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अविस्मरणीय रेलयात्रा

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भगवान बुद्ध ने अच्छा किया था कि अपरिग्रह को सत्य, अहिंसा, अस्तेय और ब्रह्मचर्य के बराबर महत्त्व दिया था। अपने को कोई नुकसान न हो रहा हो तो हम हिंदुस्तानी अमूमन सच बोल लेते हैं, अहिंसा का पालन कर लेते हैं, चोरी से भी बच लेते हैं और देर-सबेर ब्रह्मचारी भी बन जाते हैं। एक ही काम है जिसमें हम कच्चे हैं, और वो है अपरिग्रह। किसी भी घर में जाकर देखिये - पुरानी डायरियों से लेकर गाड़ी के पुराने टायर तक तमाम चीज़ें कहीं कोने-अँतरे में पड़ी मिल जायेंगी। यह हमारा राष्ट्रीय अवगुण है कि हम कभी कोई चीज़ फेंकते नहीं, इस उम्मीद में सहेजकर रख लेते हैं कि कभी न कभी काम आ सकती है। किसी और को क्या दोष दूँ, मैं ख़ुद भी इस मर्ज़ की शिकार हूँ। टूटी मालायें, बटन, साड़ियों के फ़ॉल, पिछले साल की राखियाँ, शादियों के कार्ड से उखाड़े गणेश, और यहाँ तक कि पिछली दीवाली के जले हुए दिये तक मेरे संग्रह में मिल जायेंगे। हाँ, यह ज़रूर है कि मैं जल्द ही उनके इस्तेमाल के तरीक़े ढूँढ लेती हूँ। पहचान रहे हैं? दीवाली पर इन मटकियों में दीप जले थे पर अब ये पौधों के गमले बन गये हैं। कुछ इसी तरह का इस्तेमाल मैंने सुराही के स्टैंड का भी कि...

पचास साल बाद - २

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पचास साल पहले मिरामार बीच पर खोये जूते को अंतिम विदा देकर मैं लुइस की टैक्सी में बैठ जाती हूँ। मन में अब भी पापा की सीख गूँज रही है, हालाँकि आज उनकी बात पर विश्वास करना कठिन है कि मेरा जूता किसी ज़रूरतमंद लड़की को ही मिला होगा।  लुइस को समझाती हूँ कि मिरामार से पणजी की तरफ जाती सड़क पर कहीं वह होटल था, जो पचास साल पहले, गर्मी की छुट्टी भर हमारा घर था। उसके बगल से एक सड़क सब्ज़ी मंडी जाती थी और उसके आगे मिलिट्री हॉस्पिटल था। लुइस कहता है - ओह! कम्पाल एरिया ! इस नाम से मेरी यादों में कोई घंटी नहीं बजती। लेकिन मैं उस होटल को ढूँढ निकालने के लिये बहुत उत्सुक हूँ। वहाँ मेरे अम्मा-पापा हैं, अलसेशियन गोआ है, क्लेमेंटीन आंटी है। हमारे कमरे की वो बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ हैं, जिनकी विंडो सिल पर बैठकर अगुआद का क़िला और मांडोवी में आती-जाती नावें देखी जा सकती हैं। सर्विस लेन के आगे वो पेड़ है, जिसकी टहनियाँ कुछ इस तरह निकली हैं कि उनके संधिस्थल पर बड़े आराम से टेक लगाकर बैठा जा सकता है। जहाँ बैठकर मैं कालिदास ग्रंथावली पढ़ती हूँ और गोआ पेड़ के नीचे बैठा निगरानी करता है। मैं लुइस से बराबर धीरे चलने को कह...

पचास साल बाद

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कम लोगों के जीवन में ऐसे अवसर आते होंगे कि वे पचास साल पहले की भूली-बिसरी यादों पर जमी धूल झाड़कर चमकीले रंगों वाली तस्वीर को फिर से देख सकें। ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे ऐसा मौक़ा मिला कि साठ साला आँखों से दस साल वाली शुभ्रा की जानी-पहचानी जगहों को देख सकी, उसकी बेफ़िक्री और मस्ती को महसूस कर सकी। इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं- बेटा श्रेयस, बहू अपर्णा और बेटी-सी श्रेया। एक ने ज़िद करके टिकट बुक करा दिये। दूसरी ने समझाया - कभी तो अपने बारे में भी कुछ सोच लो, कर लो। और तीसरी ने मुँह लटका लिया - आप नहीं जाओगी तो मुझे बहोत-बहोत दुख होगा। सिर्फ अपने मन की बात होती तो शायद मार भी लेती लेकिन इन तीन तिलंगों का मन कैसे मारती ? आख़िरकार जाना ही पड़ा। ये बड़ा सुखद संयोग है कि मेरी दोनों गोआ यात्राओं में आकाशवाणी का भरपूर योगदान रहा। पहली बार जब पापा का तबादला हुआ और दूसरी बार जब निपट अकेली महिला के होटल में ठहरने के संकोच से मैंने आकाशवाणी के अतिथि-गृह में रहने का फैसला किया। 1964 में मेरे पापा ( श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा 'भिक्खु' ) की पोस्टिंग लखनऊ से पणजी हुई। अम्मा (डॉ शकुन्तला शर्मा) दिल्ली...