Friday, May 20, 2016

दस बेटे बनाम एक पेड़


-- शुभ्रा शर्मा

आजकल पेड़-पौधों का प्रेम मेरे सर पर चढ़ कर बोल रहा है। जो कुछ पढ़ती हूँ, फोकस पेड़-पौधों पर ही रहता है। प्राचीन अभिलेखों के बारे में पढ़ रही थी, तभी यह श्लोक नज़र आया -

दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः।
दशह्रदसमो पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः।।
 
दस कुँए के बराबर होती है एक बावड़ी, दस बावड़ी के बराबर एक सरोवर, दस सरोवर के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्त्व होता है।

Koop
आज के समय में पानी का महत्त्व जगजाहिर है। भविष्य के बारे में सोचने वाले बहुत दिनों से आगाह कर रहे हैं कि पानी सँभाल कर खर्च करें। पृथ्वी पर खारे पानी के सागर-महासागर भरे हुए हैं, मगर प्राणियों को ज़िंदा रहने के लिये जो पानी दरकार है उसकी मात्रा तेज़ी से घटती जा रही है। पानी की कमी दुनिया का नक़्शा किस हद तक बदल सकती है, इसका कुछ आभास होता है 1995 में बनी फिल्म WATERWORLD से। इस फिल्म में दिखाया गया था कि ग्लोबल वॉर्मिंग के परिणामस्वरूप ध्रुवीय क्षेत्रों की बर्फ़ पिघल गयी है और पूरा संसार जलमग्न हो गया है। लोग समुद्र में जाल सा बाँध कर उस पर किसी तरह जी रहे हैं। मिटटी-पानी के दर्शन दुर्लभ हैं। अगर कहीं सूखी ज़मीन बच गयी है, तो उस तक पहुँचना हर इंसान का सपना है।
Agrasen ki Baoli, Delhi





फिल्म देखते समय मेरे अंदर ज़बरदस्त अपराध बोध जागा था। अगर कभी ऐसी स्थिति आती है तो क्या उसके लिये मैं भी ज़िम्मेदार हूँ? मैंने भी तो अनगिनत बार ग़ैर-ज़रूरी कपड़े धोये हैं, टपकते नल को ठीक करवाने का काम कल पर टाला है और गिलास का बचा पानी बिना सोचे-समझे फेंक दिया है। तो समुद्र में एक बूँद के बराबर ही सही, मगर दोषी तो मैं भी हूँ।

हमारे पूर्वज पानी के महत्त्व से परिचित थे इसलिए किसी भी शुभ अवसर पर कुँए खुदवाने को सबसे बड़ा पुण्य कार्य समझते थे। कुँआ न सिर्फ़ एक परिवार की प्यास बुझाता था बल्कि भूमि के नीचे के पानी के स्तर की सूचना भी देता रहता था।

Hauz Shamsi












अधिक साधन-संपन्न लोग बावड़ी का निर्माण करवाते थे। बावड़ी इस तरह बनायी जाती थी कि सूरज की किरणें सीधे पानी तक नहीं पहुँचती थीं और उसके भाप बनकर उड़ने की आशंका कम रहती थी। पानी की कमी वाले इलाक़ों में गहरी बावड़ियों के साथ गलियारे और छोटी-छोटी कोठरियाँ होती थीं, जहाँ बैठकर थके-हारे पथिक दोपहर बिताते थे। सेनापति का कवित्त याद आता है --


Hauz Khas
बृष को तरनि तेज सहसौ किरन करि
ज्वालन के जाल बिकराल बरसतु है।
मेरे जान पवनौ पकरि सीरी छाँह कौनो

घरी एक बैठि कहूँ घामै बितिवतु है।

वृष राशि का सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणों से जैसे ज्वालाओं का जाल बरसा रहा है। ऐसे में हवा भी थम गयी है। ऐसा लगता है जैसे गर्मी से त्रस्त होकर वह भी कोई ठंडी छाँह देख, कहीं घड़ी भर रुक गयी है और सोच रही है ज़रा धूप कम हो जाये तब चलूँ। मुझे न जाने क्यों हमेशा ऐसा लगता है कि "पौन" ने जो "सीरी छाँह" पकड़ी है, वो ज़रूर किसी बावड़ी की कोठरी में है।
Baoli

