Thursday, March 31, 2016

kahin door jab din dhal jaye

उदास सी साँझ घिर आई थी। दूर क्षितिज पर डूबते सूरज के ललछौंहे निशान धुँधले पड़ते जा रहे थे। बरामदे में खड़ा आनंद गा रहा था --
कहीं दूर जब दिन ढल जाये 
साँझ की दुल्हन बदन चुराये, चुपके से आये 
मेरे ख़यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाये। 
तभी बाबू मोशाय भास्कर बैनर्जी चुपके से आकर उसके पीछे खड़े हो जाते हैं।  
आनंद पूछता है - ऐ बाबू मोशाय! चोरी-चोरी मेरा गाना सुन रहे थे? कैसा लगा?
भास्कर जवाब देते हैं - अच्छा था।  लेकिन कुछ उदास लगा। 
आनंद कहता है - उदासी क्या सुन्दर नहीं होती !
हृषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार की कल्पनाशीलता और क्राफ्ट की बदौलत यह हिंदी फिल्मों के इतिहास में उदास संध्या का ऐसा बेजोड़ चित्र है, जिससे बेहतर न अब तक हुआ, न हो सकता है। "न भूतो न भविष्यति।" 

कुछ और भी चित्र उभरते हैं।  जैसे वहीदा रहमान वाली फागुन फिल्म का -
संध्या जो आये मन उड़ जाये 
जाने रे कहाँ, करूँ  क्या उपाय ?
विरहिणी नायिका का निपट एकाकीपन, उसके घर और जीवन का सूनापन जिस तरह उभर कर आता है और देखने वाले को व्यथित कर देता है, उसका श्रेय न तो गीत-संगीत को दिया जा सकता है और न  निर्देशन को। वह पूरी तरह वहीदा जी के अभिनय का कमाल है। 

शाम का एक दृश्य और याद आता है जब आह फिल्म में नरगिस जी अपने बड़े से महलनुमा कमरे में घूम-घूम कर नायक को याद कर रही हैं -
ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा ग़म 
पत्ते कहीं खड़के, हवा आई तो चौंके हम। 
नरगिस जी बेहतरीन अदाकारा थीं, इसमें कहीं कोई दो राय नहीं हो सकती।  लेकिन इस फिल्म के इस दृश्य में वे राज साहब के विरह के बजाय, पेट की तकलीफ से पीड़ित लगती हैं। 

गुलज़ार साहब का एक और गीत है, जो अकसर उदास शामों में होठों पर आ जाता है - 
जब भी ये दिल उदास होता है 
जाने कौन आस-पास होता है। 
लेकिन अगर आपको यह गीत ज़रा भी पसंद हो तो मेहरबानी करके इसे सिर्फ रेडियो पर सुनियेगा, भूलकर भी वीडियो पर मत देखियेगा।  हमसे यही ग़लती हो गयी थी।  रेडियो पर सुनकर गीत इतना अच्छा लगा कि फिल्म देखने चले गये। बालों में पीले गुलाबों की पूरी क्यारी सजाये सिम्मी को और बिना मूँछ-दाढ़ी वाले कबीर बेदी को आज तक माफ़ नहीं कर पाये हैं। वरना दो बदन की डॉक्टर सिम्मी और दिल्ली दूरदर्शन के एंकर कबीर के अच्छे खासे पंखे हुआ करते थे हम।  

देव साहब का पंखा कोई हो या न हो, यानी उन्हें पसंद करे या न करे, उनकी फ़िल्में देखे बिना नहीं रह सकता था। नौ दो ग्यारह से लेकर गाइड, ज्वेल थीफ, हरे राम हरे कृष्ण, जॉनी मेरा नाम, कौन सी ऐसी फिल्म है, जो आपने अब तक नहीं देखी। हमने भी देखी हैं। गाइड में उनकी शिकायत ख़ासी असरदार साबित हुई थी।  मैंने कई लोगों को पहले पेग के बाद वो शिकायत दोहराते सुना है -
दिन ढल जाये, हाय रात न जाये  
तू तो न आये तेरी याद सताये।  

अपने धरम पा जी को नाचने-गाने का शऊर थोड़ा कम ही है। सो उनके हिस्से अच्छे गाने भी कम ही आते हैं। लेकिन शाम के जाम के साथ वे भी गाने को निभा ले जाते हैं।  रफ़ी साहब ने इसे गाया भी बड़ी तबीयत से है-
हमें तो यही था ग़ुरूर, ग़मे यार है हमसे दूर 
वही ग़म जिसे हमने किस-किस जतन से निकाला था इस दिल से दूर 
वो चलकर क़यामत की चाल आ गया। 
हुई शाम उनका ख़याल आ गया। 
   
लेकिन अगर शाम के खाँटी देसी, गँवई चित्र की बात करें तो बिमल राय की फ़िल्म परख का गीत याद आता है -
मेरे मन के दिये, मेरे मन के दिये 
यूँ ही घुट घुट के जल तू मेरे लाडले, ओ मेरे लाडले। 
गाँव के पोस्ट मास्टर की पत्नी बहुत बीमार हैं लिहाज़ा गृहस्थी का सारा बोझ उनकी बेटी साधना के कन्धों पर आ पड़ा है। यह वही लड़की है, जो अब तक गाँव में - 'मिला है किसी का झुमका' और 'ओ सजना, बरखा बहार आई' जैसे गीत गाती फिरती थी। लेकिन अब अपने तमाम सपनों को भुलाकर तुलसीचौरे पर संझा-बाती में लगी हुई है और अपने मन को घर-आँगन में घुट-घुट कर जीने की हिम्मत दे रही है। 

शाम के इन गीतों के बारे में जो मेरी राय थी मैंने बता दी, आप सहमत हैं या नहीं इस पर चर्चा करके देख लेते हैं।बोलिये, आपकी क्या राय है?

6 comments:

  1. नरगिस जी बेहतरीन अदाकारा थीं, इसमें कहीं कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन इस फिल्म के इस दृश्य में वे राज साहब के विरह के बजाय, पेट की तकलीफ से पीड़ित लगती हैं।

    BAHAHAHAHAHAHAHAHA!


    pata nahin kyun, main shaam ke baare mein sochta hoon to mujhe aanewaala pal ka second stanza yaad aata hai. doobte sooraj ka shot, aur peeche trumpet ka sound. aur phir ek baar waqt se lamha gira kahin, wahan daastaan mili, lamha kahin nahin... thoda saa hansa ke, thoda sa rulake, pal ye bhi jaane waala hai...

    aapka theme udaasi hai, isiliye shaam mastani mention nahin kar raha. lekin aanewaala pal jo hai, wo typical gulzar-pancham hai. it's a sad song disguised under a message of carpe diem.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Sandhya ke geeton ka zikr hai yahan aur udasi me khoobsurati talashne ka.lekin aapne padha, accha laga. Thanks.

      Delete
  2. बेहतर ख़्यालात का इज़हार किया है।

    ReplyDelete
  3. बेहतर ख़्यालात का इज़हार किया है।

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts