Monday, May 02, 2016

कवि - समय

भाई इन कवि लोगों का कोई जवाब नहीं!

कहाँ-कहाँ पहुँच जाते हैं ! क्या-क्या देख लेते हैं ! और काफ़ी कुछ तो ऐसा देख लेते हैं जो किसी और ने सपने में देखा-सुना या सोचा भी न हो। अजन्मे बच्चों से बात कर लेते हैं। पर्वत, जंगल, नदी, फूल, भँवरे से मिताई कर लेते हैं। और तो और, आसमान के किसी कोने से बादल ज़रा सा झाँका नहीं कि उसे झट कामों की पूरी फ़ेहरिस्त थमा देते हैं - "सुन भाई, ज़रा लपक कर नत्थू की दूकान से मिठाई ले आ। और रास्ते में धोबी के यहाँ से ज़रा प्रेस के कपड़े भी उठा लेना। और सुन अम्मा कल से नीम्बू लाने को कह रही हैं। मैं तो जा नहीं पाया। ज़रा पूछ ले यार, अगर ज़रुरत हो तो उनसे पैसे लेकर उन्हें चार नीम्बू भी ला देना।"

सुना है ऐसे ही कामों की फ़ेहरिस्त गिनाते-गिनाते कालिदास का खण्डकाव्य तैयार हो गया और वे मेघदूत की रचना कर अमर हो गये। पर उसके बाद बादल भी सयाने हो गये। उन्होंने दूसरों की बला अपने सर लादने से साफ़ इंकार कर दिया - "ये क्या बात हुई - बेगार में खटें हम और मलाई खाये काम बताने वाला। ऐसी कम तैसी इन नालायकों की ! हम क्या इनके बाप के नौकर लगे हैं ? ये ससुर हमसे काम करायेंगे और ख़ुद वाहवाही लूटेंगे। हमारा काम है बारिश करना - वो कर देंगे। बस। और किसी काम की आस न रखना हमसे।"

तब तक कवियों की नज़र बादलों की तरफ से मुड़कर पेड़ों की तरफ आ गयी। उन्हें लगा पेड़ों में बादलों जैसा एका नहीं होगा। इनमें कोई छोटा है तो कोई बड़ा, कोई दुबला है तो कोई मोटा। किसी ने कई-कई गज ज़मीन घेर रखी है तो किसी के पास खड़े होने भर को ज़मीन नहीं है। कोई करीने से क्यारी में खड़ा है तो कोई बेतरतीब जड़ें फैलाये चला जा रहा है। किसी को खपच्ची की टेक मिली हुई है तो कोई छप्पर पर फैला हुआ है। इन्हें बरगला कर अपना उल्लू सीधा करना आसान रहेगा।

बस जी, फिर कवियों ने पेड़ों के कान में मन्त्र फूँकना शुरू कर दिया। एक से कहा - तुम वसंत के दूत हो, तुम्हारे फूलने से दुनिया को वसंत के आने का पता चलता है। दूसरे से कहा - तुम ही तो हो जिसके फूलने से धरती दुल्हन सी सज उठती है। एक अन्य को समझाया - तुम कामदेव के तरकश में रखे सबसे नुकीले तीर हो। तुम नर-नारी में प्रेम की उत्कंठा जगाते हो। तुम न हो तो सृष्टि ही ठप्प हो जाये।

हर पेड़-पौधा अपने आप को सर्वज्ञ और सर्व-शक्तिमान समझने लगा और दूसरे के रूप-रस-गंध से जलने-कुढ़ने लगा। कुछ ने तो नाराज़ होकर फूलने से इंकार कर दिया।

अब जब पेड़-पौधे नहीं फूले तो वसंत नहीं आया। वसंत नहीं आया तो कामदेव भी नहीं आये। कामदेव नहीं आये तो प्रेम का व्यापार नहीं चला और जब प्रेम का व्यापार नहीं चला तो कवियों का धंधा भी मंदा पड़ गया। तब

कवियों को लगा - "यार,ये तो गड़बड़ हो गयी। ये फूले-फलेंगे नहीं तो हम क्या दिन-रात पतझड़ का वर्णन करेंगे? और ऐसा नीरस वर्णन पढ़ेगा कौन?"

बस उन्होंने आपस में सर जोड़कर मंत्रणा की और एक नया कौतुक रच डाला।

पहले श्लोक पढ़ लीजिये फिर समझाती हूँ कवियों की चतुराई।


स्त्रीणां स्पर्शात् प्रियंगुर्विकसति बकुलः सीधुगण्डूषसेकाद्

पादाघातादशोकस्तिलककुरबकौ वीक्षणालिंगनाभ्याम्।

मन्दारो नर्मवाक्यात्पटुमृदुहसनाच्चम्पको वक्त्रवातात्

चूतो गीतान्नमेरुर्विकसति च पुरो नर्तनात्कर्णिकारः।।


कवि कहते हैं कि स्त्रियों के स्पर्श से प्रियंगु फूल उठता है, और जब वे गन्ने के रस से बनी शराब अपने मुँह में भरकर कुल्ला करती हैं तब बकुल यानी मौलसिरी में फूल लगते हैं। इसी तरह अशोक का पेड़ चरण-प्रहार से, तिलक देखने से और कुरबक आलिंगन करने से पुष्पित होता है। मंदार का वृक्ष मीठी-मीठी बातों से और चम्पक मृदु मुस्कान से फूल उठता है। आम के पेड़ में अगर बौर न आ रहे हों तो उसका भी उपाय है। सुन्दर स्त्री के मुँह की हवा लगने से वह बौरा उठता है। नमेरु और कर्णिकार के वृक्ष ज़रा ज़्यादा शौक़ीन होते हैं - उनके आगे गीत-संगीत की महफ़िल सजानी पड़ती है - नमेरु गाना सुनकर और कर्णिकार नाच देखकर फूलता है।

चूँकि यह सारा मामला कवि - कल्पित था, इसका कोई ऐतिहासिक या पौराणिक आधार नहीं था इसलिये इसे कवि - समय कहा गया। यानी कवियों का ऐसा कहना है....... ऐसा मानना है.......


कवि मानें सो सब मानें। ख़ास तौर पर राजाजी तो मानें ही मानें। उन्हें अंतःपुर की सुंदरियों के इन तरह-तरह के कौतुकों से भला क्या आपत्ति होती ? उधर सुंदरियों को भी पेड़ों का आलिंगन करने, बतियाने-मुस्कुराने, नाचने-गाने और उन्हें लात मारने का मौक़ा मिल रहा था। वे भला क्यों आपत्ति करतीं? और कवि लोग? उनकी तो पाँचों उँगलियाँ घी में थीं। राजा से भी पुरस्कार पाते रहे और अंतःपुरिकाओं से भी। तभी तो कहती हूँ - इन कवि लोगों का कोई जवाब नहीं!





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