बावड़ी से बड़े तालाब या ह्रद खुदवाना बड़े राजा-महाराजा और सुल्तानों के बस की बात होती थी। दिल्ली के उदाहरण से समझिये। यहाँ राजा अग्रसेन की बावड़ी है, जबकि अल्तमश का हौज़-ए-शम्सी और अलाउद्दीन खिल्जी का हौज़ ख़ास है। मतलब यह कि ह्रद या हौज़ बनवाने में ज़्यादा लोगों की मेहनत और ज़्यादा रुपयों की ज़रूरत पड़ती थी। 

ऐसे दस सरोवर बनवाने का पुण्य और एक पुत्र का पुण्य बराबर माना गया है। भारतीय जन-मानस में पुत्र का होना कितना आवश्यक है और पुत्री का होना कितना निरर्थक, ये कहानियाँ हम पहले तो गाहे-बगाहे सुनते थे, लेकिन अब सूचना-क्रांति के इस दौर में दिन में बीसियों बार सुन लेते हैं। पुत्र वह जो माता-पिता को वैतरणी पार कराता है, घोर नरक की यातना से बचाता है। ज़ाहिर है, उसका महत्त्व कुँए, बावड़ी और सरोवर से अधिक तो होना ही था।

Neem Tree
ऐसे में अगर कोई देव-भाषा संस्कृत में यह कह रहा है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के बराबर होता है, तो हम उसकी बात पर ध्यान क्यों नहीं देते? पुत्र की आकांक्षा में देश की जनसंख्या बढ़ाने की जगह, अपने घर-आँगन में नीम, आम, अमरुद, कटहल के फलदायक पेड़ क्यों नहीं लगाते? क्यों नहीं उन्हें सींचकर बड़ा करते, जो बुढ़ापे में हमें छोड़कर कहीं नहीं जाते, जो हम पर कोई एहसान नहीं जताते और जिनकी 'सीरी छाँह' में बैठकर हम चैन से 'घाम' बिता सकते हैं?

7 comments:

  1. बहुत ही सामयिक और विचारोत्तेजक आलेख !
    कितने कमाल की बात है कि ये हम जो अपने अपने को इतना एनवायरनमेंट कॉनशियस .... पर्यावरण के बारे में इतना जानकार, जागरूक और सचेत मानते हैं...... ये हम जो बात बात पर 'गोइंग ग्रीन' की बात करते हैं... अपने पूर्वजों के आगे सच में कितने अबोध और अज्ञानी हैं !
    जल के इतने अभाव के समय में भी, जिस बेदर्दी से बहुत से लोग और शायद कभी कभी हम भी (जो पूरी ईमानदारी से सचेत रहने की कोशिश करते हैं) पानी की जैसी क्षति करते हैं, वो सचमुच अक्षम्य है !

    बावड़ी के बारे में कमाल की जानकारी दी आपने ... राजस्थान में पली-बढ़ी होने के कारण बावड़ियां जो बचपन से देखीं हैं मैंने ... उनकी वो सीढियां हमेशा ही कितनी आकर्षक और दिलचस्प लगती रहीं ... क्या कहूँ ?
    पर उन सीढ़ियों का प्रयोजन तो आज आपसे समझीं हूँ मैं !

    "मेरे जान पवनौ पकरि सीरी छाँह कौनो
    घरी एक बैठि कहूँ घामै बितिवतु है।"

    वाह ! क्या शब्द चित्र है ... अद्भुत !

    समय आ गया है कि "दशपुत्रसमो द्रुमः" का मन्त्र अब जीवन का बीज मन्त्र हो ही जाना चाहिए ... आपके ये शब्द कानों में बार बार गूँज रहे हैं ...
    "पुत्र की आकांक्षा में देश की जनसंख्या बढ़ाने की जगह, अपने घर-आँगन में नीम, आम, अमरुद, कटहल के फलदायक पेड़ क्यों नहीं लगाते? क्यों नहीं उन्हें सींचकर बड़ा करते, जो बुढ़ापे में हमें छोड़कर कहीं नहीं जाते, जो हम पर कोई एहसान नहीं जताते और जिनकी 'सीरी छाँह' में बैठकर हम चैन से 'घाम' बिता सकते हैं?"

