Tuesday, May 29, 2012

क्या है ग़ज़ल?

उर्दू शायरी की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा है ग़ज़ल. यह बात दीगर है कि हिंदी पट्टी वाले उसे मूंगफली और तिल - गुड़ की गजक की तरह "गजल" बोल डालते हैं, लेकिन इससे ग़ज़ल के प्रति उनका लगाव तो कम नहीं हो जाता. जब तक ग़ज़लें बेगम अख्तर या फ़रीदा ख़ानम की आवाज़ में सुनने को मिलती थीं, कोई- कोई बिरले ही उसके मुरीद होते थे. लेकिन भला हो जगजीत और चित्रा सिंह का जिन्होंने ग़ज़ल को चुनिन्दा कद्रदानों की महफ़िल से निकाला और गली -मोहल्ले की खुली हवा में गुँजा दिया. फिर तो अकेले जगजीत ही क्यों, मनहर और पंकज उधास, चन्दन दास, तलत अज़ीज़, पीनाज़ मसानी और अहमद और मोहम्मद हुसैन के स्वर भी अक्सर सुनाई देने लगे. सरहद पार से मेहदी हसन और ग़ुलाम अली साहबान भी अक्सर इधर तशरीफ़ लाने और हमें अपनी ग़ज़लों से लुभाने लगे.
ग़ज़ल से हमारा परिचय तो खूब बढ़ा लेकिन सच पूछिए तो हम अब तक उसके सही स्वरूप से परिचित नहीं हैं. क्या है ग़ज़ल?
शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो ग़ज़ल हसीनों से या उनके बारे में बातचीत करने का तरीक़ा है. यह शब्द अरबी के गज़ाला और अंग्रेज़ी के gazelle से उर्दू में आया है. इसका अर्थ है खूबसूरत आँखों वाली हिरनी. ज़ाहिर है शेरो-शायरी की यह विधा ज़्यादातर हुस्न-ओ-इश्क़ की दास्ताँ बयान करने के काम में आती है. ग़ालिब भी जिन मीर साहब का लोहा मानते थे - ( रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब, कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था ),

वही मीर फरमाते हैं -
हस्ती अपनी हुबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है.
मीर उन नीमबाज़ आँखों की
सारी मस्ती शराब की सी है.

ग़ज़ल के कलेवर में शायर को अपनी बात कहने की छूट रहती है. एक ही ग़ज़ल में वह हालात का भी ज़िक्र कर सकता है, महबूब की शोखी और अपनी लाचारी भी बयान कर सकता है.

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी.
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी.
उनकी आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी मायल कभी ऐसी तो न थी.

ग़ज़ल के हर शेर में दो मिसरे यानी पंक्तियां होती हैं. पहले मिसरे को मिसरा-ए- ऊला और दूसरे को मिसरा-ए-सानी कहते हैं. जैसे बहादुर शाह ज़फ़र की इस ग़ज़ल में मिसरा-ए-ऊला है - बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी,  और मिसरा-ए-सानी है - जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी.
ग़ज़ल के पहले शेर को मतला कहते हैं. इस शेर के दोनों मिसरों के अंतिम कुछ शब्द एक जैसे होने चाहिए, जैसे यहाँ - "कभी ऐसी तो न थी" ये शब्द हैं.

अंतिम शेर को मक़ता कहा जाता है. अमूमन इसमें शायर का नाम या तख़ल्लुस भी होता है, जैसे इस ग़ज़ल में मक़ता है - क्या सबब तू जो बिगड़ता है "ज़फ़र" से हर बार, के तेरी हूर शुमायल कभी ऐसी तो न थी.
ग़ज़ल के मीटर को "बहर" कहते हैं. एक ग़ज़ल में कितने ही शेर हो सकते है मगर सब एक ही बहर में होने चाहिए. हिंदी या संस्कृत की तरह इसमें ह्रस्व- दीर्घ के अलग-अलग संयोजन वाले निश्चित छंद नहीं हैं. शायर अपनी बात कहने के लिए कोई भी बहर चुन सकते हैं. उर्दू अदब में वैसे तो १९ बहर बतायी गयी हैं लेकिन आम तौर पर ३ बहर पायी जाती हैं. छोटी, मंझोली और बड़ी.
छोटी बहर -  कोई उम्मीद बर नहीं आती,
                  कोई सूरत नज़र नहीं आती.

 मंझोली बहर -   बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं,
                      तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं.

 बड़ी बहर -     आशियाँ जल गया गुलसिताँ लुट गया अब क़फ़स से निकल कर किधर जायेंगे,
                      ऐसे मानूस सैयाद से हो गए अब रिहाई मिलेगी तो मर जायेंगे.

 ग़ज़ल में दूसरी पाबन्दी होती है - रदीफ़ और काफ़िया.
पहले शेर के दोनों मिसरे और बाक़ी शेरों के दूसरे मिसरे के अंतिम शब्द एक जैसे होने चाहिए. जैसे छोटी बहर के उदाहरण में ग़ालिब की जो ग़ज़ल दी है, उस पूरी ग़ज़ल का हर शेर "नहीं आती" से ख़त्म होता है. यह रदीफ़ है.
 रदीफ़ से पहले के शब्दों में भी एकरूपता रखी जाती है,  जैसे - बर नहीं आती, नज़र नहीं आती, बात पर नहीं आती, रात भर नहीं आती. इसे काफ़िया कहते हैं. कच्चे शायर रदीफ़ का तो ध्यान रख लेते हैं पर कभी-कभी काफ़िया मिलाने में चूक जाते हैं. 

हिंदी और संस्कृत साहित्य में जिस तरह "समस्यापूर्ति" की परंपरा थी, उसी तरह उर्दू शायरी में भी "तरही मुशायरे" होते थे. शायरों के आगे एक मिसरा रख दिया जाता था, जिस पर वे पूरी ग़ज़ल कहते थे.
कैफ़ी आज़मी साहब कुल जमा ११ साल के थे, जब अपने बड़े भाई के साथ एक मुशायरे में गए. वहां उन्होंने अपनी लिखी ग़ज़ल पढ़ी लेकिन लोगों ने यही समझा कि बड़े भाई ने अपनी लिखी कोई ग़ज़ल पकड़ा दी है. बाद में इनका इम्तिहान लेने के लिए एक और मिसरा दिया गया - "इतना हँसो कि आँख से आँसू निकल पड़ें". उन्होंने वहीँ बैठे-बैठे ३-४ शेर कहे. बाद में वही ग़ज़ल न जाने कैसे बेगम अख्तर के हाथ लग गयी. उन्होंने उसे गाया और ग़ज़ल  सारे ज़माने में मशहूर हो गयी.
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े.

शेरो-शायरी की बात चले और बैत बाज़ी का ज़िक्र न हो तो कुछ अधूरा -सा लगता है. शेर का एक दूसरा नाम बैत भी है. इसीलिए ग़ज़ल का जो शेर सबसे ख़ास समझा जाता है, उसे हासिल-ए-ग़ज़ल या बैतुल-ग़ज़ल कहा जाता है. जब तक हमारे बच्चों को फ़िल्मी गानों की अन्ताक्षरी का रोग नहीं लगा था तब तक हम सब दोहों-चौपाइयों से अन्ताक्षरी या शेरों से बैत बाज़ी में समय बिताते थे. तब हमने जो कवितायेँ या शेर याद किये थे, वे आज तक हमारी स्मृतियों में वैसे ही सजीव हैं और अनायास हमें जीवन की कठिनाइयों से जूझने का साहस और धैर्य दे जाते हैं.

No comments:

Post a Comment

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts