Thursday, May 26, 2016

हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुश्बू


आकाशवाणी की नौकरी से फुर्सत पाकर मेरे दो पसंदीदा काम हैं - संगीत सुनना और बाग़बानी करना। जब बगीचे में मेरे लगाये किसी पौधे में नयी कोंपल फूटती है या फिर कोई भूला-बिसरा गीत सुनने को मिल जाता है तो बड़े शुद्ध निर्मल आनन्द की अनुभूति होती है। पूरा दिन भर ख़ुशी-ख़ुशी बीतता है।

पिछले अक्टूबर में मैंने एक नारंगी का पौधा खरीदा था। बड़ा सा खूबसूरत गमला और उसमें ढेरों हरी पत्तियों के बीच से झाँकती छोटी-छोटी नारंगियाँ इतनी प्यारी लग रही थीं कि क्या बताऊँ ! जेब तो ख़ाली कर गया लेकिन मन को ख़ुशी से भर गया।

सर्दी का मौसम आया तो पत्तियाँ पीली पड़ने लगीं।
कुछ ही दिनों में सारी पत्तियाँ गिर गयीं और टहनियों पर गाँठ सी नारंगियाँ भर रह गयीं।
दो महीने के खाद-पानी के बावजूद जब पौधे पर एक भी पत्ती के दर्शन नहीं हुए तो आख़िरकार दुखी मन से मैंने नारंगियाँ तोड़कर मीठी चटनी बना डाली।
 कुछ दिन और बीते। दूसरे-तीसरे दिन पानी दे देती पर निराश मन से सोचने लगी थी कि अब इस गमले में क्या लगाऊँगी।
एक दिन अचानक सूनी टहनी पर नयी पत्ती की झलक देखी तो आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन अब यकीन हो चला है कि मेरे सब्र का खट्टा ही सही, फल ज़रूर मिलेगा।



पेड़-पौधों पर मौसम का असर तो जग-ज़ाहिर है।
पर क्या वे लोगों को भी पहचानते हैं ?
हो सकता है कि ये मेरा वहम हो.
मगर जब कभी मैं लगातार तीन-चार दिन
अपने पेड़-पौधों से नहीं मिल पाती तो
सब के सब मुँह लटकाये, शिकायत करते से
लगते हैं। और ज़रा दुलार से पानी दे दूँ,
पीली पत्तियाँ तोड़ दूँ,
आपस में उलझ रही पत्तियों को सुलझा दूँ ,
तो जैसे सबके चेहरे खिल उठते हैं ।
कुछ तो बात है !


मैं जब दिल्ली से ग्रेटर नोएडा आयी तो अपने सारे पेड़-पौधे भी लेकर आयी थी। आने-जाने और फिर नयी जगह घर-गृहस्थी जमाने के चक्कर में कई दिनों तक बेचारे बालकनी में अनाथ से खड़े रहे। समय मिलते ही मैंने उन पर ध्यान दिया। लेकिन मूवर्स एंड पैकर्स की कृपा से कुछ टहनियाँ टूट गयी थीं, कुछ गमले फूट गये थे और रेलिंग पर चढ़ी लताओं को तो कंधे से काट दिया गया था।
मुझे लगा शायद इस समय कोई माली इनकी देखभाल मुझसे ज़्यादा अच्छी तरह कर सकेगा। मैंने अपनी हाउसिंग सोसाइटी के माली को बुलाकर उसे यह ज़िम्मा सौंपा। उसने कुछ पौधों का प्राथमिक उपचार करके छोड़ दिया और कुछ को 'दवा और दुआ से परे' बताकर उखाड़ फेंका। उनके ख़ाली गमलों को भरने के लिए मैंने उससे कुछ मौसमी पौधे मँगवाये और उसी से लगवाये। जब तक मेरी दिनचर्या सामान्य हुई उसके लगाये पौधे मर चुके थे और उसके सहेजे पौधों पर सफ़ेद लिजलिजे कीड़े लग चुके थे। उसके बाद भी मैंने उस माली से कुछ लौकी-कद्दू के बीज लगवाये लेकिन हर बार उसके हाथ से लगाये पौधे मर गये। 

