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झूला पड़ा कदंब की डारी

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मीना कुमारी की एक फ़िल्म आई थी - बहू बेगम, जिसमें वो और उनकी सहेलियाँ झमाझम बरसते पानी में झूला झूल रही थीं। पड़ गए झूले सावन रुत आई रे। /> संयोग की बात है कि मैंने यह फ़िल्म ऐसी उम्र में देखी थी, जब सहेलियों के साथ सैर-सपाटा, मौज-मस्ती कर पाना जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा और सबसे बड़ी उपलब्धि लगती थी। मत भूलिये यह साठ का दशक था, जब छोटे शहरों की लड़कियों पर दुनिया भर की पाबंदियाँ होती थीं। मेरा परिवार तो काफ़ी आधुनिक चिंतन वाला परिवार था, फिर भी घर के ठीक सामने रहने वाली वीणा के घर नोट्स लेने जाना हो तो नौकर साथ जाता था और साथ लेकर ही लौटता था। ऐसे में सहेलियों के साथ झूला झूलने का अवसर सिर्फ स्कूल के अंदर ही मिल पाता था और वहाँ दाइयाँ हर वक़्त डराती रहती थीं - ऐ! ऐ! चला लोगन, भीजा जिन। नाहिं, अबहीं जाइके बाई जी (प्रिंसिपल लीला शर्मा जी) के बताईल। लीला दी ने शायद ही कभी किसी को डाँटा हो, फिर भी उनका ख़ौफ़ ऐसा था कि हम फ़ौरन झूला छोड़कर ग़ायब हो जाते थे। ऐसे में बार-बार ध्यान आता था कि गोकुल-बृंदावन में कैसा आनंद रहा होगा जहाँ गोपी-ग्वाल, राधा-कृष्ण मिलकर झूलते थे और कोई उन्ह...

जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे

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आषाढ़ महीने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलते हैं, भाई-बहन के साथ रथ पर सवार होते हैं और वर्षा ऋतु का आनंद लेने निकल पड़ते हैं। उनकी इस पिकनिक में उनकी पत्नी साथ नहीं होतीं लेकिन लाखों की संख्या में उनके अनुयायी साथ होते हैं। अनुयायी का शाब्दिक अर्थ ही है - साथ चलने वाला - उर्दू में जिसे कहते हैं हमसफ़र। कैसी अजीब बात है? घूमने निकले हैं लेकिन जीवन-साथी को साथ लेकर नहीं चल रहे। साथ में लिया है बड़े भाई को, लाड़ली बहन को और हज़ारों-हज़ार अनुयायियों को। बचपन से ही ऐसे थे। घर में दूध-दही के मटके भरे रहते थे लेकिन उन्हें तो दूसरों के घर से चुराकर खाना भाता था। वो भी अकेले नहीं, सब सखाओं के साथ। माखन चुराने, खाने और लुटाने की ऐसी बान पड़ी कि गोपियों ने माखनचोर नाम ही रख दिया। पकडे जाते तो भोली सूरत बनाकर कह देते- मैं बालक बँहियन को छोटो छींको केहि बिधि पायो ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुख लपटायो। मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। ​ अब इस तरह की शरारतें और बहानेबाज़ी कोई भला आदमी अपने बाल-बच्चों के सामने नहीं कर सकता न, इसलिए उन्हें साथ लेकर नहीं आये हैं। भा...

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये

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याद है दोस्तो! स्कूल में जब अनुप्रास, श्लेष, यमक, उपमा, उत्प्रेक्षा अलंकार पढ़ाये जाते थे? न सिर्फ इनकी परिभाषायें, बल्कि सबके उदाहरण भी याद करने पड़ते थे। आज अचानक उन्हीं दिनों का याद किया यह पद बार-बार कानों में मंजीरे सा बजने लगा। "तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये"।  तरणि- तनुजा यानी सूर्य की पुत्री यमुना। पुराणों में यमुना को सूर्य की पुत्री बताया गया है और यम को उनका भाई। तो उसी सूर्य की पुत्री और यम की बहन यमुना के तट पर बहुत सारे ऊँचे घने तमाल के वृक्ष छाये हुए हैं मानो झुक-झुक कर जल का स्पर्श करने की चेष्टा कर रहे हों, या उस जल के दर्पण में अपनी शोभा निहार रहे हों, या यमुना के जल को अत्यन्त पावन जानकर उसे प्रणाम कर रहे हों। तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये। किधौं मुकुर में लखत उझकि सब निज-निज सोभा कै प्रणवत जल जानि परम पावन फल लोभा।। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के इन शब्दों में कुछ ऐसा आकर्षण था कि यमुना तट आँखों में तरंगित होने लगा। ऊँचे -ऊँचे तमाल वृक्षों के बीच से वो पगडण्डी भी दिखाई देने लगी जिस पर दिन भर के गोचा...

