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जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे

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आषाढ़ महीने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलते हैं, भाई-बहन के साथ रथ पर सवार होते हैं और वर्षा ऋतु का आनंद लेने निकल पड़ते हैं। उनकी इस पिकनिक में उनकी पत्नी साथ नहीं होतीं लेकिन लाखों की संख्या में उनके अनुयायी साथ होते हैं। अनुयायी का शाब्दिक अर्थ ही है - साथ चलने वाला - उर्दू में जिसे कहते हैं हमसफ़र। कैसी अजीब बात है? घूमने निकले हैं लेकिन जीवन-साथी को साथ लेकर नहीं चल रहे। साथ में लिया है बड़े भाई को, लाड़ली बहन को और हज़ारों-हज़ार अनुयायियों को। बचपन से ही ऐसे थे। घर में दूध-दही के मटके भरे रहते थे लेकिन उन्हें तो दूसरों के घर से चुराकर खाना भाता था। वो भी अकेले नहीं, सब सखाओं के साथ। माखन चुराने, खाने और लुटाने की ऐसी बान पड़ी कि गोपियों ने माखनचोर नाम ही रख दिया। पकडे जाते तो भोली सूरत बनाकर कह देते- मैं बालक बँहियन को छोटो छींको केहि बिधि पायो ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुख लपटायो। मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। ​ अब इस तरह की शरारतें और बहानेबाज़ी कोई भला आदमी अपने बाल-बच्चों के सामने नहीं कर सकता न, इसलिए उन्हें साथ लेकर नहीं आये हैं। भा...

दुर्गा दुर्गतिनाशिनी

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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का हमारे देश के कैलेंडर में कुछ विशेष महत्त्व ज़रूर है, वरना एक ही तिथि को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से क्यों और कैसे मनाया जाता? उस दिन से नव संवत्सर आरम्भ होता है। वासन्ती नवरात्र आरम्भ होता है। इसके अलावा कहीं चेटी चंड, कहीं गुडि पाड़वा तो कहीं उगाडि अथवा युगादि मनाया जाता है। चलिए यह विमर्श फिर कभी करेंगे। आज देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के नौ दिनों यानी नवरात्रों की बात करते हैं। शारदीय नवरात्र और वासन्ती नवरात्र एक दूसरे से ठीक छह महीने की दूरी पर आते हैं। एक सर्दियों से ठीक पहले तो दूसरा गर्मियों से ठीक पहले। आज के जलवायु परिवर्तन के दौर की बात छोड़ दें तो अब से पचास या चालीस वर्ष पूर्व तक नवरात्र में मौसम बदलने का साफ़ पता चलने लगता था। स्पष्ट है कि नवरात्र, बदलते मौसम का ऐलान करते हुए आते थे। इस के बाद ही जाड़ा और गर्मी अपने पूरे शबाब पर आते थे। पुराने दिनों में, साधनों के अभाव में प्रचण्ड जाड़ा या गर्मी दोनों ही प्राणलेवा हो सकते थे। ऐसे में माँ की याद आना स्वाभाविक ही है। कहा भी तो है - आपत्सु मग्नः स्मर...

Holi

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इस बार होली पर दोस्तों की महफ़िल में मैंने एक सवाल रखा - मेरे लिए होली का मतलब है गुलाल, गीत और गुझिया। आपके लिये ? बहुत सारे जवाब आये। सबने अपने-अपने तरीके से होली मनाने का ब्यौरा दिया। मगर देखा कि उनमें से ज़्यादातर चित्र बचपन के थे और गीत सभी के अभिन्न अंग थे। अपने बचपन से शुरू करूँ तो होली से जुड़ा जो पहला गीत स्मृति में उभरता है, वह था - जमुना तट श्याम खेलैं होरी, जमुना तट। एक ओर खेलें कुँवर कन्हैया, एक ओर राधा गोरी रे, जमुना तट। होली की एक टोली के चले जाने पर रंग-गुलाल से भीगे लोग घास पर पसरकर गुझिया-ठंडाई का आनंद लेते और हारमोनियम-तबले पर चलते रहते गीत - फगवा ब्रिज देखन को चलो री। फगवे में मिलेंगे कुँवर कान्ह, बाट चलत बोले कगवा। और - आज बिरज में होरी रे रसिया, होरी नहीं बरजोरी रे रसिया। या फिर - कान्हा बरसाने में आय जइयो बुलाय गयीं राधा प्यारी बुलाय गयीं राधा प्यारी रे समझाय गयीं राधा प्यारी। लेकिन यह तो धुलड्डी के दिन की बात है। होली की तैयारी तो उससे बहुत दिन पहले से शुरू हो जाती थी। महिलाओं के बीच अनुपम "बहन-चारा" लागू हो जाता था। जो गुझिया की विशेषज्ञ होतीं, वे...