Friday, March 04, 2016

"आंगना में कुइयां राजा डूबके मरूंगी"


-  शुभ्रा शर्मा
चौराहा पर एक लेख पढ़ा 'अंगना में कुइयां' तो बचपन में सुना एक लोकगीत याद आ गया - "आंगना में कुइयां राजा डूबके मरूंगी"| लेख में पुराने लुप्त होते जलस्रोतों के पुनरुद्धार की बात की गयी है. मैं सोचने लगी कि कोई उन तमाम लोकगीतों के उद्धार की बात क्यों नहीं करता, जो उन जलस्रोतों के साथ ही लुप्त होते जा रहे हैं| उदाहरण के तौर पर पंजाब में गाया जाने वाला वह गीत जिसमे कुँए पर पानी भरने जा रही नायिका को रोककर सिपाही पूछता है - "ये जो तेरे पैर में कांटा चुभ गया है, इसे कौन निकालेगा, कौन इसकी पीर सहेगा?"

सड़के सड़के जानिये मुटियारे नी कंडा चुबा तेरे पैर बांकिये नारे नी, ओये नी अडिये
कौन कढे तेरा कांडडा मुटियारे नी कौन सहे तेरी पीड बांकिये नारे नी, ओये नी अडिये

सिपाही उससे पानी पिलाने को कहता है तो वह तमक कर जवाब देती है - मैं तुम्हारी बांदी नहीं हूँ|

घड़ा पजे कुमियारा दा सिपैया वे लज्ज पई टोटे चार कि मैं तेरी मैरम ना.

देर से घर पहुँचनेपर सास नाराज़ होती है, बरसों पहले परदेस गया उसका बेटा जो लौट आया है| मिलने पर पता लगता है कि कुँए पर उसे छेड़ने वाला कोई और नहीं उसका पति ही था|

ठीक यही गीत बोली और भावों के थोड़े से अंतर के साथ राजस्थान में भी सुना-

किन्ने खुदाया कुआँ बावड़ी रे पनिहारी जी आलो, हो मृगानैनी जी आलो

यही दोनों राज्य भारतीय सेना को सबसे अधिक संख्या में जवान उपलब्ध कराते हैं इसलिए उनके लोकगीतों में सिपाही की पत्नी की पीड़ा झलकना स्वाभाविक है| लेकिन एक और राजस्थानी लोकगीत में छैल भंवर जी की प्रिया का नखरा भी देखने को मिला -

ऊंची तो पाळ तलाब री जी म्हारा चढ़ता गोड़ा दूखे सा ओ बालमा
म्हासूं चढ़यु न उतरियु जाये सा ओ बालमा

उधर, उत्तर प्रदेश में जब नवविवाहिता को सास पानी भरने भेजती है, तो घर के सारे पुरुष सदस्य उसकी मदद के लिए तत्पर हो जाते हैं -
रेशम गुही मोरी बैयाँ सास मोरी पानी को पठ्वे.
अपने ससुर की बहुत पियारी
नियरे कुइयां खोदावें बहू मोरी पानी को जैहें.
अपने जेठ की बहुत दुलारी
द्वारे तम्बुआ तनावें लहुरी मोरी पानी को जैहें.
अपने देवर की बहुत पियारी
गलियां कचरा बटोरें भौजी मोरी पानी को जैहें.
अपने सैयां की बहुत दुलारी
रहि रहि अंसुवा ढरावें धनो मोरी पानी को जैहें.

एक और लाडली दुल्हन को जब पानी लेने जाने को कहा जाता है तो उसकी फरमाइशों का पिटारा ही खुल जाता है -
जल भरी हिलोरें ले रसरिया रेशम की.
रेशम की रसरी तब नीकी लागे
चाँदी की गगरिया होय.
चाँदी की गगरी तब नीकी लागे
सोने की तगरिया होय.
सोने की तगड़ी तब नीकी लागे
गोदी में ललनवा होय.

लीजिये, अब सासू जी को पानी भरवाना हो तो थोड़ी जेब ढीली करें. बहूरानी ने तो अल्टीमेटम दे दिया है कि पानी भरने तभी जाएँगी जब रेशम की रस्सी, चाँदी की गगरी और सोने के कमरबंद का इंतजाम कर दिया जाये और हाँ, तब तक इंतजार भी करना पड़ेगा जब तक वे पुत्र रत्न को जन्म न दे दें| और अगर कहीं कोई कोर कसर रह गयी तो फिर धमकाने के लिए आँगन में कुँवा तो है ही -

आंगना में कुइयां राजा डूबके मरूंगी .........

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