    काश की ये सन्देश भारत में तो कम से कम जन-जन तक, मन-मन तक पहुंचे !

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  2. Population explosion shrunk the space for water bodies today. The least we can do is to take up the task of rain-harvesting wherever we can.
    Planting a tree is one thing within the reach of everyone.
    Thanks for a timely reminder.

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  3. Suman Keshari : लेख तो सामयिक है ही, चित्र कमाल के चुने हैं आपने। अनुपम मिश्र की किताब "राजस्थान की रजत बूंदे" और "अब भी खरे हैं तालाब" में अपने परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की बात कितनी गहराई से की गई है। आपके इस लेख की टीप है पुत्र की अपेक्षा वृक्ष पर ध्यान देना। संस्कृत के श्लोक के माध्यम से यह आह्वान बहुत सार्थक लगा। यह हमारी परंपरागत सोच को आधुनिक पर्यावरण की चिंता से जोड़ने वाली बात है। दरअसल यह इस बात को भी रेखांकित करने की कोशिस है कि भारतीय चिंतन में पर्यावरण की चिंता यहाँ के निवासियों की आंगिक चिंता की तरह थी। यहाँ मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं वरन एक हिस्सा था। इस लेख के लिए साधुवाद स्वीकार करें आप.

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  4. Nutan Mishra says : bahut satik or parsngik aalekh vartman KO prachin se jod kr sundar udahar diye hai apne..

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  5. Mithai Lal, BHUsays : सच में जीवन सिर्फ़ स्वार्थ के लिये ही नहीं होता। हम मानव जाति इस धरती का एक हिस्सा हैं भले ही कुछ पल के लिये। वास्तव में आपके लेख हमें प्रेरित करते हैं कि एक बार गहराई से सोचा जाये इस जीवन की जड़ें किसमे हैं? अगर हमारी जड़ें ही नहीं रहेंगी तो हम कैसे रहेंगे और हाँ, वह कहावत कितनी सटीक बैठती है यहाँ ...जब बांस ही नहीं रहेगा तो बांसुरी कैसे रहेगी ?.......बहुत बहुत धन्यवाद मैम ।

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  6. बहुत सही और सटीक बात कही है शुभ्रा जी। सचमुच आधुनिकता के दम्‍ब और लाालच में अंधे होकर मानव बहुत कुुछ गंवा बैठा है। दिल्‍ली में पहले ढेरों बाावडि़यां अौौर तालाब हुआ करते थे। दिल्‍ली देहात में तालाबों की अच्‍छी खासी ताादाद थी,लेकिन देेखते ही देखते उनको भरवा दिया गया और वहां निर्माण हो गये। और अब इस बात को लेकर परेशानी हैै कि भूजल स्‍तर तेजी सेे घट रहा है।जहां तक पेड़ लगाने की बात यह हैै, तो उसका हाल कुछ ऐसा ही हैै कि बहुत सी कॉलोनियों में अब पार्कों को पार्किंग में तब्‍दील किया जा रहा है। उनमें जो दरख्‍त पहले से लगे थे, वेे गाडि़यों के प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। हमारे पूूर्वज प्र्कृति को लेकर हमसे कहीं ज्‍यादा संंवेदनशील और दूरदर्शी थे हमाारे विकास का चक्र कैसे-कैसे विनाश के बीज अपने साथ बाेेता गया,हम जान ही न सके। आपका लेख झकझोरता हैै, कचोटता हैै, सोचने पर मजबूर करता हैै,अपराधबोध जगाता हैै,लेकिन बहुत ज्ञानवर्धक हैै....आप इसी तरह लिखती रहिए शुभ्रा जी।

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  7. अति खूबसूरत एवं प्रासंगिक।

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