Monday, June 06, 2016

अम्बुआ की डारी बोले कारी कोयलिया

मेरी नानी 
संगीत का शौक हमारे घरवालों का पुश्तैनी मर्ज़ है। मेरे परनाना पंडित श्याम सुंदर जी बदलते मौसम के अनुरूप होली, चैती, कजरी गुनगुनाते रहते थे। उनकी बड़ी बेटी यानी मेरी नानी केसर कुँवर अपने बाल गोपाल से सारी बतकही गीतों में करती थीं - सुबह सवेरे- "जागिये ब्रजराज कुँवर पंछी बन बोले", श्रृंगार करते समय- "राधे प्यारी दे डारो ना बंसी मोरी" और भोग लगाते समय- "आली म्हाने लागे बृंदावन नीको"। संगीत का यही संस्कार उन्होंने अपनी दोनों बेटियों यानी हमारी माँ-मौसी को भी दिया।

मेरी मौसी और माँ 

तब तक घर में कुत्ते की फोटू वाला चूड़ी बाजा यानी HMV का ग्रामोफ़ोन आ चुका था और दोनों बहनें अपने जेब-ख़र्च से पैसे बचाकर ख़ूब रिकॉर्ड खरीदा करती थीं। शादी के बाद वे दोनों तो पराये घर चली गयीं लेकिन उनके चुन-चुनकर जमा किये रिकॉर्ड, मय ग्रामोफ़ोन के वहीँ रह गये। अब मेरा बचपन चूंकि ननिहाल में बीता इसलिए मैं अकेली ही इस विरासत की हक़दार बनी।

उन रिकार्ड्स में तिमिर बरन, के सी डे, के एल सहगल, जूथिका रे, सचिन देब बर्मन, हेमन्तो मुख़र्जी, खुर्शीद, नूरजहाँ, जैसे परिचित-अपरिचित बहुत से नाम थे। सच पूछिए तो उन दिनों मेरी दिलचस्पी गानों में कम और ग्रामोफ़ोन की सुई बदलने या उसकी चाभी भरने में ज़्यादा रहती थी। फिर भी गाने कान में पड़ते रहते थे और याद भी हो जाते थे। ऐसा ही एक गाना था --

अम्बुआ की डारी बोले कारी कोयलिया, आजा बलमुआ हमार।


चार-पाँच साल की बच्ची को शायद ये गाना इसलिए भी पसंद आया होगा क्योंकि इसकी रिदम बड़ी ज़बरदस्त है, पैर अपने आप ठुमकने लगते हैं। बाद में जाना कि ये गाना आशा भोंसले ने निखिल घोष के निर्देशन में गाया था। निखिल जी प्रख्यात बाँसुरी वादक पं० पन्नालाल घोष के छोटे भाई थे और तबला और सितार दोनों में महारत रखते थे।

कुछ बड़ी हुई और साहित्य-संगीत की अपनी समृद्ध विरासत को जानने-समझने के क़ाबिल होने लगी, तब मेरा परिचय एक और गीत से हुआ जिसमें अम्बुआ की डाली पर कोयल बोलने की बात थी। गोदान फिल्म के लिये मुकेश ने गाया था -

हिया जरत रहत दिन रैन, हो रामा, जरत रहत दिन रैन
अम्बुआ की डाली पे कोयल बोले, तनिक न आवत चैन।



यह फ़िल्म हम लोगों को स्कूली पढ़ाई के हिस्से के तौर पर दिखायी गयी थी। एक तो प्रेमचंद जी के उपन्यास पर आधारित थी, फिर उसे बनारस के एक परिचित सज्जन ने बनाया था, तीसरे संगीत दिया था विश्व विख्यात पंडित रवि शंकर ने।

