोर रूम से ढूँढ़कर निकाले जाते। नानी के ठाकुर जी के लिये एक लकड़ी की सन्दूकची थी, जिसमे हवा के लिये बड़े आर्टिस्टिक छेद कटे हुए थे। उस सन्दूकची में कई गद्दे बिछाकर ठाकुरजी लिटाये जाते थे। सन्दूकची को लाल रेशमी कपडे से बाँधकर ले जाया जाता था ताकि हवा का प्रवेश हो, छूत का नहीं। नानी यात्रा में खाना नहीं खाती थीं इसलिए प्रचुर मात्रा में बेसन के लड्डू और मठरी बनाये जाते, जो पीतल के बड़े से कटोरदान में रखकर ले जाये जाते थे। पानदान, बेटियों के यहाँ दी जाने वाली बनारसी मिठाई और उड़द की बड़ियाँ तक तो मैं बाँध ले जाती थी लेकिन जब बात उनकी छड़ी और छतरियों की आती, तब मुझे विरोध करना ही पड़ता था।

आपको क्या लगता है, अम्मा के पास छाता नहीं होगा? - मैं झींकती।

अरे बेटा, एक छाता रखने से कौन ट्रेन का बोझ बढ़ जायेगा। - वे तर्क देते

बहस आगे बढ़कर विकराल रूप न ले ले, इस डर से नानी मध्यम मार्ग सुझातीं - अलग नग नहीं बनेगा, होल्डाल के बीच में डाल देना।

आख़िरकार नियत दिन-तारीख को चौदहों नग के साथ यात्रा शुरू होती और अगले दिन सुबह दिल्ली पहुँचकर ख़त्म भी हो जाती। लेकिन मेरी मुसीबत ख़त्म नहीं होती क्योंकि दिल्ली पहुँचते ही उन्हें अपना स्वेटर, पैर ढँकने का शॉल, और जप की माला याद आनी शुरू हो जातीं।

वैसे मेरे जीवन की सबसे अविस्मरणीय यात्रा थी लखनऊ से मुंबई तक। पापा का तबादला लखनऊ से पणजी हुआ। गोवा कुछ समय पहले ही पुर्तगालियों के शासन से मुक्त हुआ था, सो सबसे पहले उसे देखने के घमंड में चूर थी मैं। ऊपर से सोने पर सुहागा यह कि अपनी सब सहेलियों से पहले बम्बई जा रही थी।




ज़्यादातर सामान लगेज वैन में बुक किया जा चुका था। हमारे साथ सिर्फ ज़रूरी कपड़े भर थे। गर्मी के दिन थे इसलिए फर्स्ट क्लास कूपे में एक बड़ी-सी अल्युमिनियम की ट्रे रखी गयी थी, जैसी कूलर में पानी भरने के लिए होती है। इसमें बर्फ की बड़ी सी सिल रखी गयी थी ताकि ठंडक रहे। ट्रे में लखनऊ की तमाम सौगातें - दसहरी आम, ख़रबूज़े, ककड़ियाँ भी जमा दी गयी थीं। मैं महा थ्रिल्ड! खाना-वाना खाने के बाद ऊपर की बर्थ पर लेटकर अपनी बाल पत्रिकायें पढ़ते-पढ़ते कब सो गयी, पता ही नहीं चला। तभी अम्मा के बहुत घबराये हुए स्वर से नींद खुली। कह रही थीं - बेटा उठ! मनु उठ! पापा छूट गये हैं और मुझसे ये चेन नहीं खिंच रही।

देखा तो अम्मा पूरा ज़ोर लगा रही थीं लेकिन गाड़ी रोकने वाली ज़ंजीर टस से मस नहीं हो रही थी। मेरे सर के पास ही थी वो ज़ंजीर। बस, मैंने ऊपर की बर्थ से कलैया खायी और ज़ंजीर पकड़ कर लटक गयी। तब तक गाड़ी की स्पीड कम होने लगी थी। कुछ ही देर में सुराही लिये पापा आ गये। उन्होंने बताया कि गाड़ी चल दी तो वे किसी और डिब्बे में चढ़ गये थे और जब गाड़ी रुकी तो वापस आ गये। शायद किसी ने चेन खींच दी है।

अम्मा ने रुंआसे स्वर में कहा - किसी ने नहीं, हमने ही खींची है। बल्कि मुझसे अकेले नहीं खिंची तो मनु ने भी मदद की। पापा हँसते हुए आये थे पर यह सुनकर एकदम गम्भीर हो गये। वहाँ साफ़ लिखा हुआ था - बिना कारण ज़ंजीर खींचना दंडनीय अपराध है।

