Saturday, July 16, 2016

झूला पड़ा कदंब की डारी



मीना कुमारी की एक फ़िल्म आई थी - बहू बेगम, जिसमें वो और उनकी सहेलियाँ झमाझम बरसते पानी में झूला झूल रही थीं।

पड़ गए झूले सावन रुत आई रे।

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संयोग की बात है कि मैंने यह फ़िल्म ऐसी उम्र में देखी थी, जब सहेलियों के साथ सैर-सपाटा, मौज-मस्ती कर पाना जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा और सबसे बड़ी उपलब्धि लगती थी। मत भूलिये यह साठ का दशक था, जब छोटे शहरों की लड़कियों पर दुनिया भर की पाबंदियाँ होती थीं। मेरा परिवार तो काफ़ी आधुनिक चिंतन वाला परिवार था, फिर भी घर के ठीक सामने रहने वाली वीणा के घर नोट्स लेने जाना हो तो नौकर साथ जाता था और साथ लेकर ही लौटता था। ऐसे में सहेलियों के साथ झूला झूलने का अवसर सिर्फ स्कूल के अंदर ही मिल पाता था और वहाँ दाइयाँ हर वक़्त डराती रहती थीं -

ऐ! ऐ! चला लोगन, भीजा जिन। नाहिं, अबहीं जाइके बाई जी (प्रिंसिपल लीला शर्मा जी) के बताईल।

लीला दी ने शायद ही कभी किसी को डाँटा हो, फिर भी उनका ख़ौफ़ ऐसा था कि हम फ़ौरन झूला छोड़कर ग़ायब हो जाते थे।

ऐसे में बार-बार ध्यान आता था कि गोकुल-बृंदावन में कैसा आनंद रहा होगा जहाँ गोपी-ग्वाल, राधा-कृष्ण मिलकर झूलते थे और कोई उन्हें प्रिंसिपल के नाम से डराता भी नहीं था।


कदम्ब पर झूल रहीं राधे जू, साँवरिया दे रह्यो झोंटा।







कदम्ब के पेड़ का राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंग में बड़ा महत्त्व है। मैथिल कवि विद्यापति का पद है -

तट तरंगिनि, कदम कानन, निकट जमुना घाट। उलटि हिरइत उलटि परली, चरन चीरल काँट।। 
राधा याद कर रही हैं कि उस दिन यमुना के घाट पर, कदम्ब के वन में उलट कर कृष्ण को क्या देखा कि जैसे मैं स्वयं ही उलट गयी। चरण में काँटा चुभ गया और मन घायल हो गया।

​लेकिन कामदेव ने अकेले राधा को ही निशाना बनाया हो, ऐसा नहीं है। सखियाँ कहती हैं - तुम्हीं नहीं हो, कान्ह भी तुम्हारे लिए पागल हैं। तुम्हारे गुणों पर लुब्ध हो गए हैं। कहीं और जा रहे हैं, पर आँखें इधर ही लगी हैं। ऐसे लुभाए नयनों को हटा भी कैसे सकते हैं। वे अगर नटवर नागर हैं तो तुम भी उनसे कम नहीं, बराबर ही हो। तुम दोनों जैसे एक ही डाल पर खिले हुए दो फूल हो। कवि विद्यापति कहते हैं कि कामदेव ने एक ही तीर से दो जीवों को मार दिया है।
ये सखि ये सखि न बोलहु आन, तुअ गुन लुबुधलनि अब कान।
अनतहु जाइत इतिहि निहार,लुबुधल नयन हटाये के पार।
से अति नागर तों तसु तूल, याक बल गाँथ दुई जनि फूल।
भन विद्यापति कवि कंठहार, यक सर मन्मथ दुई जीव मार।
कवियों की बात मानें तो पाण्डवों के इंद्रप्रस्थ से कृष्ण के वृंदावन तक पूरा का पूरा यमुना तट ताल, पियाल, तमाल और कदम्ब के घने वनों से भरा हुआ था। राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन इन पेड़ों के वर्णन के बिना अधूरा है। जयदेव और विद्यापति से लेकर सूरदास और मीरा तक सभी इनका नाम लेते नहीं थकते। इन वनों के आस-पास रहने वाले इन्हें ख़ूब अच्छी तरह जानते-पहचानते रहे होंगे।तब स्कूली बच्चों को इनके फोटो और डिस्क्रिप्शन ढूंढ़कर लाने का हॉलिडे होमवर्क नहीं मिलता होगा और न पर्यावरण-प्रेमियों को इको सिस्टम बिगड़ने की चिंता करनी पड़ती होगी। आज ज़रा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों से पूछकर देखिये,उनमें से कितने कदम्ब का पेड़ पहचान सकते हैं।

लगभग पच्चीस वर्ष पहले की बात है। दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र से सुबह संस्कृत का साप्ताहिक कार्यक्रम प्रसारित होता था। मेरा भी उसमें थोड़ा-सा योगदान रहता था। हमने मेघदूत पर आधारित कुछ कड़ियाँ प्रसारित करने की सोची। श्लोकों के सस्वर पाठ की रिकॉर्डिंग हो गयी। उन पर विज़ुअल डालने के लिए बादल-बरसात, खेत-खलिहान, फूल-पत्ते, सारस-बगुले के स्टॉक-शॉट्स मिल गये, लेकिन कदम्ब नहीं मिला। और मुझे ज़िद्द चढ़ गयी कि बिना कदम्ब के मेघदूत प्रसारित नहीं होगा। प्रोड्यूसर दुर्गावती सिंह समझाती रहीं कि सरकारी तंत्र में ऐसे ही काम करना पड़ता है। 

नहीं मिलता कदम्ब तो जाने दो, किसी और पेड़ को डिफ्यूज़ करके काम चला लेंगे। मैंने उनसे एक दिन की छुट्टी माँगी और अपनी मारुति लेकर कदम्ब की तलाश में निकल पड़ी। न जाने कितनी नर्सरी, पार्क और लाइब्रेरी छान मारीं लेकिन कहीं कदम्ब नहीं मिला। कुछ खाने के लिए बंगाली मार्किट पहुँची तो वहाँ मुझे अपना बचपन का साथी कबीर मिल गया। लेडी श्री राम कॉलेज में मेरी माँ हिंदी और उसकी माँ उर्दू पढ़ाती थीं। कॉलेज कम्पाउंड में हमारे घर भी पास-पास थे। 

अम्मा के रिटायर होने पर हम कालकाजी चले गए थे मगर वे लोग अब भी वहीँ रहते थे। गप-शप के बीच जब मैंने उसे बताया कि मैं सुबह से कदम्ब का पेड़ तलाश कर रही हूँ तो उसने पूछा कैसा दीखता है। मैंने उसे मेघदूत का श्लोक सुनाया, जो मुझे बहुत प्यारा लगता है -
त्वत्सम्पर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः
कदम्ब के फूल ऐसे लग रहे थे जैसे बादल के आने से पुलक उठे हों, रोमांचित हो गए हों।
कबीर ने मुझे टोककर पूछा - लड्डू जैसा फूल होता है क्या?
मैंने कहा - हाँ।
बोला - बड़े-बड़े, लाइट ग्रीन कलर के पत्ते होते हैं ?
मैंने कहा - हाँ भाई हाँ।
कहने लगा - तो एल. एस. आर. में है न। कॉलेज ऑडिटोरियम के पीछे, जहाँ हम लोग खेला करते थे, ऐसे दो पेड़ हैं।

लो! इसे कहते हैं "गोद में लड़का नगर ढिंढोरा"! मैं सुबह से दुनिया-जहान की ख़ाक छानती फिर रही थी और कदम्ब घर के पिछवाड़े ही मौजूद था।

अगले दिन कैमरा टीम को लेकर गयी और वीडियो रिकॉर्डिंग कर लायी। इस मेहनत के बदले मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिला लेकिन मन कदम्ब के फूलों सा ही पुलकित हो उठा।

3 comments:

  1. Suresh Awasthi : वाह कदम्ब का पेड़! बहुत दिन बाद दिखा।

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  2. Aparna Anekvarna : लड्डू का पेड़!

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  3. Tulika Sharma : दिदिया, अपने ससुर की इस बरसी पर हमने आकाशवाणी कॉलोनी में कदम्ब के दो पेड़ रोपे हैं.... इस उम्मीद में कि बच्चे इसे देख सकेंगे और उस कविता को बेहतर समझ सकेंगे....
    माँ कदम्ब का पेड़ अगर यह होता जमना तीरे
    मैं भी उसपर बैठ कन्हैया बनता धीरे धीरे

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