Thursday, July 07, 2016

जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे


आषाढ़ महीने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलते हैं, भाई-बहन के साथ रथ पर सवार होते हैं और वर्षा ऋतु का आनंद लेने निकल पड़ते हैं। उनकी इस पिकनिक में उनकी पत्नी साथ नहीं होतीं लेकिन लाखों की संख्या में उनके अनुयायी साथ होते हैं। अनुयायी का शाब्दिक अर्थ ही है - साथ चलने वाला - उर्दू में जिसे कहते हैं हमसफ़र।

कैसी अजीब बात है? घूमने निकले हैं लेकिन जीवन-साथी को साथ लेकर नहीं चल रहे। साथ में लिया है बड़े भाई को, लाड़ली बहन को और हज़ारों-हज़ार अनुयायियों को।



बचपन से ही ऐसे थे। घर में दूध-दही के मटके भरे रहते थे लेकिन उन्हें तो दूसरों के घर से चुराकर खाना भाता था। वो भी अकेले नहीं, सब सखाओं के साथ। माखन चुराने, खाने और लुटाने की ऐसी बान पड़ी कि गोपियों ने माखनचोर नाम ही रख दिया। पकडे जाते तो भोली सूरत बनाकर कह देते-


मैं बालक बँहियन को छोटो छींको केहि बिधि पायो
ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुख लपटायो।
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। ​

अब इस तरह की शरारतें और बहानेबाज़ी कोई भला आदमी अपने बाल-बच्चों के सामने नहीं कर सकता न, इसलिए उन्हें साथ लेकर नहीं आये हैं। भाई-बहन सब कुछ जानते हैं, इसलिए उन्हें साथ ले लिया है। और साथी न हों तो शरारतों का मज़ा ही क्या? इसलिए खुला निमंत्रण है, जिसे संग आना हो आओ। साथ चलो। रथ चलाओ। रथ पर आकर मुझसे गले मिलो। बरसात में भीगो। पकवान खाओ। बीमार पड़ो तो खिचड़ी खाओ। पूरी मस्ती करो। क्योंकि एक बार मंदिर के अंदर पहुँच गया तो फिर भगवान होने की, जगन्नाथ होने की मर्यादा निभानी पड़ेगी। अदब-क़ायदे से रहना पड़ेगा। जो भोग लगाया जायेगा, वही खाना पड़ेगा। जिस समय जो करने को कहा जायेगा, वही करना पड़ेगा। तब ऐसा निर्बाध आनंद कहाँ मिलेगा।



मंदिर में दर्शन मिलते हैं। साहचर्य नहीं मिलता। तभी तो बंधन तोड़कर भागे हैं। गुंडिचा मंदिर जायेंगे। मौसी के घर जायेंगे। राजसी भोग नहीं, आम लोगों की तरह 'पोड़ा पीठा' खायेंगे। रूठी हुई पत्नी मंदिर में नहीं घुसने देगी तो अपराधियों की तरह रात भर बाहर खड़े रहेंगे। तरह-तरह से उसे मनाने की कोशिश करते रहेंगे। और जब वो रसगुल्ले की माँग करेगी तो उनके सारे साथी दौड़ पड़ेंगे। जहाँ कहीं रसगुल्ला मिलेगा, सीधा जगन्नाथ जी के हाथ में पहुंचा दिया जायेगा कि लो भैया, अपनी रूठी पत्नी को मना लो। दोस्त ऐसे ही तो एक दूसरे के काम आते हैं। ​

तो मेरी आपको यही सलाह है कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने हों तो वर्ष का कोई भी दिन-महीना चुन लीजिये पर अगर सखा कृष्ण से भेंट करना चाहते हैं तो रथयात्रा के समय उनके साथ लग जाइये। मिल ही जायेंगे कहीं न कहीं।


5 comments:

  1. There is another version to it. "Mousi" here is not mother's sister. She is "Pournamasi", a woman devotee of Lord Jagannath, who earned his companionship for a week through her love and devotion for the lord. Lord Jagannath leaves his home in the cover of cloud and rain and proceeds to her abode, Her consort is so infuriated that he is kept waiting at the door when he returns, till he cajoles her to get the entry.

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    1. Thanks for this information. We have these stories stored at the back of our minds and they come out only when we hear or read something related to them. I had visited Puri in nabakalevara year 1977 during Rathyatra. It was an unforgettable experience.

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  2. Bohot maza aaya padhke... Both versions...

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  3. बहुत सुन्दर अभव्यक्ति... पढ़कर मन खुश हो गया... Amar mudi जी द्वारा गयी जानकारी मेरे लिए नई थी... उन्हें भी मेरा धन्यवाद!!!

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