लेकिन इससे यह नहीं समझ लेना चाहिये कि आम का पेड़ सिर्फ़ कोयल के ही काम आता है। हम लड़कियों के लिये भी बड़े काम का है यह। कौन सी लड़की होगी जिसने चटनी के लिये आये टिकोरों में से दो-चार टिकोरे नहीं चुराये होंगे ? आम तौर पर मैं काफ़ी आज्ञाकारी बालिका थी लेकिन जब टॉन्सिल बढ़ जाने की आशंका से आम-इमली पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा हुआ हो तो इत्ती थोड़ी-सी हाथ की सफ़ाई तो दिखानी ही पड़ती थी।

पके आम मुझे पसंद नहीं थे। बड़े मान-मनुहारों के बाद केवल लंगड़ा आम खाती थी और उसकी भी फाँकें नहीं, सिर्फ गुठली। लेकिन गाना पसंद था -

लाल-लाल होंठवा से बरसे ललैया हो के रस चुएला
जइसे अमवा के मोजरा से रस चुएला।
लागे वाली बतियां न बोल मोरे राजा हो करेजा छुएला
तोरी मीठी-मीठी बोलिया करेजा छुएला।



गाना बड़ा खूबसूरत है। ख़ास तौर पर तलत साहब की आवाज़ इसे और भी मीठा बना देती है। लेकिन न जाने क्यों मेरी नानी ने इस पर टोटल बैन लगा रखा था। गाने ही नहीं देती थीं। कभी भूले भटके शुरू कर दूँ तो फ़ौरन इशारे से बरज देतीं। अब नौकरी से अवकाश ग्रहण कर ग्रेटर नोएडा में रहती हूँ और आम काटते हुए जी खोलकर यह गाना गाती हूँ - कि जइसे अमवा के मोजरा से रस चुएला, हो जी रस चुएला।

एक और गीत है, जो मेरे ही नहीं, हिन्दुस्तान की लाखों बेटियों के दिल के बहुत करीब है।

अब के बरस भेज भैया को बाबुल सावन माँ लीजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ दीजो संदेसा भेजाय रे।
अम्बुआ तले फिर से झूले पड़ेंगे रिमझिम पड़ेंगी फुहारें
लौटेंगी फिर तेरे आँगन में बाबुल सावन की ठंडी बहारें
छलके नयन मोरा कसके रे जियरा बचपन की जब याद आये रे।

14 comments:

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  2. बहुत गजब का लिखा है यह संस्मरण और गाने तो वाकई... आनंद आ गया

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  3. पढ़ कर मज़ा आ गया। बहुत सुंदर

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  4. पढ़ कर मज़ा आ गया। बहुत सुंदर

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  5. Pratima says : मनभावन, मनस्पर्शी, मनमोहन, मन्वन्तर !
    दीदी मज़्ज़ाsss आ गया क़सम से :-D
    सबर टूट गया। जा रही हूँ 'टिकोरा' खाने, वो भी काले नमक के साथ :-P :-P

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  6. Madhuri Subodh says : अनुभव अौर अंदाज़े बयां दोनों अद्‌भुत हैं शुभ्राजी ! ललित अौर सरसाते । आमरस की धारा बहाते ! ऐसे ही िलखती रहिए अौर हम पढ़ते रहें । वाणी की िवरासत है आपके पास ! ईश्वर का आशीर्वाद !

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  7. Tulika Sharma :-
    दिदिया !!
    आपको पढ़ना ...आपके अतीत को आपके साथ जीना है
    टिकोरा, बरजना ये शब्द कितने दिन बाद सुने..
    सहेजने सँभालने का काम उन्हें करना ही होगा जो जानते समझते हैं
    ...
    ....
    मन्वन्तर की एक नियमित पाठिका 😊

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  8. Sarita Lakhotia:-
    Hari Padam....Nani....Balai.....aur vo purana Belvaria !!
    Sab aankhon me tair rahe hain......
    Tum kab Banaras aa rahi ho ?
    Purani yaaden taaza karo....
    Aur Sundar Sundar likhti raho......
    Meri Pyari Shubhra !! :) :)

