Wednesday, November 23, 2016

सिनेमा के रंग, बनारसी मस्ती के संग - (भारती सिनेमा)

आदरणीय काशीनाथ सिंह जी वाली अस्सी चौमुहानी से दुर्गाकुंड की ओर जाने वाली सड़क पर एक छोटा सा, नन्हा-मुन्ना सा, सिनेमा हॉल था - भारती। हमारे बचपन के दिनों (1962-1969) में भी वह बहुत पुराना हो चुका था और वहाँ सिर्फ़ रियायती दर पर पुरानी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। संयोग से वो हॉल मेरे घर के बहुत पास था। सड़क से जायें तो आधा किलोमीटर और अगर साधुबेला आश्रम वाली पतली गली पकड़कर लपक जायें तो बस चार मिनट।
भारती सिनेमा के इतने नज़दीक होने का प्रताप था कि हमने देव आनंद और राज कपूर की तमाम पुरानी फ़िल्में देख ली थीं। जाल, बाज़ी, जाली नोट, काला पानी, काला बाज़ार, आवारा, श्री 420, और ऐसी ही और कई। दिलीप कुमार की फ़िल्में देखने में हमारी दिलचस्पी कम थी मगर कभी-कभी माँ-मौसी का साथ देने के लिए देखनी पड़ती थीं। नानी हमारी, अशोक कुमार की बहुत ज़बरदस्त फ़ैन थीं इसलिये किस्मत और संग्राम भी देखीं। सबसे ज़्यादा ज़ुल्म तब हुआ, जब अशोक कुमार-सुचित्रा सेन की फ़िल्म ममता घूमती-घामती भारती में प्रदर्शित हुई और हमें एक सप्ताह में चार बार देखनी पड़ी।
यही एक हॉल था, जिसमें हमें "भले घर की लड़कियों की तरह" पूरे परिवार के साथ नहीं जाना पड़ता था, बल्कि किसी भी ममेरे फुफेरे भाई या बहन के साथ फिल्म देखने की आज़ादी थी। यह सत्य उजागर होने के बाद मेरे सभी भाइयों ने मुझे फिल्म दिखाने को अपना परम पुनीत कर्तव्य मान लिया था। भारती में बृहस्पतिवार को फ़िल्म बदलती थी इसलिये वे मंगलवार या बुधवार को तीन बजे से काफी पहले मेरे घर पहुँच जाते। आँखों-आँखों में बातें हो जातीं। उसके बाद मैं निहायत अफ़सोस से कहती -"हाय, मेरा ये फ़िल्म देखने का बड़ा मन था लेकिन कल से तो ये बदल जायेगी।"
भाई कहता - जाओ, आज देख आओ।
मैं कहती - किसके साथ जाऊँ ?
तो वह कर्तव्य की बलिवेदी पर न्योछावर होने वाले अंदाज़ में कहता - चलो, हम दिखा लाते हैं मगर अभी तुरंत चलना हो तो चलो, शाम को हमें कुछ ज़रूरी काम है।
और इससे पहले कि बड़े लोग हमारी मिलीभगत को भाँपे हम साधुबेला वाली गली से भाग जाते।
भारती में फिल्म देखने का एक बड़ा आकर्षण इंटरवेल में मिलने वाली खाने-पीने की चीज़ें भी थीं। इंटरवेल से दो-तीन मिनट पहले कोकाकोला और लेमन-सोडा बेचने वाले, बोतल खोलने वाली चाबी से बोतलों के गले पर प्रहार करते हुए अद्भुत ताल-तरंग पैदा करते थे। हालाँकि गला ख़राब होने के डर से हमें ठंडा पीने की अनुमति नहीं थी। (हम काफ़ी बेवक़ूफ़ बच्चे थे क्योंकि हमने कभी उस निषेधाज्ञा को तोड़ने की कोशिश नहीं की) दस पैसे की नमकीन की पुड़िया और चार आने की मूँगफली से अगले डेढ़ घंटे तक टूँगने के लिए पर्याप्त मसाला मिल जाता था। मूँगफली बेचने वाला एक ख़ास टेर लगाता था - ए, चीनिया बादाम बालु का भुना। मुझे अँधेरे में उसकी नक़ल करने में बहुत मज़ा आता था। कभी-कभी तो इतनी शानदार नक़ल करती कि लोग मेरी दिशा में मुँह करके चिनिया बादाम माँगने लगते।
भारती की बालकनी का फ़र्श लकड़ी का बना हुआ था। शायद पहले कोई कोल्ड स्टोरेज या गोदाम रहा होगा फिर किसी की व्यवसायी बुद्धि ने उसी ढाँचे को सिनेमा हॉल में परिवर्तित कर दिया था। बालकनी में बहुत कम लोग होते थे, इसलिए हमें ज़ोर-ज़ोर से हँसने और गानों के साथ सुर मिलाने की पूरी सुविधा होती थी। मुझे याद है कि एक मुसाफ़िर एक हसीना और फिर वही दिल लाया हूँ देखते हुए हम ओ पी नय्यर की धुनों में ऐसे बह गए थे कि कई बार नीचे बैठे लोगों की गालियाँ सुननी पड़ी थीं। नय्यर साहब की ढोलक बजते ही पैर ख़ुद-ब-ख़ुद ताल देने लगते थे। लकड़ी के फर्श पर हमारे जूते-चप्पल बजते, तो नीचे बैठे लोगों की खोपड़ी चटकने लगती और वे ख़ालिस बनारसी अंदाज़ में हमें अपनी उपस्थिति का बोध करा देते।
भारती सिनेमा की एक और ख़ासियत थी। वहाँ रविवार की सुबह अंग्रेज़ी पिक्चर दिखायी जाती थीं। उस दिन, उस शो में भारती का व्यक्तित्व और चरित्र बिलकुल बदल जाता था। उस दिन वह सरकारी अफ़सरों, डॉक्टरों-वकीलों और यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरों के मिलने-जुलने का साधन होती थी। उस दिन हम भी वहाँ पतली गली से न जाकर, कार में सवार होकर जाते थे। नानी बढ़िया सिल्क की साड़ी और नानाजी सूट पहनते थे।