तभी रेल विभाग के कई कर्मचारी चेन खींचने वाले की ख़बर लेने आ पहुँचे। अम्मा ने उनसे कहा कि मेरे पति छूट गए थे इसलिए मैंने चेन खींची। आख़िर ऐसी ही एमर्जेंसी के लिए तो चेन लगाई गयी है।

लेकिन रेलवे वाले इसे एमर्जेंसी मानने को तैयार ही नहीं थे। काफ़ी देर की बहसा-बहसी और कई आम-खरबूजों का भोग लगाने के बाद वे चेन खींचने को दंडनीय अपराध ना मानने पर राज़ी हो गये। वरना शायद मुझे और अम्मा को बम्बई की सैर के बजाय इटारसी की जेल की सैर करनी पड़ती।

Thursday, July 07, 2016

जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे


आषाढ़ महीने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलते हैं, भाई-बहन के साथ रथ पर सवार होते हैं और वर्षा ऋतु का आनंद लेने निकल पड़ते हैं। उनकी इस पिकनिक में उनकी पत्नी साथ नहीं होतीं लेकिन लाखों की संख्या में उनके अनुयायी साथ होते हैं। अनुयायी का शाब्दिक अर्थ ही है - साथ चलने वाला - उर्दू में जिसे कहते हैं हमसफ़र।

कैसी अजीब बात है? घूमने निकले हैं लेकिन जीवन-साथी को साथ लेकर नहीं चल रहे। साथ में लिया है बड़े भाई को, लाड़ली बहन को और हज़ारों-हज़ार अनुयायियों को।



बचपन से ही ऐसे थे। घर में दूध-दही के मटके भरे रहते थे लेकिन उन्हें तो दूसरों के घर से चुराकर खाना भाता था। वो भी अकेले नहीं, सब सखाओं के साथ। माखन चुराने, खाने और लुटाने की ऐसी बान पड़ी कि गोपियों ने माखनचोर नाम ही रख दिया। पकडे जाते तो भोली सूरत बनाकर कह देते-


मैं बालक बँहियन को छोटो छींको केहि बिधि पायो
ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुख लपटायो।
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। ​

अब इस तरह की शरारतें और बहानेबाज़ी कोई भला आदमी अपने बाल-बच्चों के सामने नहीं कर सकता न, इसलिए उन्हें साथ लेकर नहीं आये हैं। भाई-बहन सब कुछ जानते हैं, इसलिए उन्हें साथ ले लिया है। और साथी न हों तो शरारतों का मज़ा ही क्या? इसलिए खुला निमंत्रण है, जिसे संग आना हो आओ। साथ चलो। रथ चलाओ। रथ पर आकर मुझसे गले मिलो। बरसात में भीगो। पकवान खाओ। बीमार पड़ो तो खिचड़ी खाओ। पूरी मस्ती करो। क्योंकि एक बार मंदिर के अंदर पहुँच गया तो फिर भगवान होने की, जगन्नाथ होने की मर्यादा निभानी पड़ेगी। अदब-क़ायदे से रहना पड़ेगा। जो भोग लगाया जायेगा, वही खाना पड़ेगा। जिस समय जो करने को कहा जायेगा, वही करना पड़ेगा। तब ऐसा निर्बाध आनंद कहाँ मिलेगा।



मंदिर में दर्शन मिलते हैं। साहचर्य नहीं मिलता। तभी तो बंधन तोड़कर भागे हैं। गुंडिचा मंदिर जायेंगे। मौसी के घर जायेंगे। राजसी भोग नहीं, आम लोगों की तरह 'पोड़ा पीठा' खायेंगे। रूठी हुई पत्नी मंदिर में नहीं घुसने देगी तो अपराधियों की तरह रात भर बाहर खड़े रहेंगे। तरह-तरह से उसे मनाने की कोशिश करते रहेंगे। और जब वो रसगुल्ले की माँग करेगी तो उनके सारे साथी दौड़ पड़ेंगे। जहाँ कहीं रसगुल्ला मिलेगा, सीधा जगन्नाथ जी के हाथ में पहुंचा दिया जायेगा कि लो भैया, अपनी रूठी पत्नी को मना लो। दोस्त ऐसे ही तो एक दूसरे के काम आते हैं। ​

तो मेरी आपको यही सलाह है कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने हों तो वर्ष का कोई भी दिन-महीना चुन लीजिये पर अगर सखा कृष्ण से भेंट करना चाहते हैं तो रथयात्रा के समय उनके साथ लग जाइये। मिल ही जायेंगे कहीं न कहीं।


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