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  9. Kalpna Mishra :-
    दीदी आपको पढ़ना एक अनोखी अनुभूति होती है...
    टिकोरा... पढ़ते ही मुँह में पानी आ गया... घर तो घर स्कूल में भी मेरी एक दोस्त बैग में छुपा के टिकोरे और नमक लाती और हम सारे दोस्त छुपकर उसे ब्लेड से छीलकर टीचर की नज़रों से बचकर चटखारे ले ले कर खाते... और जब कभी पकड़े जाते तो डाँट पड़ती सो अलग... हमारे सारे टिकोरे भी जब्त कर लिए जाते :D :D

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  10. Mithai Lal :-
    हर प्रकार के मोती का खज़ाना आपके पास है मैंम ....आप हमेशा ही ऐसे विषय को चुनती हैं जो यादों की दुनिया को असंख्य खुशबुओं से भर देता है ।
    https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1615911218723501&set=p.1615911218723501&type=3

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  11. Suresh Awasthi :-
    अत्यंत सरस और लालित्य पूर्ण संस्मरण

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  12. Suman Keshari :
    आनंद आ गया

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  13. Archna Pant :
    हाय सच्च! कितना सुन्दर लिखतीं हैं आप!...कितना रसमय!...कितना सजीव!
    जितनी बार पढूँ इसे वैसा ही अद्भुत लगता है!पापा को भी पढ़ कर सुनाया .... भावुक हो गए!
    बउआ-बाउजी की,हरि पदम् की स्मृतियाँ रोकते रोकते भी छलक ही आयीं!
    गीतों की उस परम्परा के बारे में मैंने भी बहुत सुना है और कुछ कुछ देखा भी है
    मेरी माँ का ये अटल विश्वास था कि माँ सरस्वती आपके परिवार पर विशेष रूप से सनाथ हैं इसीलिए (मुझे बतातीं थीं कि) मेरे होने पर उन्होंने, आपकी मौसी जी से ही मुझे घुट्टी पिलवायी थी ... बाद में उन्ही से पूछ पूछ कर संगीत की शिक्षा भी दिलवायी गयी ... कई कई शामें उन्होंने स्वयं मुझे नृत्य सिखाने की भी कोशिशें की .... ख़ास तौर पर "राधा ना बोले, ना बोले, ना बोले रे..." पर तो कमाल की भाव मुद्राएं सिखातीं थीं ...
    अहा! आपका बस लिखना ... और जाने कैसी कैसी स्मृतियाँ आँखों के आगे तैर गयीं .... बीते हुए कितने ही पल आँखों के आगे किसी धृष्ट, उद्दंड बालक से खड़े हो गए....
    पर इस बार ... आपने अवाक ही कर दिया !
    लेखनी का जादू तो है ही ... उस पर ऎसी ऎसी दुर्लभ तस्वीरें ....
    सच्च! निःशब्द ही हूँ!
    सबसे ऊपर बउआ का चित्र ... अहा! कैसा सम्मोहन है उसमें!
    फिर आपकी वो इत्ती प्यारी सी बचपन की फोटो,फिर, औंटी और मौसी की कितनी कमाल-कमाल की तस्वीरें ...जितनी बार पढने की कोशिश कर रही हूँ ... आँखें तस्वीरों में ही चिपक के रह जा रहीं हैं ...
    गीत तो सब एक से एक हैं ही ...
    पर वो "अब के बरस भेज भैय्या को बाबुल" कैसा तो रुलाता है, है ना?
    आपके साथ स्मृतियों का ये सफ़र ... सचमुच अद्भुत है!

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  14. बहुत सुन्दर लिखा है अपने। एक दूसरे के साथ माला पिरोते हुए। सभी गाने। अभी जा रही हूँ सुनने। जब भी लिखें, लिंक शेयर करें। मज़ा आ गया।

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