     मेरे घर में खाना बनाने वाली पुष्पा ने मुझे एक पका करेला लाकर       दिया। बोली - लो दीदी, इसे बो दो फिर आराम से करेले खाना। मैंने       करेले के वो लाल-लाल बीज एक ख़ाली गमले में लगा दिये। कुछ         दिन बाद नाज़ुक टहनियाँ और पत्तियाँ निकल आयीं। फिर उन           टहनियों में से बाल जैसी पतली-पतली टेंड्रिल्स निकलकर आस-         पास की हर चीज़ को थामने की कोशिश करने लगीं। उनकी सहारे       की ललक देखकर मुझे लगा कुछ तो इंतज़ाम करना पड़ेगा।

 घर ठीक करने वाले मज़दूर छत पर बाँस-बल्लियों की कुछ अनगढ़ चीज़ें छोड़ गए थे, एक सीढ़ी थी और एक स्टैंडनुमा चीज़ जिसे वो "घोड़ी" कहते थे। मैंने घोड़ी को छत के एक कोने में जमाया और उस पर सीढ़ी का छप्पर तान दिया। करेले के गमले को उसके पास रखा और सुतली का एक जाल सा बाँध दिया। रास्ता दिखाने भर की देर थी। करेले की बेल सुतली को उँगलियों में थामे झट घोड़ी के ऊपर चढ़ बैठी। करेले तो दो ही बार खाये पर महीनों उसकी पतली उँगलियों की मज़बूत पकड़ देखी और दोस्तों को दिखायी।

 दिन-ब-दिन मेरा विश्वास पक्का होता जा रहा है कि लोगों की तरह पेड़-पौधे भी अपनों को, उनके हाथ को, उनकी ख़ुशबू को पहचानते हैं। हम जब उदास होते हैं तो वो भी उदास हो जाते हैं और हम खुश हों तो वो भी पत्तियाँ हिला-हिला कर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर देते हैं। और मुझे ... अपने लगाये किसी पौधे में पहली बार कोंपल फूटने पर, पत्तियाँ आने पर, फूल खिलने पर जो बेतहाशा ख़ुशी होती है, कैसे बताऊँ?





कालिदास का श्लोक याद आता है। महर्षि कण्व शकुन्तला को विदा करते हुए आश्रम के पेड़-पौधों से कहते हैं -
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्
आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्याः भवत्युत्सवम्
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहम् सर्वैरनुज्ञायताम्।।

यह शकुन्तला, जो तुम्हें पानी दिये बिना कभी पानी नहीं पीती थी, जिसे गहने प्रिय थे पर तुम्हारे स्नेह के कारण पत्ते नहीं तोड़ती थी, तुम्हारे पहली बार फूलने पर जो आश्रम में उत्सव मनाती थी, वही शकुन्तला आज पति के घर जा रही है, तुम सब अपनी लाड़ली बेटी को जाने की आज्ञा दो।

4 comments:

  1. यह तो मैंने भी अनुभव किया है जीजी। तेज गर्मी के बाद बरिश की बुँदे पड़ते ही पौधे हिल डुल कर नाचते हैं(मानो चहक रहे हों) कि उन्हें देखकर मन खुश हो जाता है।

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  2. बाई द वे... इस गीत के बोल कभी समझ में नहीं आए। आँखों की खुशबू देखी.. व भी महकती हुई...???

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    1. वही विरोधाभास तो गीतकार की उपलब्धि है। आँखों की खुशबू नहीं होती, महक देखी नहीं जाती, न हाथ से छुई जाती है, यह सब एहसास के ज़रिये महसूस ही किया जा सकता। एहसास में शिद्दत होनी चाहिये तो कठौती में गंगा मिल जाती है।

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    2. वही विरोधाभास तो गीतकार की उपलब्धि है। आँखों की खुशबू नहीं होती, महक देखी नहीं जाती, न हाथ से छुई जाती है, यह सब एहसास के ज़रिये महसूस ही किया जा सकता। एहसास में शिद्दत होनी चाहिये तो कठौती में गंगा मिल जाती है।

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