जय जगदीश हरे

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कल एक मित्र ने फेस बुक पर आनंद मठ का वह बड़ा ही सुमधुर गीत - जय जगदीश हरे - पोस्ट किया। एक अन्य मित्र ने सवाल उठा दिया कि गीता दत्त और हेमंत कुमार का गाया यह गीत आखिर कह क्या रहा है। सच ही तो है जिसने कवि जयदेव की कोमल कान्त पदावली नहीं पढ़ी है, वो तो बेचारे सिर्फ़ "जय जगदीश हरे" की टेक ही पकड़ पाते हैं। ये सवाल एक समय मेरे मन में भी उठा था। उन दिनों बनारस में मेरी नानी की भजन मंडली हर शनिवार को जमा होती थी और भजन-कीर्तन से मन बहलाती थी। मैं बराबर नए गीतों की खोज में रहती थी। उन दिनों रफ़ी साहब का गाया - पाँव पडूँ तोरे श्याम ब्रज में लौट चलो, सुलक्षणा पंडित का गाया - कैसे कान्हा का राधा भरोसा करे और शारदा सिन्हा का गाया - जगदम्बा घर में दियरा बार अइनी हो सीखा और भजन मंडली में गाया। लेकिन परिचित धुनों वाले गीत ज़्यादा जमते थे । सोचा जय जगदीश हरे गाकर देखूँ। लेकिन शब्द पकड़ायी में नहीं आ रहे थे। कहीं से सुन लिया कि यह जयदेव के गीत गोविन्द में मिलेगा। बस, मिल गया कोड़ा! अब क्या चाहिए था? जीन, लगाम और घोड़ा। गीत गोविन्द की तलाश शुरू हो गयी। पहले तो अपने घर की पुस्तकों में ही ढूँढा। न...

उपमा कालिदासस्य

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बचपन से किताबें पढ़ने की ऐसी चाट पड़ गयी थी कि जो कुछ हाथ लग जाये - चाट जाती थी। सातवीं क्लास में थी जब पापा की पोस्टिंग गोवा हुई। गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त हुए कुछ ही दिन हुए थे। वातावरण कोंकणी या भारतीय कम, पुर्तगाली अधिक था। खान-पान हो या रहन-सहन सभी पर विदेशी छाप नज़र आती थी। दस-ग्यारह वर्ष के बच्चों के हाथ में बियर की बोतल दिख जाना, कोई अजूबा नहीं था। ऐसे में मुझे पढ़ने के लिए बच्चों की वह पत्र-पत्रिकायें कहाँ से मिलतीं, जिनकी मुझे आदत थी। बनारस और लखनऊ में पराग और चंदामामा नियमित रूप से घर आती थीं। और जब कभी रेल का सफर करना होता, तब बड़े लोग मेरे सवालों की झड़ी से बचने के लिये ए. एच. व्हीलर के स्टॉल से मुझे मनमोहन, राजा भैया या बालक में से कुुछ भी खरीद देने को तैयार हो जाते थे। पणजी में रेडियो के अधिकारियों के लिए सरकारी आवास नहीं थे। स्थानीय लोग अपने घरों में रहते थे और बाहर से आने वालों को होटल में शरण लेनी पड़ती थी। सरकारी कॉलोनी होती तो साथ खेलने के लिये शायद हम-उम्र बच्चे मिल जाते लेकिन होटल में ऐसी कोई व्यवस्था संभव नहीं थी। होटल मालिक के पास एक बेहद खूँख्वार-सा लगता एलसेश...

दुर्गा दुर्गतिनाशिनी

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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का हमारे देश के कैलेंडर में कुछ विशेष महत्त्व ज़रूर है, वरना एक ही तिथि को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से क्यों और कैसे मनाया जाता? उस दिन से नव संवत्सर आरम्भ होता है। वासन्ती नवरात्र आरम्भ होता है। इसके अलावा कहीं चेटी चंड, कहीं गुडि पाड़वा तो कहीं उगाडि अथवा युगादि मनाया जाता है। चलिए यह विमर्श फिर कभी करेंगे। आज देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के नौ दिनों यानी नवरात्रों की बात करते हैं। शारदीय नवरात्र और वासन्ती नवरात्र एक दूसरे से ठीक छह महीने की दूरी पर आते हैं। एक सर्दियों से ठीक पहले तो दूसरा गर्मियों से ठीक पहले। आज के जलवायु परिवर्तन के दौर की बात छोड़ दें तो अब से पचास या चालीस वर्ष पूर्व तक नवरात्र में मौसम बदलने का साफ़ पता चलने लगता था। स्पष्ट है कि नवरात्र, बदलते मौसम का ऐलान करते हुए आते थे। इस के बाद ही जाड़ा और गर्मी अपने पूरे शबाब पर आते थे। पुराने दिनों में, साधनों के अभाव में प्रचण्ड जाड़ा या गर्मी दोनों ही प्राणलेवा हो सकते थे। ऐसे में माँ की याद आना स्वाभाविक ही है। कहा भी तो है - आपत्सु मग्नः स्मर...