अगर जेम्स बॉन्ड या हेरोल्ड रॉबिन्स के किसी उपन्यास पर बनी फ़िल्म हो तब तो कहना ही क्या। हमने वहाँ कम सेप्टेम्बर, गोल्डफिंगर, थंडरबॉल, कार्पेट बैगर्स, डॉ ज़िवागो, ज़ेपलिन, जैसी बहुत सारी अंग्रेज़ी फ़िल्में देखीं। गॉन विथ द विंड और स्पेस ओडिसी तो चारों शो में प्रदर्शित हुई थीं।
मेरा मौसेरा भाई दीपक, जो उन दिनों जयपुर में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था, छुट्टी में बनारस आया था। रविवार की सुबह भारती में पैटन फ़िल्म दिखाई जानी थी, जो दूसरे विश्व युद्ध के हीरो, अमेरिकी जनरल जॉर्ज एस पैटन पर आधारित थी।
बातों ही बातों में दीपक ने कहा - रविवार की सुबह अंग्रेज़ी पिक्चर देखने पहुँचने वाले सिर्फ़ शान बघारने के लिए जाते हैं, किसी को कुछ समझ में नहीं आता।
मुझे यह बात बिलकुल पसंद नहीं आयी। लगा कि वह मेरे शहर का और मेरा अपमान कर रहा है। ख़ूब बहस हुई। उसने कहा - मैं साबित कर दूँ, तब तो मानोगी?
मैंने कहा - ठीक है, मान लूँगी लेकिन पहले साबित तो करो।
हम फ़िल्म देखने गये। हमारे साथ दो ममेरे भाई भी थे। दीपक ने उनसे कुछ साठ-गाँठ कर रखी थी।
अचानक एक गम्भीर दृश्य के बीच दीपक ज़ोर से हँसा। कुछ और संवाद हुए, उसके बाद तीनों लड़के हँस-हँसकर लोट-पोट होने लगे। मेरे आँख तरेरने का भी कोई असर नहीं हुआ।
पूरी पिक्चर में ये लोग इसी तरह बेवजह हँसते रहे और धीरे-धीरे सारा हॉल दीपक के हर ठहाके में उसका साथ देने लगा। यहाँ तक कि अंत में पैटन की हत्या की योजना के बीच भी वह लोगों को हँसाकर ही माना।
आख़िरकार मुझे मानना ही पड़ा कि अंग्रेज़ी पिक्चर देखने वाला हर शख़्स अंग्रेज़ी का विद्वान नहीं होता।







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